दुनिया के 15 प्रदूषित शहरों में भारत के 14 शहर शामिल, कानपुर पहले, पटना 5वें और जोधपुर 14वें पायदान पर

नई दिल्ली/ प्रमोद शर्मा। भारत और दुनिया के दूसरे देशों में प्रदूषण की समस्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। यदि समय रहते हम सब इसके प्रति सजग नहीं हुए तो आने वाले दिनों में पृथ्वी पर रहना मुश्किल ही नहीं, बल्कि नामुमकिन हो जायेगा।

भारत में प्रदूषण की समस्या करीब सन् 2000 के बाद से ही ज्यादा भयानक रूप ले रही है, इससे पहले यहाँ प्रदूषण की समस्या इतनी अधिक नहीं थी। इसका सबका बड़ा कारण यह है कि हम सभी नदियों को माता के समान समझते हैं। इसलिए उसको गन्दा करने से पहले हर व्यक्ति यह सोचता था कि यदि नदियों को गन्दा किया तो हमें पाप लगेगा। उनके अन्दर नदियों के प्रति श्रद्धा के भाव हैं। वर्तमान में गाँवों एवं शहरों का जितना भी कचरा, कूड़ा, प्लास्टिक, फैक्ट्रियों का गंदा पानी आदि प्रदूषण बढ़ाने वाले तत्वों को नदियों में बहाया जा रहा है, जिससे जल प्रदूषण बेइन्तहा बढ़ता जा रहा है।

मनुष्य को अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए लकड़ी की आवश्यकता होती है, जिसके लिए वह जंगलों को काट रहा है। यदि हमारे जंगल इसी प्रकार कटते रहे तो इससे वायु प्रदूषण और अधिक बढ़ता जाएगा। हमारे पेड-पौधे वायु प्रदूषण को रोकने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। आजकल स्कूटर-मोटरसाइकिल, कारें, बसें, ट्रकें, ट्रेने, हवाई जहाज आदि काफी मात्रा में सड़कों पर आ गये हैं, जिससे ध्वनि प्रदूषण के साथ-साथ उससे निकलने वाले धुएँ से भी वायु प्रदूषण बढ़ रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानि WHO ने दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों की लिस्ट जारी की है। यह लिस्ट भारत के लिहाज से बेहद चिंताजनक है, क्योंकि इस लिस्ट में 14 नाम भारतीय शहरों के हैं, जिसमें कानपुर टॉप पर है और दिल्ली छठे नंबर पर है. प्रदूषित शहरों की यह लिस्ट 2016 की है। पुरानी लिस्ट से ताजा आंकड़े की तुलना करने पर पता चलता है कि दिल्ली में 2010 से 2014 के बीच हालात थोड़े-बहुत सुधरे थे लेकिन 2015 के बाद से और भी बिगड़ते जा रहे हैं ये आंकड़े चिंताजनक इसलिए भी हैं कि इसमें ज्यादातर उत्तर भारत के शहर हैं जिसमें पटना, लखनऊ सहित खासकर यूपी और बिहार के हैं दिल्ली के अलावा एनसीआर इलाके में आने वाले फरीदाबाद की हालत भी प्रदूषण के मामले में बेहद खराब है।
WHO की ताजा आंकड़े के मुताबिक दिल्ली में पीएम 2.5 ऐनुल ऐवरेज 143 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है जो नेशनल सेफ स्टैंडर्ड से तीन गुना ज्यादा है. जबकि पीएम 10 ऐवरेज 292 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है जो नेशनल स्टैंडर्ड से 4.5 गुना ज्यादा है यहां भी ध्यान देने की जरूरत है कि सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड का दावा है कि 2016 के मुकाबले 2017 में दिल्ली की हवा में प्रदूषण के स्तर कम हुआ है चलिए अब आपको आंकड़ों के जरिए समझाने की कोशिश करते हैं कि प्रदूषण के मामले में कौन से पायदान पर कौनसा शहर है और कितना PM2 है।

ये इसी देश का खौफनाक सच है जिस देश में प्रधामंत्री खुद देश को जापान और टोक्यो के तर्ज पर विकसित करने का दावा कर चुके हैं।

हालांकि साल 2016 के आखिर में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने कई कदम उठाए थे। WHO की 2010 प्रदूषित शहरों की लिस्ट में दिल्ली टॉप पर तो दूसरे और तीसरे नंबर पर पाकिस्तान का पेशावर और रावलपिंडी था। उस लिस्ट में आगरा भी शामिल था। 2011 की लिस्ट में भी दिल्ली और आगरा थे। 2012 में स्थिति बदलनी शुरू हुई और दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में अकेले भारत के 14 शहर शामिल थे। 2013, 2014 और 2015 में भी दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में भारत के चार से सात शहर शामिल थे। 2016 की लिस्ट में दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों में 14 भारत के हैं। 2013 में दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहर में अकेले चीन के पेइचिंग समेत 14 शहर शामिल थे लेकिन वहां प्रदूषण की समस्या पर काबू पाया गया. इसका नतीजा यह सामने आया है कि 2016 में चीन के सिर्फ चार इस लिस्ट में शामिल हैं। जबकि इस लिस्ट में पाकिस्तान और चीन के एक भी शहर नहीं हैं।
तकनीक के इस दौर में सबकुछ हाइटेक तो है लेकिन प्रदूषण की समस्या देश के सामने आज भी नासूर बनकर खड़ी है हमारे हुक्मरान मेक इन इंडिया की बात जरूर कर रहे हैं लेकिन प्रदूषण की रोकथाम के लिए अभी कर उनके पास कोई रणनीति नहीं है अब जरा सोचिये,, जब आज के युग के भारत में सबसे ज्यादा लोग मौत प्रदूषण से हो जाती है तो ये कहना भी गलत नहीं होगा कि आने वाले 12 सालों में ज्यादातर लोगों को ऑक्सीजन किट लेकर निकलना पड़ेगा वायु प्रदूषण अब महामारी का रूप लेता जा रहा है लेकिन केन्द्र से लेकर राज्य सरकार का इस पर कोई ध्यान नहीं है प्रदूषण से होने वाली मौतों में देशभर का आंकड़ा और भी डराने वाला है।
2013 से 2016 के बीच देशभर करीब 12 हजार 180 लोगों की मौत.. और 4 करोड़ 3 लाख 3 हजार 141 लोग तेज सांस के संक्रमण से जूझ रहे हैं। सीएसई के अनुसार यही हालात रहे तो साल 2020 तक कैंसर के सालाना 17.30 लाख से ज्यादा मामले आने लगेंगे। सीएसई रिपोर्ट कहती है कि भारत में हर 12वां इंसान मधुमेह रोग से पीड़ित है। इसी तरह से प्रदूषण का मानसिक स्वास्थ्य से काफी गहरा संबंध है यही कारण है कि देश में 30 फीसद मौतें वायु प्रदूषण के कारण ही होती हैं।

प्रदूषण की समस्या से चिंतित ऑल इंडिया जर्नलिस्ट यूनियन के संरक्षक राम महेश मिश्र ने कहा कि अब वक्त आ गया है कि प्रदूषण की समस्या का समाधान मिलकर निकालने की, जिसके लिए हमें भारी मात्रा में पेड़-पौघे लगाने होंगे, नालियों में प्लास्टिक एवं कचरा का बहाना बन्द करना होगा, हमें निजी वाहनों के स्थान पर सरकार द्वारा संचालित वाहनों का प्रयोग करना होगा, और फ्रिज, ए.सी. का उपयोग कम से कम करना होगाय तभी हम जल, वायु एवं ध्वनि प्रदूषण से राहत पा सकेंगे।

टीवी पत्रकार अनुभव खंडूरी बताते हैं कि सरकारें प्रदूषण की रोकथाम के लिए योजनाओं का पिटारा तो खोलती हैं लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकलता। क्या किसी ने सोचा है कि हमसब मिलकर कुछ ऐसा करें जो आने वाले समय में इसकी जरूरत न पड़े। क्योंकि प्रदूषण को रोकने का दायित्व सिर्फ सरकार का ही नहीं बल्कि देश के हर इंसान का है इसे रोकने के लिए सभी भारतवासियों को संकल्प लेने की जरूरत क्योंकि प्रदूषण को फैलाने वाले कोई और नहीं बल्कि हम ही लोग है।

डब्ल्यूएचओ के सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक निर्धारक के स्वास्थ्य विभाग के निदेशक डॉ. मारिया का कहना है कि वायु प्रदूषण से सेहत को पहले से ज्‍यादा नुकसान होने लगा है। खासकर ह्रदय रोग और दिल के दौरे के मामले में, होने वाला खतरा काफ़ी बढ़ गया है। इसके साथ ही उन्‍होंने यह भी कहा कि इससे इशारा मिलता है कि हम जिस हवा में सांस लेते हैं उसे स्वच्छ रखने की सख्‍त जरूरत है। इसके साथ ही इससे यह बात भी साफ हो जाती है कि वायु प्रदूषण को कम कर हर बरस लाखों जिंदगियां बचायी जा सकती हैं।

जिस देश में प्रदूषण से हर मिनट 5 मौत होती हो। जिस देश में प्रति व्यक्ति महज़ 21 रुपये पर्यावरण पर ख़र्च का बजट हो। जिस देश में पर्यावरण को लेकर राज्यों का कोई बजट ना हो। हम उसी देश में रहते हैं। नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री की शपथ लेते ही देश को स्वाच्छ भारत का तंमगा दिया लेकिन सच्चाई WHO की रिपोर्ट ने देश के सामने खोलकर रख दी। साफ है इस रिपोर्ट के अनुसार सरकार की लापरवाही साफ नजर आ रही है। अगर ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन ऐसा भी आएगा जब हमें ऑक्सीजन का सिलिंडर साथ लेकर चलना पड़ेगा।