भगवान विष्णु के व्रत और आराधना से पाएं मनवांछित फल

वाराणसी। पद्मनाभ द्वादशी व्रत आश्विन शुक्ल की द्वादशी को किया जाता है। इसमें, भगवान पद्मनाम की पूजा की जाती है. इस दिन भगवान जागृतावस्था प्राप्त करने हेतु अंगडाई लेते है तथा पद्मासीन ब्रह्या” ऊँकार“ ध्वति करते हैं ।

एक घट स्थापित करके उसमें पद्मनाभ (विष्णु) की एक स्वर्ण प्रतिमा डाल देनी चाहिए। चन्दन लेप, पुष्पों आदि से उस प्रतिमा की पूजा की जाती है। दूसरे दिन किसी ब्राह्मण को दान दिया जाता है। (अगर स्वर्ण-प्रतिमा न हो, या दान न करें, तो भी भगवान विष्णु की श्रद्धापूर्ण आराधना से सभी फल मिलते हैं) महाभारत आश्वमेधिक पर्व के वैष्णवधर्म पर्व के अंतर्गत अध्याय 92 में द्वादशी व्रत के माहात्म्य का वर्णन हुआ है। कृष्ण द्वारा द्वादशी व्रत का माहात्म्य : युधिष्ठिर ने कहा- भगवन ! सब प्रकार के उपवासों में जो सबसे श्रेष्ठद, महान फल देने वाला और कल्या्ण का सर्वोत्तम साधन हो, उसका वर्णन करने की कृपा कीजिये।

श्रीभगवान बोले : महाराज! आश्विन की द्वादशी को उपवास करके जो ‘पद्मनाभ’ नाम से मेरा अर्चन करता है, उसे एक हजार गोदान का फल प्राप्तम होता है। राजन! कार्तिक महीने की द्वादशी तिथि को व्रत रहकर जो ‘दामोदर’ नाम से मेरी पूजा करता है, उसको सम्पूलर्ण यज्ञों का फल मिलता है। नरपते! जो द्वादशी को केवल उपवास ही करता है, उसे पूर्वोक्तर फल का आधा भाग ही प्राप्तर होता है। इसी प्रकार श्रावण में यदि मनुष्यप भक्तिायुक्तक चित्त से मेरी पूजा करता है तो वह मेरी सालोक्य  मुक्तिह को प्राप्ता होता है, इसमें तनिक भी अन्यििथा विचार करने की आवश्ययकता नहीं है।

जो द्वादशी तिथि को मरे लिये चन्दन, पुष्पे, फल, जल, पत्र अथवा मूल अर्पण करता है उसके समान मेरा प्रिय भक्तस कोई नहीं है। नरश्रेष्ठी युधिष्ठिर ! इन्द्रष आदि सम्पू र्ण देवता उपर्युक्त  विधि से मेरा भजन करने के कारण ही आज स्वार्गीय सुख का उपभोग कर रहे हैं। आप का आज का दिन मंगलमयी हो – आप स्वस्थ रहे, सुखी रहे – इस कामना के साथ !

ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय, 9450537461

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