चलो भ्रम से पार निकलें, परस्पर आत्म मन कर लें, पारदर्शी बनें- डॉ विजय मिश्र

नई दिल्ली। इन दिनों देश भ्रम में है। प्रकृति संदेश भ्रम में है। भ्रमित हैं सारे नर नारी। भ्रमित सूबे के अधिकारी। भ्रमित्त ध्वज व पताका है। भ्रमित्त जीवन की आशा है। भ्रमित्त संसद व सन्यासी। भ्रमित्त मथुरा भ्रमित्त काशी। राम मंदिर पर भ्रम देखो। फिर भी सत्ता का दम देखो। भीष्म भी है भ्रमित बैठे। अटल अर्जुन करण कैसे। भ्रमित सब चरण वंदन है।भ्रमित तन मन अभिनंदन है। भ्रमित वे उच्च वानी हैं। भ्रमित सत्ता संधानी हैं। निकटता में भ्रम ही भ्रम है। दूर रहने में भी भ्रम है। भ्रमित्त सारे विपक्षी हैं। करु क्या सब एक पक्ष ही हैं। भ्रमित सत्ता भ्रमित जनता। भ्रमित हाथों के गुलदस्ता। भ्रमित कालर भ्रमित झालर। भ्रमित्त रुपया भ्रमित्त डॉलर। भ्रमित उद्यम भ्रमित्त मध्यम। भ्रमित भक्ति भ्रमित संयम। भ्रमित सत्ता व सहयोगी। भ्रमित घर घर के सब योगी। भ्रमित्त सारे सहायक है। विधयेक व विधायक हैं। पार्टी दल सभी भ्रम में। केमेस्ट्री मन डमी भ्रम में।भ्रमित्त कश्मीर का मुद्दा। 370 हो या सत्ता। समान नागरिक संहिता भी। फाइलों में दबी फिरती। स्वप्न रामराज्य तक भ्रम में। तनिक आह्लाद न मन में। भ्रमित्त सत्ता व शौचालय। भ्रमित्त मंत्री व देवालय। स्वच्छता भ्रमों में उड़ती। खरक कर आँख में पड़ती। स्किल इंडिया का नारा। भ्रमो से पूर्ण चौबारा। युवक मल हाथ रह जाता। प्रमाणपत्र हाथ न आता। नौकरी भ्रम में रह जाती। घर का जो था वह भी ले जाती। स्थिति यह देश भर में है। कहे किससे ये मन में है। कहे यदि भाजपा सत्ताधारी है। तो यह भि भ्रम की बीमारी है। कांग्रेस झांकती बगलें, बिपक्ष ही एक जुट कर लें। टूटटा उसी का कुनबा। जो लक्छ से भटक कर बुनता। इसलिए वह भी भ्रम में है। भोगते वे सब जो भ्रम में है। जिसे जन जन ने संधाना। अटल मन कर जिसे ठाना। संघ ने जिसको पोसा है। समर्पण से जो गूथा है। शक्ति उसमे ही बसती है। कर्म अनगिनत करती है। नोटबंदी ने भ्रम तोड़ा। सूक्छम धन ने जब घर छोड़ा। डब हुईं आंख माता की। कहें क्या बात खाता की। यही पूंजी तो घर में थी। हूं मैं धनाढ्य भ्रम में थी। अतिथि घर आज जो आता। नहीं सम्हाल मैं पाता। वह माता की ही पूंजी थी। सदा निश्चिंत रखती थी। वही पैसा वह ले भागा, बीच सरकार ज्यों कागा। ठगे से रह गए हम सब। लाये वापस है किसमे दम। वाह क्या बात मोदी की। पूरी सरकार मोदी की। ललित मोदी नीरव मोदी। भ्रमित मैं भी भ्रमित मोदी । भ्रमो का ही सब धंधा है। साफ कुछ न सब मंदा है। भ्रमो से पार अब निकलें। परस्पर आत्म मन कर लें। पारदर्शी बने खुद से। प्रमाणिक सत्य संयम से। खेये अपनी ये नैया को। ढूढे फिर युग कन्हैया को। जो आदर्शो में बसते हैं। नहीं वे घात करते हैं। प्रकृति भी साथ तब देगी। भारत का भाग्य भर देगी। हम सब मिल इसमें खेलेंगे। मनों का मैल धो लेंगे। पुण्य तप को संजोए अब। भ्रमित मन हो तो धोएं सब। जीवन सौभाग्य जागेगा, नया कुछ राग जागेगा। नया कुछ राग जागेगा।