केवल परमात्मा का चिंतन, गुरु-यश गान और आनंद होता है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

सीकर। सत्संग, सन्त-सन्निधि और शास्त्र-विचार का फलादेश है- अन्त:करण निर्मलता, अभयता एवं लक्षपूर्ति की तत्परता…! मनुष्य के जीवन में सत्संग का विशेष महत्व है। सत्संग एक प्रकार का औषधालय है, जो आत्मा का उपचार करता है। जिस प्रकार एक रोगी व्यक्ति शारीरिक उपचार के लिए चिकित्सक के पास जाता है, उसके परामर्श के अनुसार नियमित दवा का सेवन कर रोग से छुटकारा पता है। ठीक उसी तरह सद्गुरु के परामर्श से जो व्यक्ति नियमित सत्संग करता है, उसकी आत्मा की मलीनता का धीरे-धीरे नाश हो जाता है। इस भौतिकतावादी सांसारिक वातावरण में रहते हुए मनुष्य की मनोदशा तथा बौद्धिक स्थिति मलीन हो जाती है। इसके शुद्धिकरण के लिए पूर्ण सद्गुरू की शरण ग्रहण कर मनुष्य सत्संग को नियमित कर आत्मिक शुद्धता को प्राप्त करता है। नियमित सत्संग करने से मानव के कुविचारों और कुसंस्कारों का नाश होता है तथा उसके मन बुद्धि में सुविचारों तथा अच्छे संस्कारों का संचार होता है। विचार की शुद्धता के परिणाम स्वरूप मनुष्य की वाणी पवित्र होती है तथा आचरण व्यवहार संतों, सत्पुरुषों के समान पवित्र हो जाता है..।

“आचार्यश्री” ने कहा – भाग्यवान होते हैं वह जिन्हें सत्यवादी पुरुषो की संगती मिलती है। जीवन में मित्र तो अनेक मिल जाते हैं, परन्तु संतो का संग भाग्य से मिलता है। जैसी संगत, वैसी रंगत। संत का संग हमें निरंकार परमात्मा के निकट करता है। निसंदेह प्रभु सबके निकट ही है, परन्तु यह अनुभूति केवल ब्रह्मज्ञानियों के, संत-सत्पुरुषों के संग से अथवा सत्संग से प्राप्त होती है। संत जब जीवन में आते हैं तभी जीवन में बसंत आता है। बसंत के आने से प्रकृति मुस्कुराती है, और संत के आने से संस्कृति मुस्कुराती है। संतो की संगति जीवन में वह बहार लाती है जो कभी पतझड़ में नहीं बदलती। जिनके जीवन की बागडोर सदगुरु ने संभाली है, उनके कार्य स्वतः ही होते चले जाते हैं और वे चिंतामुक्त जीवन जीते हैं। “आचार्यश्री” ने कहा – गुरु अर्थात् विचार सत्ता, ज्ञान सत्ता और प्रकाश सत्ता। जिसके पास विचारों का प्रकाश है, उसी का जीवन सार्थक है। ज्ञान हमारे अनन्तता का बोध कराने वाला तत्व है। हमारे भीतर शुभता, तेज और अतुल्य सामर्थ्य विद्यमान है। जीवन में गुरु और ग्रंथ के आने का, संत और सत्संग के आने का फलादेश यह है कि हम विनम्र बनते हैं। इसलिए गुरु यानी मर्यादा। यदि आपके पास मर्यादा है और आप किसी के शील, संयम, मर्यादा का हनन नहीं कर रहे हैं तो ही आप आध्यात्मिक हैं…।

“आचार्यश्री” ने कहा – सत्संग में रूचि रखने वाले भक्त सद्गुणों से अपने जीवन का श्रृंगार करते हैं। संतो के गुण सहजता से ही जीवन को प्रभावित करते रहते हैं और एक दिन ऐसा आ जाता है कि संतो का संग अभिमानी को भी ज्ञानी बना देता है। संतो के वचन सुनना, सुनकर ह्रदय में स्थान देना और फिर उसे कर्म में ढ़ालना ही जीवन में सुगन्धि भरना है। शुभ कर्मो की सुगंधि दूर-दूर तक फ़ैल जाती है और यही कर्म जीवन की शोभा बढ़ाते हैं। दर्पण बड़ा हो या छोटा, हमें अपना चेहरा दिखा ही देता है। ठीक ऐसे ही सत्संग हमारे मनुष्य जीवन का दर्पण है। इसलिए अपने वैराग्य के पात्र को ज्ञान अमृत से भरने के लिये नित्य सत्संग किया करें। जीवन में सत्संग बहुत महत्वपूर्ण है। सत्संग के माध्यम से ही हम जगदीश को प्राप्त कर सकते हैं…।

“आचार्यश्री” ने कहा – सत्संग में बैकुण्ठ की अनुभूति होती है क्योंकि सत्संग में प्रभु का यशोगान होता है। आत्मा को गुरु वचनामृत की प्राप्ति होती है, जिससे सकारात्मक भावनाएं जागृत होती हैं। यहाँ निंदा, इर्ष्या, द्वेष, वैर, विरोध आदि का कोई स्थान नहीं होता। केवल परमात्मा का चिंतन, गुरु-यश गान और आनंद होता है। नित्य सत्संग से जीवन में परम रस की, ब्रह्मरस की अनुभूति होती है। आचार्यश्री कहा करते हैं कि संतो का संग करके विशालता की और कदम बढ़ाना ही सत्संग का प्रभाव है। सत्संग ही हृदय में से ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, जाती-मजहब की दीवारे गिराता है और प्रभु की रचना से प्रेम करना सिखाता है। साथ ही सभी को अपने परमपिता की संतान मानकर समानता, विशालता एवं विश्व-बंधुत्व की भावना जागृत करता है। सत्संग से ही चिंतन पवित्र होता है जिससे आचरण और व्यवहार का भी शुद्धिकरण हो जाता है और सदगुरु चरणों में अनुराग दृढ़ होने लगता है। सत्संग से ही सुमति आती है और कुमति जाती है। अतः सत्संग मन को शुद्ध करके हमारे विचारधारा को सकारात्मक बनाता है …।