कल्चर, नेचर और फ्यूचर का संगम हम सभी के जीवन में हो यही है मकर संक्राति -स्वामी चिदानन्द सरस्वती

प्रयागराज/ सुनील दुबे। परमार्थ निकेतन ऋषिकेश परिवार के सदस्यों, परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों एवं देश विदेश से आये सैकड़ों श्रद्धालुओं ने परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज, जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती जी, श्री मोहन जी, हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष श्री शंकर सान्यल जी एवं अन्य गणमाण्य अतिथियों ने स्वच्छता अभियान और संगम स्नान में सहभाग किया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि प्रयागराज कुुम्भ मेला सचमुच अद्भुत और अनोखा है, न कोई कचरा न कोई गन्दगी। उन्होने कहा कि हमने आज स्वच्छता अभियान का कार्यक्रम बनाया था परन्तु यहां की स्वच्छता देखकर मन गद्गद हो गया इस हेतु स्वामी जी महाराज ने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी एवं पूरे कुम्भ प्रशासन को शुभकामनायें दी।
आज का प्रथम शाही स्नान विलक्षण रूप से सम्पन्न हुआ इस हेतु स्वामी जी महाराज ने प्रशासन को साधुवाद देतेे हुये कहा कि कुम्भ प्रशासन का पूर्ण सहयोग एवं विनम्रतापूर्ण व्यवहार ने सभी का दिल जीत लिया।
मकर संक्राति के अवसर पर संदेश देते हुये स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा ’’सबसे बड़ी मकर संक्राति है माँ संक्राति’’ माँ का स्थान जीवन में सबसे ऊचाँ है। आज हम गंगा माँ के; यमुना माँ के और सरस्वती माँ के तट पर है। जीवन में सबसे बड़ी त्रिवेणी बहने लगती है जब आप अपनी माँ का आशीर्वाद अपने जीवन में, माँ की सेवा अपने जीवन में मां की पूजा अपने जीवन में करते हो। माँ केवल बाहर ही नहीं माँ तो भीतर भी है। ’’संस्कारों को देने वाली सबसे पहली गुरू माँ ही है बाकी गुरू तो बाद में आते है ’’माँ ने जन्म भी दिया, माँ ने संस्कार भी दिये इसलिये मकर संक्राति के इस पावन अवसर पर हम कुछ ऐसा याद करे कि ’’मेरी माँ और मदर नेचर’’ ’’शक्ति और प्रकृति का संगम, संगम के तट पर हो’’ माँ हमारा कल्चर है, नदिया हमारी नेचर है यदि हम चाहते है कि हमारा फ्यूचर बचा रहे, हमारा भविष्य बचा रहे तो ’’कल्चर, नेचर और फ्यूचर का संगम हम सभी के जीवन में हो यही मकर संक्राति है’’ सारी संक्रातियाँ, सारी भ्रांतियों को दूर करके जीवन में प्रकाश पैदा करती है, माँ एक प्रकाश है; माँ एक जीवन है; माँ वह रोशनी है जो जन्नत के दरवाजे भी खोल देती है। 
इस कुम्भ परिसर में कहीं भी कुछ ऐसा दिखता हो यथा कूड़े-कचरे जैसा जो कोई दूसरा भी छोड़ गया हो उसे उठा लेना, प्लास्टिक का उपयोग नहीं करना तो समझ लेना की आपका स्नान हो गया फिर तन के स्नान के लिये हम प्रवेश करेंगे, मन भी शुद्ध होगा। ध्यान करेंगे वही बैठकर और फिर इस कुम्भ कलश के साथ हम कुछ ऐसा सोचे कि जगह-जगह कचरा कलश लगे; कचरा कलश लगे ताकि लोगों द्वारा छोड़े कपड़े उन कलशों में एकत्रित करे; फूलों के कलश लगे, पुष्प कलश लगे ताकि पूजा के पुष्प, पुष्प कलश में डाले ताकि एकत्रित किये हुये कपड़ों को उपयोग दरियों एवं चटाईयाँ बनाने में हो सके जो किसी गरीब के काम आ जायेगा तथा फूलों का उपयोग सुगन्धित अगरबती और धूप बनाने में हो ताकि तेरा तुझको अर्पण फिर वापस प्रभु को अर्पण हो जाये इस भाव से स्नान करेंगे; इस भाव से ध्यान करेंगे और इस ज्ञान को अपने जीवन का लक्ष्य बनाते हुये हम प्रभु को प्रणाम करते हुये तथा अपनी माँ को प्रणाम करते हुये स्नान करें।
सभी साधकों ने अरैल क्षेत्र संगम तट पर होने वाली परमार्थ गंगा आरती में सहभाग किया। इस अवसर पर स्वामिनी आदित्यनन्दा सरस्वती, सुश्री नन्दिनी त्रिपाठी, पावनी, प्रीति, क्लाउडीन, इन्दु, सोनाली, कामेश, रमेश, नरेन्द्र, आचार्य दीपक, लक्की सिंह, ऐड, अमित, अनन्त एवं अन्य सेवकों ने सहभाग किया।