मन को विकृतियों से मुक्त करना ही कुम्भ- केशरीनाथ त्रिपाठी

प्रयागराज/ बुशरा असलम। परमार्थ निकेतन शिविर में तीन दिवसीय संस्कृति विद्वत कुम्भ का शुभारम्भ हुआ। संस्कृत विद्वत कुम्भ का उद्घाटन पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी, स्वामी चिदानन्द सरस्वती, कला ऋषि बाबा योगेन्द्र, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान, डाॅ साध्वी भगवती सरस्वती, मधुर भण्डारकर, संगीत जगत से मालिनी अवस्थी, प्रसिद्ध गायिका श्रीमती हेमलता, कल्पना और अमीरचन्द्र ने दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया।

“संस्कृति विद्वत कुम्भ” के माध्यम से कुम्भ के वास्तविक स्वरूप का दर्शन, कुम्भ का दार्शनिक स्वरूप, जमीन छोड़ती परम्पराएँ, भारत की संवाद और चिंतन परम्परा, मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी, सिनेमा और समाज, नारी विमर्श का बदलता स्वरूप, कला परम्पराओं की सामाजिक जिम्मेदारी, साहित्य का राष्ट्रधर्म जैसे अनेक विषयों पर विचार विमर्श किया जा रहा है।
संस्कृति विद्वत कुम्भ में देश के विभिन्न क्षेत्रों के मूर्धन्य विद्वान एक मंच पर आकर समाज में व्याप्त समस्याओं पर चितंन और समाधान हेतु इन विषयों पर अपने-अपने विचार व्यक्त करेंगे। यह विचार मंच हमें विभिन्न मूर्धन्यों द्वारा किया गया चितंन और मंथन देगा। कुम्भ की धरती से यह संदेश हम पूरी दुनिया तक पहुंचा सकते है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि भारत, बाजार नहीं बल्कि परिवार है और यही भारतीय संस्कृति का आधार है। संस्कृति विद्वत कुम्भ संत, शासन, प्रशासन और साहित्यकारों का संगम है ताकि संगम के तट से राष्ट्र को एक दिशा मिल सके जिससे इस देश का संगम बना रहे तीन दिन उसी पर चिंतन होगा। संगम से जो यात्रा निकलेगी वह सबके साथ और सबके विकास की होगी जिससे हमारा राष्ट्र समृद्ध होगा। उन्होने कहा कि हम सभी अपने व्यापार, व्यवहार और परिवार के साथ-साथ राष्ट्र भक्ति करे। आज भारत में श्रेष्ठ चरित्र निर्माण करने की आवश्यकता है, देव भक्ति के साथ देश भक्ति दिलों में जगाने की जरूरत है। स्वामी जी महाराज ने विद्वत कुम्भ के मंत्र से युवाओं को आह्वान करते हुये कहा कि भारत को “क्रिएटिव इंडिया, इनोवेटिव इंडिया” बनाना है इसके लिये सभी को एकजूट होने की जरूरत है। भारत के पास अपार बौद्धिक संपदा है बस इसका उपयोग सही दिशा में करना होगा यही संदेश आज इस मंच से लेकर जाये।
संस्कृति विद्वत कुम्भ में आये सभी विद्वानों ने स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज के पावन सान्निध्य में होने वाली दिव्य संगम आरती में सहभाग किया। स्वामी जी महाराज ने एक दिव्य परम्परा शुरू की ’देवभक्ति से पहले देश भक्ति’। इसी क्रम में रोजाना संगम आरती के पश्चात राष्ट्रगान होता है और भारत माता की जय से पूरा अरैल क्षेत्र गूंज जाता है। स्वामी जी महाराज ने कहा कि प्रयाग की धरती पर दिव्य कुम्भ-भव्य कुम्भ, स्वच्छ और सुरक्षित कुम्भ के रूप से सम्पन्न होने वाला कुम्भ है। उसी प्रकार इस विचार कुम्भ के माध्यम से विचारों की स्वच्छता और विचारों में सात्विकता हो यही संदेश लेकर जाये।

राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी जी ने कहा कि कुम्भ का आयोजन अद्वितिय है। यहां पर ईश्वर की कृपा और प्रशासन की व्यवस्था से अद्भुत रूप से सम्पन्न हो रहा है। हम मन को विकृतियों से मुक्त करने हेतु कुम्भ में आते है। अमानवीय, सामाजिक मान्यताओं से विरूद्ध और विकृत विचारों को मन को मुक्त करना है कुम्भ के आयोजन का उद्देश्य है। हृदय को स्वच्छ कर, अध्यात्म का पाठ सीखकर ईश्वर से अपने को जोड़ने का प्रयास ही मन से विकृतियों को निकालना है। कष्ट सहकर हृदय में पाली हुयी पवित्र भावनाओं पर विजय पाना ही कुम्भ का मर्म है, कुम्भ हमें बहुत कुछ देता है।

फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर ने कहा कि भारत ही पूरे विश्व के लोग कुम्भ का इंतजार करते है और सभी सहभाग करना चाहते है यह एक अद्भुत मेला है। उन्होने प्रयागराज मेला प्रशासन द्वारा की गयी व्यवस्था एवं स्वच्छता के लिये धन्यवाद दिया।
मालिनी अवस्थी ने प्रयाग को पौराणिक धरा बताया उन्होंने कहा कि कुम्भ दान की परम्परा है। विश्व का सबसे बड़ा अनुशासित जमावड़ा है कुम्भ, जो आपको और कहीं देखने को नहीं मिलता। कुम्भ एक ऐसा आयोजन है जहां पर बिना बुलाये लोग स्वयं पहुंचते है। उन्होने कहा कुम्भ अर्थात कलश और कलश हमेशा देने का कार्य करता है, कलश सदैव परिपूर्ण रहता है, भरा रहता है चाहे वह जल से भरा हो या विचारों से भरा हो। यहां पर शस्त्र और शास्त्र दोनों का एक साथ ज्ञान होता है यही उद्देश्य था संस्कार भारती का कि संस्कृति कुम्भ का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में वक्ता के रूप में श्री कमलेश पाण्डेय जी, सलीम आरिफ जी, शेफाली जी, लुब्ना जी और अन्य उपस्थित रहे।