निराकार मत वाले भी प्रकाश ज्योति को ईश्वर का स्वरूप मानते हैं – अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार। जड़ और चेतन के विभिन्न गुण-धर्म होने से भिन्नता प्रतीत होती है, जबकि जड़ भी उस एक ही परम चेतना का एक भिन्न रूप मात्र है; तत्विक दृष्टि से दोनों में कोई भेद नहीं है; इसी प्रकार आत्मा-परमात्मा दोनों ही चेतना शक्ति के रूप हैं। समष्टिगत-चेतन का नाम ईश्वर तथा व्यष्टि-चेतन का नाम आत्मा है ..! जड़ और चेतन एक-दूसरे से पृथक हैं ही नहीं। कोई जड़ ऐसा नहीं है जिसमें चेतना को कोई न कोई अंश विद्यमान न हो। पत्थरों तक में मन्दगामी हलचल होती है, धातुओं तक को जंग लगती और क्षरण-परिवर्तन होता है। समुद्र उफनते हैं, हवा में अन्धड़ चलते हैं, पृथ्वी में भूकम्प आते हैं, आकाश में इन्द्रधनुष देखे जाते हैं, पानी बरसता है, भाप उड़ती है, मौसम बदलते हैं। इन सबके साथ एक सूक्ष्म नियम व्यवस्था काम करती है, उसे सचेतन का ही प्रकार कहा जा सकता है। पड़ी लकड़ी में से कुकुरमुत्ते उग पड़ते हैं, गोबर-कीचड़ में कृमियों का जन्म होने लगता है। यह सब तथ्य बताते हैं कि जड़ नितान्त निर्जीव एवं गति विहीन नहीं है। इसी प्रकार चेतन के सम्बन्ध में भी यही कहा जा सकता है कि उसका स्वरूप देखना तो दूर कल्पना तक कर सकना कठिन है। उथली चेतना होने के कारण मनुष्येत्तर प्राणी ईश्वर के स्वरूप और नियमों के सम्बन्ध में कोई कल्पना तक नहीं कर सकते। मनुष्य भी निष्कलंक ब्रह्म के सम्बन्ध में अपनी सुनिश्चित आस्था नहीं जमा पाता। धर्म, धारणा और ध्यान साधना के माध्यम से ईश्वर के साथ सम्बन्ध जोड़ने की प्रक्रिया में उसे किसी न किसी आकार को कहीं न कहीं ठहरा हुआ कल्पित करना पड़ता है। विभिन्न सम्प्रदायों और साधना परम्पराओं ने ईश्वर का कोई न कोई ऐसा स्वरूप निर्धारित किया है, जिसका ध्यान बन पड़े और उसके साथ भक्ति-भावना का आरोपण सम्भव हो सके, नितान्त निराकार की कल्पना तक नहीं बन पड़ती। वेदान्त तक में, आत्म-स्वरूप में ईश्वर की ज्योति प्रकाशित होने की मान्यता है। इसके बिना तद्-विषयक कोई चिन्तन-चेतना उभरती ही नहीं। अतः निराकार मत वाले भी प्रकाश ज्योति को ईश्वर का स्वरूप मानकर काम चलाते हैं ..!

आचार्यश्री ने कहा वनस्पतियों, प्राणियों, सूक्ष्म जीवियों, जलचरों की जीवन-लीला और गतिविधियों पर गम्भीरता पूर्वक दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि यह सब आकस्मिक रूप से नहीं चल रहा है। हर घटक के पीछे कोई उच्चस्तरीय बुद्धिमत्ता काम कर रही है, अन्यथा बिखराव और टकराव का ऐसी स्थिति दिख पड़ती, जिसके कारण उत्पन्न हुई अव्यवस्था और अराजकता उड़ते गुब्बार के अतिरिक्त और कुछ भी दिख न पड़ती। किसी पदार्थ का कोई स्वरूप ही न बन पाता और न वह कुछ क्षणार्ध तक स्थिर ही रह पाता। सचेतन ही अचेतन पर नियन्त्रण कर सकता है। पदार्थ की छोटी इकाई के अन्तर्गत जिस प्रकार जितने परिकर काम करते और अपनी धुरी, कक्षा में भ्रमण करते देखे जाते हैं, उनसे स्पष्ट है कि यह नियमित अनुशासन भी किसी व्यापक सत्ता का ही इच्छापूर्वक अवस्था के अन्तर्गत रखा गया खेल है। प्राणियों के शरीरों में देखे जाने वाले अंग-अवयव, रसायन-जीवाणु अपने-अपने कार्य में इतने अधिक तल्लीन हैं मानो किसी ने उन्हें किसी आश्चर्यजनक कम्प्यूटर की तरह सुनियोजित किया हो। प्राणियों को क्षुधा निवृत्ति और वंश-वृद्धि के कर्मों में इस प्रकार जोता हुआ है कि वे अपनी व्यस्त जीवनचर्या को सरसता पूर्वक पूर्ण करते रह सकें। इन दोनों प्रयोजनों के लिए आवश्यक साधनों का सृजन भी इस प्रकार किया गया है कि वे हर किसी को सरलता पूर्वक उपलब्ध हो सकें। इतना ही नहीं ऋतुचक्र भी इस प्रकार का विनिर्मित है कि उससे निबटने के लिए हर जीवधारी को अपने कौशल का, समुचित अभिवर्धन करने का अवसर प्राप्त होता रहे। वनस्पतियों और प्राणियों का एक-दूसरे का पूरक बनकर रहना भी कितना विचित्र है कि यह विश्वास किये बिना रहा नहीं जाता कि यह समस्त विस्तार किसी बुद्धिमान तन्त्र के संरक्षण में चल रहा है। यदि सचेतन प्राणियों की उत्पत्ति से पूर्वकाल पर दृष्टि डाली जाये तो भी आदि कारण को खोजते-खोजते वहां पहुंचना पड़ेगा जहां चेतन की इच्छा या प्रेरणा के उपरान्त ही पदार्थ का अस्तित्व प्रकाश में आया। श्रुति वचनों में उसका उल्लेख है – ‘एकोहम् बहुस्यामि …’ सूत्र में यही प्रतिपादन है कि सृष्टा को शून्य स्थिति में रहना अखरा तो उसने इच्छा की, ‘एक से बहुत हो जाऊं’। फलतः परा और अपरा प्रकृति के रूप में दो प्रवाह फूट पड़े और सृष्टि का आरम्भ हो गया। ब्रह्माजी द्वारा सृष्टि के रचे जाने का अलंकारिक मिथक भी प्रकारान्तर से इसी स्थिति पर प्रकाश डालता है। इस प्रकार शास्त्र वचनों में भी इसी वस्तुस्थिति को उजागर किया गया है – ‘ऋतं च सत्यं च …’ आदि वर्णनों में भी इसी उपक्रम का विस्तार किया गया है। इस प्रकार यह अध्यात्म प्रधान पक्ष का प्रतिपादन हुआ …। ­­