जीवन मरण के बंधन से मुक्त करता है ये खास व्रत

नई दिल्ली/ प्रतिमा चतुर्वेदी। ज्येष्ठ माह के शुक्लपक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है। 13 जून को निर्जला एकादशी का व्रत है। पद्म पुराण के मुताबिक इस एकादशी को निर्जल व्रत रखते हुए विष्णु की पूजा पाप-तापों से मुक्त कर देती है।

पुराणकथा के मुताबिक देवर्षि नारद ने ब्रह्मा जी के कहने पर इस तिथि पर निर्जला व्रत किया। हजार वर्ष तक निर्जल व्रत करने पर उन्हें चारों तरफ नारायण ही नारायण दिखने लगे। नारद जी को भगवान विष्णु का दर्शन हुआ, उसके बाद नारायण ने उन्हें अपनी निश्छल भक्ति का वरदान दिया। तभी से निर्जला व्रत शुरु हुआ। इस धरा पर जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है।

ज्योतिषविद् कृष्णा शर्मा बताती हैं कि इस दिन भगवान विष्णु के लिए व्रत करने वाले व्यक्ति को निर्जला एकादशी की तैयारियां एक दिन पहले से ही कर लेनी चाहिए। दशमी तिथि पर सात्विक भोजन करना चाहिए। कृष्णा शर्मा आगे बताती हैं कि भगवान विष्णु को पीले फल, पीले फूल, पीले पकवान का भोग लगाएं। दीपक जलाकर आरती करें। ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। निर्जला एकादशी पर व्रत करने वाले अधिकतर लोग पानी भी नहीं पीते हैं। आपके लिए ये संभव न हो तो फलों का रस, पानी, दूध, फलाहार का सेवन कर सकते हैं। 

क्या है इस व्रत का का महत्व
ज्योतिषविद् कृष्णा शर्मा के मुताबिक एकादशी स्वयं विष्णु प्रिया हैं इसलिए माना जाता है कि इस दिन निर्जल व्रत जप-तप पूजा पाठ करने से प्राणी श्रीविष्णु का सानिध्य प्राप्त कर जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। सभी देवता, दानव, नाग, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, नवग्रह आदि के जरिए रक्षा और विष्णु भक्ति के लिए एकादशी का व्रत रखने के कारण इसे देवव्रत भी कहा जाता है।