पंपा सरोवर, यहां भगवान राम ने खाये थे सबरी के जूठे बेर

कर्नाटक/ अमित यादव। पवित्र देव भूमि भारत, जहां बूंद बूंद में गंगा जल है और कण- कण में भगवान बिराजमान है। जगह- जगह के तीर्थस्थल और पवित्र सरोवर जो देशवासियों के लिये श्रद्धा का केंद्र है। हर एक तीर्थ स्थल का सम्बन्ध ईश्वर की पौराणिक कथा से जुड़ा होता है। किसी न किसी संत तपस्वी के कर्म से वह तपस्थली पवित्र और तीर्थ बन जाती है जहां बिलक्षण विभूतिया और महापुरुष पैदा होते है वह स्थान, हिन्दू धर्म में तीर्थ- स्थान समझा जाता है….
तीर्थ स्थलों के दर्शन से भक्त जनों के मन में भक्ति की प्रेरणा जग जाती है, जैसे भगवन श्रीराम और अयोध्या, भगवन कृष्ण और गोकुल बृन्दावन, काशी और विश्वेश्वर इसी प्रकार सम्पूर्ण भारत वर्ष महापुरुषों और तीर्थो से भरा पड़ा है। ये महापुरुषों के नाम और स्थान एक-दुसरे से एकबद्ध हो गए और यही स्थान हमारे लिए पवित्र तीर्थ होकर उभर गए।
भारत के सभी दिशाओ में तीर्थ स्थल व पवित्र सरोवर, नदिया श्रद्धालुओ की भावनाओ को पुकार रही है, प्रत्येक तीर्थस्थल से भारतीय एकात्मता का भाव जागृत होता रहता है, पूरब में बिंदु सरोवर पश्चिम दिशा में नारायण सरोवर उत्तर में मानसरोवर और दक्षिण में है पंपा सरोवर प्रत्येक स्थल से हिंदू धर्म और संस्कृति का इतिहास झलकता है।

कर्नाटक में बैल्‍लारी जिले के हास्‍पेट से हम्‍पी जाकर जब आप तुंगभद्रा पार करते हैं तो हनुमन हल्‍ली गॉंव की ओर जाते हुए आप पाते हैं शबरी की गुफा जी हां पंपा सरोवर और वह स्‍थान जहाँ शबरी राम को बेर खिला रही है। हमारे पौराणिक चरित्रों में शबरी विशिष्‍ट है। दलित और स्त्री के दोहरे अभिशाप को भोगती, यहां तक कि शबरी को ना तो समीक्षा करना आता है न ही परीक्षा करना गुरू से कोई दार्शनिक बहस भी नहीं अदभुत चरित्र है। सुतीक्ष्‍ण के बाद राम आयेंगे तो खोज शुरू नहीं की प्रतीक्षा शुरू कर दी कोई समीक्षा नहीं, परीक्षा नहीं केवल प्रतीक्षा। प्रतीक्षा का परिणाम क्‍या हुआ कि खुद श्री राम अपने पैरों से चलकर सबरी के दर तक आये हां सिर्फ आये ही नहीं, सबरी के जूठे बेर भी खाये उसके बाद बेर खाने की कहानी भी विख्‍यात हो गई। ये प्रतीक्षा का परिणाम है सबरी के तपस्या ने साबित किया कि सत्‍य की दुनियां में प्रतीक्षा ही परिणाम है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार व्रह्मा जी ने सृष्टि के आरंभ में जिन चार सरोवरों की स्थापना की थी, पंपा सरोवर उन्हीं में से एक है। तुलसीकृत रामचरित मानस में ऐसा उल्लेख आता है कि सुग्रीव को खोजते हुए भगवान राम और लक्ष्मण यहां आये थे। इस सरोवर में उन्होंने स्नान भी किया था। यह मानकर कि भगवान के पंपा सरोवर में स्नान करने से इसके जल की दिव्यता, पवित्रता और शक्ति में वृद्धि हो गयी है और इसमें स्नान करने से हमें विशेष आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होगा। इसी पवित्रता को पाने के लिये आज श्रद्धालु इसमें स्नान करते हैं, जो लोग किन्हीं कारणों से स्नान करने की स्थिति में नहीं रहते, वे अंजुली में सरोवर का जल लेकर अपने माथे पर छिड़कते हुए यह भाव रखते हैं कि सरोवर में स्नान करने से जो फल मिलता है वो फल हमें प्राप्त हो।
दरअसल है तो यह सरोवर ही, लेकिन कमल की पत्तियों ने इसे इस कदर ढंक रखा है कि किनारे के हिस्सों को छोड़कर इसमें कहीं भी पानी नजर नहीं आता। केवल कमल की पत्तियां और उन पर खिले कमल के फूल नजर आते हैं। सरोवर के दूसरे भाग में फूल-पत्तियां आदि कुछ भी नहीं हैं, केवल जल ही जल है
पंपा सरोवर के किनारे लक्ष्मी देवी का मंदिर है। इस मंदिर का वैभव देखने पर महसूस होता है कि यह किसी धनवान का घर है, हो भी क्यों ना। यहां लक्ष्मी देवी जो रहती हैं, जो स्वयं धन की देवी हैं। यह क्षेत्र वर्षों पहले विजय नगर साम्राज्य का एक अंग हुआ करता था। विजय नगर राजपरिवार की यह कुल देवी थीं। ऐसा कहा जाता है कि राजपरिवार की प्रार्थना पर इन्हीं लक्ष्मी देवी की कृपा से राज्य के प्रमुख हिस्सों में सोने की बरसात हुई थी। मंदिर के महंत स्वामी रामदास जी रात को एक बजे उठकर लक्ष्मी जी की दो घंटे तक पूजा करते हैं उसके बाद वो पहाड़ियों पर घूमने के लिए निकल पड़ते हैं, उनके बारे में ऐसा कहा जाता है कि उन्हें पक्षियों की भाषा समझने की विद्या का ज्ञान है, जिसकी मदद से वो पक्षियों का वार्तालाप सुनते और समझते हैं। लक्ष्मी देवी के मंदिर के पीछे शबरी जी का आश्रम है, जहां लक्ष्मी जी का मंदिर सजावट की आदर्श अवस्था प्राप्त है, वहीं शबरी जी का आश्रम सादगी की एक मिसाल है।
पंपा सरोवर के पास रहने वाले साधु-संत बताते हैं कि यहां आसपास की चट्टानों में कई ऋषि सूक्ष्म शरीर में तपस्या कर रहे हैं, जो लोगों को नजर नहीं आते। यहां एक ऐसी जगह भी है, जहां रोज सुबह भभुत और ताजे फूल आदि दिखाई देते हैं, जिससे इस बात का अंदाजा मिलता है कि उस स्थान पर कोई अदृश्य ऋषि तपस्यारत है।