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डॉ.पं0 श्रीपति त्रिपाठी से जानें आखिर कैसे प्रसन्न होते हैं न्याय के देवता भगवान शनिदेव

पटना। आज शनिवार है, यानी शनिदेव के पूजने का दिन। माना जाता है कि इंसान के हर अच्‍छे बुरे कर्मो का फल शनिदेव ही देते हैं। क्योंकि शनिदेव न्याय के देवता हैं। आप सभी ने सुना होगा कि शनिदेव अगर किसी पर नाराज हो जाएं तो व्‍यक्‍ति को कई प्रकार से परेशिानियां हो सकती हैं। इसलिये लोग शनिदेव से काफी डरते हैं और उन्‍हें खुश करने के तरह – तरह के उपाय खोजते हैं। लेकिन वहीं अगर शनिदेव किसी पर दिल से खुश होते हैं, तो उस इंसान को हर क्षेत्र में सफलता मिलती है। व्यक्ति की कुंडली में साढ़ेसाती और ढय्या होने पर ये उसकी सफलता में बाधक बनती है।

डॉ.पं0 श्रीपति त्रिपाठी आपको कुछ उपाय बताने जा रहे हैं, जिन्‍हे करने से शनिदेव खुश होते हैं और मन चाहा फल देते हैं। ध्यान रहे यह उपाय शनिवार को ही किये जाने चाहिये….

1. हर शनिवार को काले तिल के साथ आटा और शक्‍कर मिला लें और उसे चींटियों को खाने के लिये छोड़ दें।

2. अगर किसी इंसान को शनि देव की कृपा नहीं मिल रही है तो, काले घोड़े की नाल या नाव की कील से अंगूठी बनाकर अपनी मध्यमा उंगली में शनिवार के दिन सूर्यास्त के समय धारण करें।

3. आप चाहें तो शनिदेव से मुक्‍ती पाने के लिये उनके नाम का 108 बार जप करें। नाम इस प्रकार हैं – कोणस्थ, पिंगल, बभ्रु, कृष्ण, रौद्रान्तक, यम, सौरि, शनैश्चर, मंद, पिप्पलाश्रय।

4. आज के दिन दान जरुर करें। आज काले तिल, काला कपड़ा, कंबल, लोहे के बर्तन, उदड़ की दाल का दान करें। इससे शनि देव खुश होंगे और फल भी देंगे।

5. बंदर हनुमान जी का रूप होते हैं, तो ऐसे में बंदरों को गुड़ और चने खिलाएं। प्रत्येक शनिवार हनुमान चालीसा का पाठ करें। हनुमान जी का पूजन करने से व्यक्ति को शनि दोषों का सामना नहीं करना पड़ता।

6. आज के दिन शनिदेव की पूजा करें अैर उन्‍हें नीले रंग के फूल अर्पित करें। इसके साथ ही शनि मंत्र ऊँ शं शनैश्चराय नमः का रुद्राक्ष की माला से 108 बार जप करें। ऐसा हर शनिवार करें, जिससे आपके सिर से शनिदेव का साया हट जाएगी।

7. सुबह स्‍नान कर के एक कटोरी में सरसों का तेल ले कर उसमें अपना चेहरा देखें। फिर यही तेल किसी गरीब को दान में दे दें। इससे भगवान शनि खुश होंगे और आपका भाग्‍य बदल जाएगा तथा बाधाएं भी दूर होंगी।

8 आप चाहें तो अपनी सुविधा अनुसार सुबह नहा कर पीपल के पेड़ को जल चढाएं। इसके बाद उसी पीपल के पेड़ की 7 बार परिक्रमा करें। मंदिर में लगे पीपल के पेड़ के पास दिया जलाएं।

9. तांबे के लोटे में जल लेकर उसमें काले तिल डालें। फिर यही जल शिवलिंग पर चढाएं। ऐसा करने से व्यक्ति को सभी रोगों से मुक्ति मिलेगी और भोलेनाथ की कृपा से आर्थिक तंगी दूर होगी।और हां ध्यान रहे किसी गरीब को ना सतायें। कोशिश करें लोगों की मदद करने की।प्रभु शनिदेव आप पर निश्चित प्रसन्न होंगे। जय शनिदेव।

जीवन मरण के बंधन से मुक्त करता है ये खास व्रत

नई दिल्ली/ प्रतिमा चतुर्वेदी। ज्येष्ठ माह के शुक्लपक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है। 13 जून को निर्जला एकादशी का व्रत है। पद्म पुराण के मुताबिक इस एकादशी को निर्जल व्रत रखते हुए विष्णु की पूजा पाप-तापों से मुक्त कर देती है।

पुराणकथा के मुताबिक देवर्षि नारद ने ब्रह्मा जी के कहने पर इस तिथि पर निर्जला व्रत किया। हजार वर्ष तक निर्जल व्रत करने पर उन्हें चारों तरफ नारायण ही नारायण दिखने लगे। नारद जी को भगवान विष्णु का दर्शन हुआ, उसके बाद नारायण ने उन्हें अपनी निश्छल भक्ति का वरदान दिया। तभी से निर्जला व्रत शुरु हुआ। इस धरा पर जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है।

ज्योतिषविद् कृष्णा शर्मा बताती हैं कि इस दिन भगवान विष्णु के लिए व्रत करने वाले व्यक्ति को निर्जला एकादशी की तैयारियां एक दिन पहले से ही कर लेनी चाहिए। दशमी तिथि पर सात्विक भोजन करना चाहिए। कृष्णा शर्मा आगे बताती हैं कि भगवान विष्णु को पीले फल, पीले फूल, पीले पकवान का भोग लगाएं। दीपक जलाकर आरती करें। ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। निर्जला एकादशी पर व्रत करने वाले अधिकतर लोग पानी भी नहीं पीते हैं। आपके लिए ये संभव न हो तो फलों का रस, पानी, दूध, फलाहार का सेवन कर सकते हैं। 

क्या है इस व्रत का का महत्व
ज्योतिषविद् कृष्णा शर्मा के मुताबिक एकादशी स्वयं विष्णु प्रिया हैं इसलिए माना जाता है कि इस दिन निर्जल व्रत जप-तप पूजा पाठ करने से प्राणी श्रीविष्णु का सानिध्य प्राप्त कर जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। सभी देवता, दानव, नाग, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, नवग्रह आदि के जरिए रक्षा और विष्णु भक्ति के लिए एकादशी का व्रत रखने के कारण इसे देवव्रत भी कहा जाता है।

निर्जला एकादशी व्रत करने से मिलता है 24 एकादशी के बराबर फल

नई दिल्ली/ प्रतिमा चतुर्वेदी। हिंदू पंचांग के मुताबिक पूरे साल में 24 एकादशी पड़ती हैं। इन सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी सबसे अहम है साथ ही फलदायी भी है। इस साल निर्जला एकादशी 13 जून को है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा अर्चना करने से पूरे 24 एकादशियों के व्रत का फल मिलता है। आज के दिन बिना पानी पिए व्रत रखा जाता है।  

माना जाता है कि निर्जला व्रत रखने से कई जन्‍मों के पापों का नाश होता है। आज के दिन अपने माता-पिता और गुरु का भी चरण स्पर्श करना चाहिये। यह महीना गर्मी का होता है इसलिए प्याऊ की व्यवस्था करने से आपको अधिक लाभ मिलेगा। इस दिन इंसान ही नहीं बल्‍कि पक्षियों और जानवरों को भी पानी पिलाने का विधान है।  

निर्जला एकादशी का शुभ मुहूर्त
शुभ मुहूर्त- अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:52 से दोपहर 12:47 तक 
अशुभ मुहूर्त- राहुकाल-दोपहर 01:30 बजे से 3 बजे तक

निर्जला एकादशी के क्या हैं नियम – 
तपस्या के इस दिन किसी भी कीमत पर अन्न ग्रहण न करें। किसी की निन्दा न करें। माता पिता और गुरु का अपमान न करें। घर में चावल न पकाएं और न खाएं। गन्दगी ना फैलाएं और हो सके तो दिन में ना सोएं। 

गंगा दशहरा 2019 : भारतीय अर्थव्यवस्था का मेरूदण्ड और भारतीय आध्यात्म का सार है गंगा- स्वामी चिदानंद

ऋषिकेश। गंगा दशहरा के पावन अवसर पर परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों ने गंगा तट पर स्वच्छता अभियान चलाया। उसके बाद महामण्डलेश्वर स्वामी असंगानन्द जी महाराज, परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज, कथाकार संत श्री मुरलीधर, स्वामी ज्योतिर्मयानन्द, साध्वी भगवती सरस्वती, स्वामी सनातन तीर्थ, स्वामी केशवानन्द जी महाराज, साध्वी आभा सरस्वती, स्वामिनी आदित्यनन्दा सरस्वती, स्वामी शांतानन्द, स्वामी सेवानन्द, सुश्री गंगानन्दिनी त्रिपाठी, आचार्य संदीप शास्त्री, परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों, आचार्यों और अन्य पूज्य संतों ने माँ गंगा जी को 108 कमल के पुष्प अर्पित कर विधिवत पूजन किया। 
गंगा जी के अवतरण दिवस पर आज साध्वी भगवती जी द्वारा रचित एवं श्री नरेन्द्र जी द्वारा संकलित पुस्तक “मदर गंगा द होली रिवर” का विमोचन किया गया। इस अवसर पर हर आनन्द प्रकाशन के निदेशक श्री आशीष गोसाई भी मौजूद रहे।
मानस कथा श्रवण करने आये श्रद्धालुओं ने गंगानन्दिनी त्रिपाठी जी के मार्गदर्शन में योग किया फिर सभी ने गंगा स्नान, ध्यान और हवन में भाग लिया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि आज माँ गंगा के अवतरण दिवस पर लाखों श्रद्धालुओं ने गंगा में डबकी लगायी और आचमन किया होगा लेकिन यह केवल एक डुबकी या एक घूट आचमन नहीं है बल्कि यह तो आत्ममंथन की डुबकी है। यहां से निश्चय करके जाये कि जीवन में भरे क्रोध, अहंकार, ईष्र्या रूपी विष और पर्यावरण में भरे प्रदूषण रूपी विष को समाप्त करेंगे। अपने जीवन और अपने पर्यावरण को अमृत से भर दे।
स्वामी जी महाराज ने कहा कि गंगा के जल में बैक्टीरियोफेज होता है साथ ही जल में कई वर्षो से जपे गये मंत्रों और प्रार्थना की जो शक्ति है वह अद्भुत है। माँ गंगा के दर्शन मात्र से ही मन को शान्ति मिलती है। विश्व की वह पहली नदी है जिसके तटों पर अस्त होते सूर्य के साथ जय गंगे माता का स्वर गूंजने लगता है। गंगा जल औषधि नहीं बल्कि अमृत के समान है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि माँ गंगा ने पृथ्वी पर रहने वाले प्राणियों को जन्म तो नहीं दिया परन्तु जीवन अवश्य दिया है। भारत की राष्ट्रीय नदी गंगा युगों-युगों से मानवीय चेतना का संचार कर रही है। वेदों की ऋचाओं में है गंगा; साहित्यकारों के साहित्य में है। कवियों की कविताओं में। ऋषियों की तपस्या में और तीनों छन्दों में गंगा समाहित है। साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था का मेरूदण्ड और भारतीय आध्यात्म का सार है गंगा। माँ गंगा के बारे में जितना कहा और लिखा जाये वह बहुत कम है। आईये अपनी सोच और अपने व्यवहार में परिवर्तन लाये और अपनी गंगा, अपना पर्यावरण और अपनी धरा को स्वच्छ बनायें।
राम कथा में गंगा दशहरा के शुभ अवसर पर संत श्री मुरलीधर जी महाराज मां गंगा के अवतरण और उस के महत्व को भजन के माध्यम से सारगर्भित रुप मैं भक्तों के समक्ष रखा, उन्होंने बताया कि मां गंगा में स्नान करते समय अटखेलियां करना या पति पत्नी के साथ स्नान करते समय मस्ती करना मां गंगा की निर्मल मर्यादा के अनुरुप नहीं है पति पत्नी को हाथ पकड़ कर साथ में डुबकी लगानी चाहिए और अपने सुखी दांपत्य जीवन की कामना करनी चाहिए और जन्म-जन्म में भी पति-पत्नी का साथ मिले, लेकिन गंगा में नहाते समय एक दूसरे पर पानी उछालना, मस्ती करना, अठखेलियां करना उचित नहीं है गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए गंगा में दीपक, माला, कपड़े, प्लास्टिक जैसा कोई पदार्थ नहीं डाले और मन में संकल्प लें हम पूरे पर्यावरण को प्लास्टिक रहित और पौधे लगाकर हरित और निर्मल  बनाएंगे।
लेखक नरेन्द्र ने कहा कि स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं साध्वी भगवती सरस्वती जी ने भारतीय संस्कृति और हिन्दु धर्म को विश्व के अनेक देशों तक पहुचांया है वास्तव में यह विलक्षण कार्य है।
जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि गंगा दशहरा के दिन माँ गंगा के तट पर रहना सचमुच भाग्यशाली अवसर है। अपने बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि आज से 23 वर्ष पूर्व मैं पीएचडी करने के पश्चात भारत भ्रमण के लिये आयी थी तब मुझे गंगा और हिमालय के बारे में कुछ पता नहीं था परन्तु यह माँ गंगा की कृपा और स्वामी जी का आशीर्वाद ही था कि मैं फिर भारत की ही होकर रह गयी। उन्होंने कहा कि जब मैने माँ गंगा के दर्शन किये तब से मेरा पूरा जीवन माँ गंगा का हो गया। जहां गंगा जी है वहां सब कुछ है। साध्वी जी ने कहा कि भौतिक वस्तुओं में जीवन की मस्ती और शान्ति नहीं है वास्तविक शान्ति तो गंगा जी के तट पर है।

स्वामी जी महाराज ने आज गंगा दशहरा के अवसर पर गंगा को स्वच्छ रखने का संकल्प कराया। उन्होंने कहा कि गंगा जीवनदायिनी है उसमें अपने पुराने कपडे़, पुरानी पुस्तकें, भगवान के चित्र, फुल, माला और अन्य पूजन सामग्री विसर्जित करके गंगा जल प्रदूषित न करे। उन्होंने कहा कि आज किया संकल्प अलौकिक और दिव्य संकल्प होगा आप सब अपनी-अपनी गलियों को गोद ले इससे गलियां का स्वरूप बदलेगा। गलियां बदलेगी तो गांव बदलेंगे, गांव बदलेगा तो राष्ट्र बदलेगा। यह संकल्प माँ गंगा को समर्पित करे आज के दिन यही उपहार है हम सभी की ओर से माँ गंगा के लिये। 

गंगा दशहरा : आज के दिन स्वर्ग से धरती पर आई थीं मोक्षदायिनी गंगा


गोमुख/ प्रतिमा चतुर्वेदी। प्रतिवर्ष ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस वर्ष गंगा दशहरा 12 जून 2019, यानी आज के दिन मनाया जा रहा है। स्कंदपुराण के मुताबिक गंगा दशहरे के दिन व्यक्ति को किसी भी पवित्र नदी में जाकर स्नान, ध्यान तथा दान करना चाहिए। इससे वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है। यदि कोई मनुष्य पवित्र नदी तक नहीं जा पाता तब वह अपने घर पास की किसी नदी पर स्नान करें।
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी को संवत्सर का मुख कहा गया है। इसलिए इस इस दिन दान और स्नान का ही अत्यधिक महत्व है। वराह पुराण के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, बुधवार के दिन, हस्त नक्षत्र में गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थी। इस पवित्र नदी में स्नान करने से दस प्रकार के पाप नष्ट होते है।

गंगा दशहरे का महत्व
भगीरथी की तपस्या के बाद जब गंगा माता धरती पर आती हैं उस दिन ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की  दशमी थी। गंगा माता के धरती पर अवतरण के दिन को ही गंगा दशहरा के नाम से पूजा जाना जाने लगा। इस दिन गंगा नदी में खड़े होकर जो गंगा स्तोत्र पढ़ता है वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है। स्कंद पुराण में दशहरा नाम का गंगा स्तोत्र दिया हुआ है.
ज्योतिष विद कृष्णा शर्मा के मुताबिक जिस भी वस्तु का दान करें उनकी संख्या दस होनी चाहिए और जिस वस्तु से भी पूजन करें उनकी संख्या भी दस ही होनी चाहिए। ऎसा करने से शुभ फलों में और अधिक वृद्धि होती है.

गंगा दशहरा का फल
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के दस प्रकार के पापों का नाश होता है. इन दस पापों में तीन पाप कायिक, चार पाप वाचिक और तीन पाप मानसिक होते हैं। इन सभी से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है।

पूजा विधि
ज्योतिष विद कृष्णा शर्मा बताती हैं कि इस दिन गंगा जी में स्नान किया जाता है। यदि कोई मनुष्य वहाँ तक जाने में असमर्थ है तब अपने घर के पास किसी नदी या तालाब में गंगा मैया का ध्यान करते हुए स्नान कर सकता है। गंगा जी का ध्यान करते हुए षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए।
गंगा जी का पूजन करते हुए निम्न मंत्र पढ़ना चाहिए :-
“ऊँ नम: शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नम:”
इस मंत्र के बाद “ऊँ नमो भगवते ऎं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा” मंत्र का पाँच पुष्प अर्पित करते हुए गंगा को धरती पर लाने भगीरथी का नाम मंत्र से पूजन करना चाहिए। इसके साथ ही गंगा के उत्पत्ति स्थल को भी स्मरण करना चाहिए। गंगा जी की पूजा में सभी वस्तुएँ दस प्रकार की होनी चाहिए। जैसे दस प्रकार के फूल, दस गंध, दस दीपक, दस प्रकार का नैवेद्य, दस पान के पत्ते, दस प्रकार के फल होने चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति पूजन के बाद दान करना चाहता है तब वह भी दस प्रकार की वस्तुओं का करता है तो अच्छा होता है लेकिन जौ और तिल का दान सोलह मुठ्ठी का होना चाहिए। दक्षिणा भी दस ब्राह्मणों को देनी चाहिए। जब गंगा नदी में स्नान करें तब दस बार डुबकी लगानी चाहिए।

गंगा जी की कथा
इस दिन सुबह स्नान, दान तथा पूजन के उपरांत कथा भी सुनी जाती है जो इस प्रकार से है :-
प्राचीनकाल में अयोध्या के राजा सगर थे। महाराजा सगर के साठ हजार पुत्र थे। एक बार सगर महाराज ने अश्वमेघ यज्ञ करने की सोची और अश्वमेघ यज्ञ के घोडे. को छोड़ दिया। राजा इन्द्र यह यज्ञ असफल करना चाहते थे और उन्होंने अश्वमेघ का घोड़ा महर्षि कपिल के आश्रम में छिपा दिया. राजा सगर के साठ हजार पुत्र इस घोड़े को ढूंढते हुए आश्रम में पहुंचे और घोड़े को देखते ही चोर-चोर चिल्लाने लगे। इससे महर्षि कपिल की तपस्या भंग हो गई और जैसे ही उन्होंने अपने नेत्र खोले राजा सगर के साठ हजार पुत्रों में से एक भी जीवित नहीं बचा. सभी जलकर भस्म हो गये.
राजा सगर, उनके बाद अंशुमान और फिर महाराज दिलीप तीनों ने मृतात्माओं की मुक्ति के लिए घोर तपस्या की ताकि वह गंगा को धरती पर ला सकें किन्तु सफल नहीं हो पाए और अपने प्राण त्याग दिए। गंगा को इसलिए लाना पड़ रहा था क्योंकि पृथ्वी का सारा जल अगस्त्य ऋषि पी गये थे और पुर्वजों की शांति तथा तर्पण के लिए कोई नदी नहीं बची थी।
महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए उन्होंने गंगा को धरती पर लाने के लिए घोर तपस्या की और एक दिन ब्रह्मा जी उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और भगीरथ को वर मांगने के लिए कहा तब भगीरथ ने गंगा जी को अपने साथ धरती पर ले जाने की बात कही जिससे वह अपने साठ हजार पूर्वजों की मुक्ति कर सकें। ब्रह्मा जी ने कहा कि मैं गंगा को तुम्हारे साथ भेज तो दूंगा लेकिन उसके अति तीव्र वेग को सहन करेगा? इसके लिए तुम्हें भगवान शिव की शरण लेनी चाहिए वही तुम्हारी मदद करेगें।
अब भगीरथ भगवान शिव की तपस्या एक टांग पर खड़े होकर करते हैं। भगवान शिव भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगाजी को अपनी जटाओं में रोकने को तैयार हो जाते हैं। गंगा को अपनी जटाओं में रोककर एक जटा को पृथ्वी की ओर छोड़ देते हैं। इस प्रकार से गंगा के पानी से भगीरथ अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाने में सफल होता है।

आखिर कहां है दुनिया का पहला योग विद्यालय, जानिए

पटना। 21 जून को इंटरनेशनल योगा डे है। ऐसे में योग से जुड़ी तैयारियां भी जोरों पर हैं। देशभर में योग को लेकर अलग उत्साह है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया का पहला योग विद्यालय कहां है। हम आपको बताते हैं दुनिया के पहले योग विद्यालय के बारे। बिहार के मुंगेर में ‘बिहार स्कूल ऑफ़ योग’ है। योग को आगे बढ़ाने में ‘बिहार स्कूल ऑफ़ योग’ का योगदान बेहद अहम रहा है। बिहार स्कूल ऑफ योग की नींव स्वामी सत्यानंद ने साल 1964 में मुंगेर के गंगा नदी के तट पर की थी।

स्वामी सत्यानंद के गुरु स्वामी शिवानंद साल 1937 में ऋषिकेश से मुंगेर आए थे। उन्होंने जगह-जगह संकीर्तन के जरिए योग का संदेश दिया। इसके बाद उनके शिष्य सत्यानंद सरस्वती को मुंगेर में ही यह दिव्य संदेश प्राप्त हुआ कि योग भविष्य की संस्कृति है। इसके तहत साल 1964 में स्वामी शिवानंद के महासमाधि ले लेने के बाद स्वामी सत्यानंद ने मुंगेर में गंगा दर्शन आश्रम की नींव रखी और यहीं वह योग को आगे बढ़ाने में जुट गए। स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने योग सिखाने के लिए 300 से ज्यादा पुस्तकें लिखीं, जिसमें योग के सिद्धांत कम और प्रयोग ज्यादा हैं। वर्ष 2010 में सत्यानंद स्वामी के निधन के बाद इस स्कूल की जिम्मेदारी स्वामी निरंजनानंद के कंधों पर आ गई।

इस केंद्र में योग सिखाने की पूरी प्रणाली का उद्देश्य शारीरिक, मानसिक और आत्मिक पहलुओं के बीच संतुलन स्थापित करना है। मुंगेर के इस स्कूल की योग में भूमिका को देखते हुए पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने वर्ष 2014 में मुंगेर को योगनगरी बताया था। योग के प्रचार-प्रसार के लिए इस स्कूल की प्रशंसा न्यूजीलैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लिथ हालोस्की, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद तथा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी व मोरारजी देसाई सहित योग गुरु बाबा रामदेव भी कर चुके हैं।

बिहार स्कूल ऑफ योगा के 200 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय एवं सैकड़ों राष्ट्रीय योग एवं आध्यात्मिक केन्द्र हैं. इसे मानद विश्वविद्यालय (डीम्ड यूनिवर्सिटी) का दर्जा दिया गया है. यहां 4 माह का योग सर्टिफिकेट कोर्स होता है. इसके साथ योग दर्शन, योग मनोविज्ञान, अप्लाइड योग एवं पर्यावरण योग विज्ञान में हायर एजुकेशन के लिए एक और दो साल का कोर्स है.

इस विद्यालय के आश्रम के नियम

  • योग केंद्र में आने वालों को यहां के सख्त नियमों का पालन करना पड़ता है। रोजाना सुबह 4 बजे उठकर साधना करनी होती है। इसके बाद कक्षाएं शुरू होती हैं।
  • शाम 6:30 बजे कीर्तन के बाद 7:30 बजे अपने कमरे में व्यक्तिगत साधना का समय निर्धारित है। रात आठ बजे आवासीय परिसर बंद हो जाता है।
  • यहां खास-खास दिन महामृत्युंजय मंत्र, शिव महिमा स्त्रोत, सौंदर्य लहरी, सुंदरकांड व हनुमान चालीसा का पाठ करने का भी नियम है।
  • बसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) के दिन हर साल स्कूल का स्थापना दिवस मनाया जाता है। इसके अलावा गुरु पूर्णिमा, नवरात्र, शिव जन्मोत्सव व स्वामी सत्यानंद संन्यास दिवस पर भी विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

देवी मां का इकलौता ऐसा धाम जहां एक ही जगह मां के दिव्य तीन स्वरूपों का होता है दर्शन

विंध्याचल। विंध्यवासिनी धाम एक ऐसा जागृत शक्तिपीठ है जिसका अस्तित्व सृष्टि आरंभ होने से पूर्व की है और जिसका अस्तित्व प्रलय के बाद भी कायम रहेगा। देवी मां का इकलौता ऐसा धाम है जहां एक ही जगह भक्तों को मां के दिव्य तीन स्वरूपों के दर्शन का सौभाग्य मिलता है।
पुराणों में विंध्य क्षेत्र का महत्व तपोभूमि के रूप में वर्णित है। मां विंध्यवासिनी देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केन्द्र है। देश के 51 शक्तिपीठों में से एक हैं विंध्याचल की देवी मां विंध्यवासिनी विंध्याचल की पहाड़ियों में गंगा की पवित्र धाराओं की कल-कल करती ध्वनि, प्रकृति की अनुपम छटा बिखेरती है।
त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल निवासिनी देवी लोकहिताय, महालक्ष्मी, महाकाली तथा महासरस्वती का रूप धारण करती हैं। विंध्यवासिनी देवी विंध्य पर्वत पर स्थित मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली हैं। मां विंध्यवासिनी को भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री देवी भी माना जाता है।
कहा जाता है कि जो मनुष्य इस स्थान पर तप करता है, उसे अवश्य सिद्वि प्राप्त होती है। विविध संप्रदाय के उपासकों को मनवांछित फल देने वाली मां विंध्यवासिनी देवी अपने अलौकिक प्रकाश के साथ यहां नित्य विराजमान रहती हैं।
ऐसी मान्यता है कि सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता। यहां पर संकल्प मात्र से उपासकों को सिद्वि प्राप्त होती है। इस कारण यह क्षेत्र सिद्ध पीठ के रूप में विख्यात है। सबसे खास बात यह है कि यहां तीन किलोमीटर के दायरे में तीन प्रमुख देवियां विराजमान हैं। ऐसी मान्यता है कि तीनों देवियों के दर्शन किए बिना विंध्याचल की यात्रा अधूरी मानी जाती है। तीनों के केन्द्र में हैं मां विंध्यवासिनी। यहां निकट ही कालीखोह पहाड़ी पर महाकाली और अष्टभुजा पहाड़ी पर अष्टभुजी देवी विराजमान हैं। लगभग सभी पुराणों के विंध्य महात्म्य में इस बात का उल्लेख है कि 51 शक्तिपीठों में मां विंध्यवासिनी ही पूर्णपीठ है। नवरात्र के दिनों में मां के विशेष श्रृंगार के लिए मंदिर के कपाट दिन में चार बार बंद किए जाते हैं। सामान्य दिनों में मंदिर के कपाट रात 12 बजे से भोर 4 बजे तक बंद रहते हैं।
आदि शक्ति की शाश्वत लीला भूमि मां विंध्यवासिनी के धाम में पूरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। खास कर नवरात्र आरंभ होते ही विंध्यवासिनी धाम में भक्तों का रेला उमड़ पड़ता है। शारदीय और चैत्र नवरात्र दोनों अवसर पर यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। देश के कोने कोने से माता के भक्त इस शक्तिपीठ में माथा टेकने ज़रूर आते हैं। कहते हैं कि सच्चे दिल से यहां की गई मां की पूजा कभी बेकार नहीं जाती। हर रोज यहां हजारों लोग मत्था टेकते हैं और देवी मां का पूजन जय मां विंध्यवासिनी के जयकारे के साथ करते हैं।

अयोध्या में योगी आदित्यनाथ की ‘राम भक्ति’ आज, भगवान राम की मूर्ति का करेंगे अनावरण

लखनऊ। अयोध्या में श्रीराम मंदिर के लंबे इंतज़ार के बीच योगी आज अयोध्या पहुंचेंगे और श्रीराम की 7 फीट ऊंची काष्ठ प्रतिमा का अनावरण करेंगे। ये कार्यक्रम श्रीराम शोध संस्थान में होगा। 
अनावरण के लिए लाई गई भगवान श्रीराम की प्रतिमा कर्नाटक हैंडीक्राफ्ट से 35 लाख में खरीदी गई है। कर्नाटक शैली में ये मूर्ति काष्ठ कला की दुर्लभ कृतियों में एक है। इसे 2017 में राष्ट्रपति की ओर से पुरस्कार भी मिल चुका है। 
अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक वाईपी सिंह के मुताबिक दक्षिण भारतीय स्टायल में बनी यह मूर्ति सिंगल लकड़ी की बनी है। उन्होंने बताया कि यह मूर्ति उत्तर भारत के राम और दक्षिण भारत की हस्त शिल्पकला के समन्वय का प्रतीक है।

इसके अलावा सीएम योगी आदित्यनाथ अयोध्या आंदोलन के पुरोधा महंत नृत्यगोपाल दास के जन्मोत्सव कार्यक्रम में भी शामिल होंगे। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साधु-संत और राम मंदिर आंदोलन से जुड़े नेता भी हिस्सा लेंगे ।
अयोध्या शोध संस्थान के व्यवस्थापक राम तीर्थ ने बताया कि इस भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा संचालित इस शोध संस्थान में भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर की शिल्प सामग्री सुरक्षित हैं इसी कड़ी में भगवान राम की आदम कद मूर्ति स्थापित की जाएगी और इस मूर्ति का अनावरण सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ करेंगे।
अयोध्या में आज कोदम्ब राम की प्रतिमा के अलावा भगवान श्रीराम की 221 मीटर ऊंची प्रतिमा भी लगाई जाएगी। इसका ऐलान यूपी सरकार ने पिछले साल किया था।

श्रीराम के नाम पर महाराष्ट्र में शिवसेना का ‘विजय प्लान’

मुंबई। नवंबर 2018 में शिवसेन प्रमुख उद्धव ठाकरे अयोध्या आए थे। उसके कुछ महीने बाद लोकसभा का चुनाव होना था। अब उद्धव फिर से अयोध्या आ रहे हैं वहीं कुछ महीनों बाद महाराष्ट्र में चुनाव होना है। उद्धव ठाकरे अपने 18 सांसदों के साथ 16 जून को रामलला के दर्शन के लिए आ रहे हैं।
उद्धव ठाकरे ने कहा कि संसद का सत्र शुरू होने के पहले मैं अपने सांसदों के साथ एक बार राम मंदिर में दर्शन के लिए जाऊंगा।
उद्धव जब पिछली बार अयोध्या आए थे, तो उनकी भाषा मोदी सरकार के ख़िलाफ़ काफी तल्ख थी। मोदी सरकार को निशाना बनाकर उद्धव ने यहां तक कह डाला था कि वो अयोध्या सोए हुए कुंभकर्ण को जगाने आए हैं। पहले मंदिर फिर सरकार का नारा भी दिया, लेकिन इस बार उद्धव की ज़रूरत राम मंदिर के लिए दबाव से ज्यादा हिंदुत्व के एजेंडे पर मजबूत दिखाई देने की है। 
शिवसेना सांसद संजय राउत ने बताया कि अब तो बीजेपी के पास 303 सांसद हैं शिवसेना के पास 18 सांसद हैं और पार्टी मिलकर हम 350 के ऊपर हैं और क्या चाहिए मंदिर बनाने के लिए। आपको बहुमत चाहिए था बहुमत मिल गया है मंदिर का मुद्दा अब नहीं चलेगा अब चलाया तो लोग जूते मारेंगे। 
नवंबर में लोकसभा चुनाव से पहले उद्धव अयोध्या गए, तो शिवसेना को महाराष्ट्र में विजयी भव: का आशीर्वाद मिला था और अब वो एक बार फिर अयोध्या आने वाले हैं इस उम्मीद के साथ कि महाराष्ट्र चुनाव में भी शिवसेना का रामजी बेड़ा पार लगाएंगे। 

योग को विश्व पटल पर पहचान दिलाने में शिवानंद कुटीर की भूमिका अहम

उत्तर काशी। आज दुनियाभर में योग के नाम पर बहुत कुछ हो रहा है, लेकिन उन सबका वास्तविक योग से शायद ही कोई लेना-देना हो। लेकिन योग के सही मायने और उसके प्रभाव को दुनियाभर में पहचान दिलाने वाला एक ऐसा स्थान है उत्तरकाशी के नेताला स्थित शिवानंद कुटीर योग। यह संस्थान योग को दुनियाभर में प्रचारित करने के लिए योग शिक्षक तैयार करने में बेहद अहम भूमिका निभा रहा है। साल 1957 में स्तित्व में आए इस इस आश्रम में साल 2002 से योगा टीचर्स ट्रेनिंग प्रोग्राम के तहत हजारों योग प्रशिक्षक तैयार किए जा चुके हैं। इस संस्थान से प्रशिक्षित बड़ी तादाद में स्थानीय युवा दुनिया के कोने कोने में योग के गुर सिखा रहे हैं।

योग को अंतर्राष्ट्रीय पटल पर पहचान दिलाने वाले स्वामी शिवानंद और उनके शिष्य स्वामी विष्णुदेवानंद का उत्तरकाशी से गहरा नाता रहा है। उन्होंने यहां आकर योग साधना की और वर्ष 1957 में यहां गंगोत्री हाईवे के निकट नेताला में शिवानंद कुटीर की स्थापना की। उसके बाद योग का सिलसिला लगातार परवान चढ़ने लगा।

योग की मुद्रा में देसी विदेशी साधक

इस संस्थान से योग शिरोमणि की उपाधि ले चुके बौंगा गांव के कृष्णानंद बिजल्वाण, कोटबंगला के पीयूष बलूनी, धनारी के हरीश नौटियाल, नेताला की मीरा आदि युवा भारत के साथ-साथ दुनिया के कई देशों में जाकर लोगों को योग के गुर सिखाने की मुहिम में जुटे हैं। शिवानंद कुटीर नेताला की निदेशक स्वामी परमेश्वरी आनंद के मुताबिक यहां साल में पांच टीचर्स ट्रेनिंग कोर्स और एक प्राणायाम साधना शिविर चलता है। यहां बड़ी तादाद में विदेशी साधक योग सीखने आते हैं

आप को बतादें कि आजादी से पहले यानि 1947 के आस पास मलेशिया में डॉक्टर की नौकरी छोड़कर ऋषिकेश आए स्वामी शिवानंद ने यहां दिव्य जीवन संघ के जरिए लोगों की सेवा शुरू की। यहां उन्होंने योग, ध्यान एवं साधना का प्रसार शुरू किया। साल 1957 में उन्होंने अपने शिष्य स्वामी विष्णुदेवानंद को योग के प्रसार के लिए विदेश भेजा। उसके बाद साल 1963 में स्वामी शिवानंद के ब्रह्मलीन होने के बाद उनके शिष्य ने दुनिया के अलग अलग देशों में शिवानंद योग वेदांत केंद्रों की स्थापना कर योग को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई। वर्तमान में भारत के साथ ही विभिन्न देशों में 41 शिवानंद योग वेदांत केंद्र संचालित हैं।

हिमालय की गोद में बसे उत्तरकाशी में योग साधना के लिए अच्छी जगह है। यहां स्वच्छ आबोहवा, कलकल बहती गंगा का उद्गम, हिमाच्छादित चोटियां और आध्यात्मिक शांति सदियों से लोगों को साधना के लिए आकर्षित करती रही हैं। यही कारण है कि स्वामी शिवानंद एवं स्वामी विष्णुदेवानंद के अलावा हिमालयन इंस्टीट्यूट के संस्थापक स्वामी राम, योग गुरु बाबा रामदेव, महर्षि महेश योगी आदि कई ख्यातिप्राप्त संतों ने गंगोत्री उत्तरकाशी क्षेत्र में साधना की है। अब भी हर साल बड़ी तादाद में देशी-विदेशी साधक यहां योग साधना के लिए आते हैं।