व्यक्ति का खरापन तब ही सिद्ध हो पाता है, जब वह समाज में सत्याचरण का प्रमाण दे पाता है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

टीकमगढ़। सत्य नित्य, शास्वत, सनातन और सार्वभौम सत्ता है। सत्य में भगवदीय बल समाहित है मन-वचन-कर्म में सत्य प्रतिष्ठा मनुष्य को अपूर्व-सामर्थ्य और ऐश्वर्य प्रदान करती है, अतः सत्य-आचरण ही श्रेयस्कर है…! सत्य मनुष्य के सम्मान, प्रतिष्ठा और आत्म-गौरव के लिए अमोघ कवच के समान होता है। जिसने इस कवच को धारण कर लिया है, उसके लिए अपमान, निन्दा और अपवाद का कोई कारण ही नहीं रहता। सत्यनिष्ठ व्यक्ति संसार में निर्भय होकर विचरण करता है और स्पष्ट होकर व्यवहार करता है। उसे ना तो कहीं भय होता है और न ही आशंका। वह समाज को अपने व्यवहार से जीत लेता है। सत्यनिष्ठ व्यक्ति अपने एक स्वरूप में स्थिर रह कर आत्म-लाभ जैसा सुख भोगता है। उसका अन्तःकरण दर्पण की तरह स्वच्छ और मस्तिष्क प्रज्ञा की तरह संतुलित रहता है। उसे न तो मानसिक द्वन्द्वों से त्रस्त होना पड़ता है और न ही निरर्थक वितर्कों से अस्त-व्यस्त। वह जो कुछ सोचता है, सारपूर्ण सोचता है और जो कुछ करता है, कल्याणकारी करता है। मिथ्यात्व के दोष से मुक्त सत्यनिष्ठ व्यक्ति के पास कुकल्पनाओं का रोग नहीं आता। वह तो अपनी सीमा, अपनी सामर्थ्य और अपने साधनों के अनुरूप ही जीवन की कल्पनाएं किया करता है और अधिक से अधिक यथार्थ के धरातल पर ही विचरण किया करता है। निर्विकार, निर्लेप और निर्भय जीवन जीने के लिए सत्य से बढ़कर कोई उपाय नहीं। सत्य एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति है, जो देश, काल, पात्र अथवा परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती। संसार में जहाँ जो भी धर्म-ग्रन्थ और आर्ष अभिवचन पाये जाते हैं, उनमें जिन नियमों की विशेषता दी गई है, सत्याचरण व सत्य भाषण उनमें सर्वप्रधान है। मनीषियों ने सत्य को मनुष्य के हृदय में रहने वाला ईश्वर बतलाया है और सदा सत्य पर आरूढ़ रहने का उपदेश किया है। इस प्रकार सत्य ही वह सार्वकालिक और सार्वदेशिक तथ्य है, जो सूर्य के समान हर स्थान पर समान रूप से चमकता रहता है…।

“आचार्यश्री” ने कहा करते हैं कि सत्य मानव जीवन की सबसे शुभ और कल्याणकारी नीति है। इसका अवलम्बन लेकर चलने वाले जीवन में कभी असफल नहीं होते। यह बात मानी जा सकती है कि सत्य का आश्रय लेकर चलने पर प्रारम्भ में कुछ कठिनाई हो सकती हैं। किन्तु, आगे चलकर उसका आशातीत लाभ होता है। सत्य, पुण्य की खेती है। जिस प्रकार अन्न की कृषि करने में प्रारम्भ में कुछ कठिनाई उठानी पड़ती हैं और उसकी फसल के लिए थोड़ी प्रतीक्षा भी करनी पड़ती है। किन्तु, बाद में जब वह कृषि फलीभूत होती है तो घर, धन-धान्य से भर देती है। ठीक उसी प्रकार सत्य की कृषि भी प्रारम्भ में थोड़ा त्याग, बलिदान और धैर्य तो लेती है; किन्तु जब वह फलती है तो लोक से लेकर परलोक तक मानव-जीवन को पुष्पों से भर कर कृतार्थ कर देती है। जिस प्रकार सोना आग में तप कर और कसौटी पर कस कर ही अपना खरापन सिद्ध कर पाता है। इसी प्रकार व्यक्ति का खरापन तब ही सिद्ध हो पाता है, जब वह समाज में सत्याचरण का प्रमाण दे पाता है। एक बार खरा सिद्ध हुआ सोना संसार में कही भी अपना पूरा मूल्य पा जाता है। उसी प्रकार सत्याचरण का प्रामाणिक व्यक्ति सब जगह समाज का विश्वास प्राप्त कर लेता है। सत्य मानव-जीवन की अनमोल विभूति है। जो अपने प्रति, अपनी आत्मा के प्रति, अपने कर्तव्यों के प्रति, परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति मन-वचन-क्रम से सच्चा रहता है वह इसी जीवन, इसी देह और इसी संसार में स्वर्गीय आनन्द प्राप्त करता है। उसके लिए सुख-शाँति और साधन संतोष की कमी नहीं रहती…।

आचार्यश्री” ने कहा – वेद शब्द का मतलब है – जानना यानी ज्ञान। जो मनुष्य को सत्य के ज्ञान की ओर प्रवृत्त करे, वह वेद है। वेद शब्द वेदन, संवेदन और अनुभव के अर्थ का वाहक है। ईश्वर की, सद्गुरु की कृपा जब होती है तभी सत्य-असत्य का ज्ञान, आत्मतत्व की परमतत्व की अनुभूति साधक को होने लगती है। परमात्मा दर्शन का नही, अनुभव का विषय है। और, अनुभव ज्ञान का आधार है। जब मनुष्य परमात्मा को भली-भांति जानकर पहचान लेता है तब उसकी दृष्टि ब्रह्मदृष्टि हो जाती है। वह सब प्राणियों में एक ही परम तत्व परमात्मा को देखता है। उसे सदा सर्वत्र आत्म-तत्व के ही दर्शन होते हैं। उस समय उसके मन के सारे भ्रम समाप्त हो जाते हैं। सत्य की यह महत्ता कोई कल्पना अथवा वैज्ञानिक विलास नहीं है। यह एक ठोस और सारपूर्ण सिद्धान्त है। “असत्य अस्थिर और उतावला होता है। उसे कभी भी पहचाना और दण्डित किया जा सकता है। सत्य शांत और गम्भीर होता है। सत्य संसार की सबसे बड़ी शक्ति और सबसे प्रभावकारी नीति है। इस पर चलने वाला व्यक्ति न तो कभी अशाँत होता है, न भयभीत और न ही उसे असफल होने की आशंका रहती है। भय-शोक, संताप और अशांति आदि आसुरी दण्ड केवल असत्य परायणों के लिये ही निश्चित है। अतः सत्य परायण के लिए लोक में शाँति और सम्मान एवं परलोक में स्वर्ग सुरक्षित रखा है, जिसे वह अधिकार पूर्वक प्राप्त कर लेता है…।