साधना की सार्थकता के लिये श्रेष्ठ वातावरण जरूरी है – सुधांशु जी महाराज

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन आश्रम में पांच दिवसीय साधना शिविर का शुभारम्भ हुआ। परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने विश्व जागृति मिशन के प्रमुख सुधांशु जी महाराज को शिवत्व का प्रतीक रूद्राक्ष का पौधा भेंट कर माँ गंगा के पावन तट परमार्थ घाट पर साधना शिविर का उद्घाटन किया।
विश्व जागृति मिशन के प्रमुख सुधांशु जी महाराज और दीदी अर्चिका, भारत के विभिन्न प्रांतों से आये साधकों को पांच दिनों तक ध्यान, प्राणायाम, योग, सत्संग एवं गंगा आरती के माध्यम से तनाव मुक्त, आनन्दयुक्त जीवन एवं आध्यात्मिक उन्नति के सूत्रों से अवगत करायेंगे। आज उषाकाल से ही साधक परमार्थ गंगा तट पर स्नान के पश्चात सुधांशु जी महाराज एवं दीदी अर्चिका के सानिध्य में साधना के विविध आयामों से रूबरू हुये तत्पश्चात स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज एवं पूज्य सुधांशु जी महाराज के सत्संग एवं दर्शन से लाभान्वित हुये।
इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि ’साधना, आन्तरिक शान्ति को प्राप्त करने का बेहतर माध्यम है; साधना के द्वारा मनुष्य ’इनर सेल्फ’ को भर कर आध्यात्मिक उन्नति के शिखर तक पंहुच सकता है। उन्होने कहा कि मनुष्य अपने शेल्फ को; अलमारियों को  भरने में पूरा जीवन लगा देते है परन्तु इनर सेल्फ खाली ही रह जाता है साधना के माध्यम से इनर सेल्फ की रिक्तता को भरकर जीवन में अनेक सकारात्मक परिवर्तन कर सकते है।
स्वामी जी ने सभी साधकों को साधना के साथ स्वच्छता का संकल्प कराया सभी साधकों ने हाथ उठाकर संकल्प लिया। उन्होने कहा कि आज हमारे हाथ ही नहीं जुडे़ बल्कि हमारे दिल जुड़े है, सद्भाव से साधना और साधना से स्वच्छता की ओर हमारे कदम अग्रसर होते रहे यही साधना का सार है।
वहीं सुधांशु जी महाराज ने कहा कि ’साधना की सार्थकता के लिये श्रेष्ठ वातावरण की जरूरत होती है, परमार्थ का गंगा तट वह श्रेष्ठ एवं दिव्य स्थान है जहां पर दिव्यता के साथ पवित्रता भी कण-कण में व्याप्त है। इस दिव्य धाम में पांच दिवसीय साधना से जीवन को दिव्य बनाया जा सकता है।’
इसके अलावा अर्चिका जी ने साधकों को आहार, विहार एवं योग के विषय में जानकारी दी।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने पूज्य सुधांशु जी महाराज को शिवत्व का प्रतीक रूद्राक्ष का पौधा भेंट किया और आहृवान किया कि साधना शिविर के पश्चात सभी साधक अपने-अपने गंतव्य पर पंहुचकर एक-एक पौधे का रोपण अवश्य करे ताकि साधना से आन्तरिक शुद्धता एवं पौधा रोपण से बाह्य वातावरण की शुद्धता हो सकें।