प्रभु श्रीराम के ननिहाल की इन ‘माई’ का अनकहा दर्द हम कभी भूल नहीं पाएँगे  -राम महेश मिश्र

डूंगरगढ़/ नेहा मिश्रा। भगवान राम की माता कौशल्या के मायक़े और आज के छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक “पूज्या माँ” से हमारी भेंट हुयी, जिन्होंने न केवल 15 अगस्त 1947 के बाद के राष्ट्र-विभाजन के वे मरणांतक पीड़ा के दिन देखे थे, बल्कि उन्हें अपनी जन्मभूमि व कर्मभूमि छोड़कर पाकिस्तान से हिंदुस्तान आते हुए भुगता भी था। अपने पतिदेव स्मृतिशेष श्री धोलन दास सचदेव और अपने उन कष्टों की चर्चा करने से अब माता लखम भाई सचदेव जी बचती हैं। उनके युवा पौत्र ने बताया कि दादी के शरीर पर उस ऐतिहासिक-दर्द के निशान अब भी मौजूद हैं। सुपौत्र इं. रवीश सचदेव ने अपने दादाजी के भारत में ज़ीरो से शुरू करके आज तक की घोर संघर्ष यात्रा को आदरपूर्वक याद किया।

माँश्री बोलीं- प्रभु से बस यही प्रार्थना है कि वैसे दिन इस देश को अब कभी भी देखने न पड़ें। हमारा प्यारा भारत ख़ूब महफ़ूज़ रहे और इस देश की युवाशक्ति सतर्कता के साथ अपने काम करते हुए इसे आगे बढ़ाए, ऊँचा उठाए।

घर में सेवक-सेविकाएँ होते हुए भी ‘माँजी’ ने अपने हाथों से नाश्ता बनाकर मुझे खिलाया, घर ले जाने के लिए मिष्ठान्न दिया। विदाई के वक़्त मैंने कहा- आज बहुत वर्षों बाद ‘माँ’ के हाथों का बना खाने का सौभाग्य मिला है। इष्टसत्ता से प्रार्थना है कि आज हर तरह से ख़ूब सरसब्ज उनके पूरे कुटुम्ब को पूर्ण संरक्षण दें, पावन गुरुसत्ता की इस परिवार पर ख़ूब कृपा है ही। उनके सुपुत्र श्री सुनील सचदेव एवं पूरा परिवार विश्व जागृति मिशन से जुड़ा है।