जरूरत है कि आदर्श विवाहों का एक अभियान चलाया जाए- राम महेश मिश्र

नई दिल्ली। जीवन में कुछ मौके ऐसे आते हैं जब हम उन सुनहरे पलों को याद करते हुए जश्न मनाते है। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने कहा था “वसन्त आता नहीं लाया जाता है” जीवन में कई वसन्त आते है उत्साह लेकर, परन्तु विवाह एक ऐसा वसन्त लाता है जो एक नई पीढ़ी के आगमन का इतिहास लिख देता है। दो दिलों का, दो परिवारों का सुखद मिलन होता है, खुशियां होती हैं, एक दूसरे पर विश्वास होता है। सम्मान पाने और देने की भावनाएं होती हैं। एक दूसरे के जीवन की पूर्ण सुरक्षा, सहायता एवं सहयोग के फुल पैकेज का फिक्स डिपॉजिट होता है। कौन सा घर आंगन है जो पूरा होता है बिन पति-पत्नी के।

विवाह मानव जीवन का एक सर्वोत्कृष्ट यज्ञ है। दो आत्माएं अपना स्वतन्त्र अस्तित्व खोकर परस्पर एक दूसरे में विलीन होती हैं। उस संगम से एक सम्मिलित शक्ति का आर्विर्भाव होता है। गंगा ओैर यमुना के मिलन स्थल को संगम कहते हैं।

मिलन की महिमा अनुपम है। दो के मिलन से तीसरी एक नई व प्रबल शक्ति का आर्विभाव होता है। विलय इससे भी ऊंची शक्ति है। एक आत्मा का दूसरी आत्मा में लय हो जाना, अपने स्वतन्त्र अस्तित्व को समाप्त कर एक दूसरे के व्यक्तित्व में घुल जाना मानव प्राणी के द्वारा हो सकने वाले  सर्वोत्कृष्ट आध्यात्मिक पुरुषार्थ का प्रमाण है। विवाह एक नये परिवार का सृजन करता है। विशाल मानव समाज के अन्तर्गत एक स्वतन्त्र घटक अस्तित्व में आता है और यह अपनी स्वतन्त्र सृष्टि निर्माण करता है।

ऋषि अपनी लम्बी खोज के परिणास्वरूप इस निर्णय पर पहुंचे थे कि मनुष्य जीवन की सच्ची सुख-शान्ति और आनन्द आध्यात्मिकता में ही है। यही कारण है कि हमारी सभी छोटी से बड़ी क्रियायें धर्म से जुड़ी हुई हैं। विशाल मानव जाति की एकता का अनुभव तभी हो सकता है जब व्यक्ति समष्टि के लिए अपने व्यक्तित्व का बलिदान कर दे। इस त्याग को उद्भूत करने की प्रारम्भिक पाठशाला है परिवार और उसका आधार है विवाह प्रथा। विवाह के मधुर सम्बन्ध से आत्मभाव का विकास होता है। धीरे-धीरे दो दिल, दो परिवार, गांव, नगर, देश एवं विश्व में सम्बन्ध व्याप्त होकर ”वसुधैव कुटुम्बकम्” का उच्चतम आदर्श प्रस्तुत होता है। यह उच्चतम आत्म विकास प्रेम की अन्तिम सीढ़ी है और इससे वह अपने परम लक्ष्य को प्राप्त हो जाता है।

आज समाज में इस विवाह रूपी सुखद अनूभूति को आर्थिक परिदृश्य की कसौटी पर देखा जा रहा है। सम्पन्न परिवारों की चकाचौंध को देखकर मध्यवर्गीय परिवारों मे भी दहेज के लेन-देन की होड़ सी लग गयी है और इस लेन-देन ने अब एक विकराल समस्या का रूप धारण कर लिया है। इस दहेज रूपी दावानल के कारण कितनी बेटियां रोज बलिवेदी पर चढ़ा दी जाती हैं। कितनी रोज सतायी जाती है। कितने परिवार ऐसे हैं जो अपनी आजीवन की कमाई एक बेटी के विवाह में लगाकर भी लड़के वालां को खुश नहीं कर पाते और अपनी बेटी को रोज प्रताड़ित होते देखते हैं। आजकल विवाह में धन का अपव्यय, प्रदर्शन के नाम पर अत्यधिक हो रहा है। इन सब कुरीतियों को कम करने के लिये सामूहिक विवाहों की प्रथा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। समाज में व्याप्त दहेज प्रथा रूपी महामारी को कम किया जा सकता है, सामूहिक विवाह समारोहों के द्वारा।

आज समाज को नये विचारों की, नये सोच की आवश्यकता है, विवेकपूर्ण विचारधारा की आवश्यकता है। यह सामूहिक स्तर पर शुरू किया जाना चाहिये। समाज में व्याप्त दहेज प्रथा रूपी महामारी को कम किया जा सकता है सामूहिक विवाह समारोहों के द्वारा। सामूहिक विवाह, जाति व धर्म की सीमाओं से बंधा कोई सामान्य बन्धन नहीं, बल्कि एक “महापर्व“ है क्योंकि समुदायों एवं धर्मो के युगल जोड़े जन्म-जन्मान्तर के बन्धन में बंधकर धार्मिक समाजवाद का बेमिसाल नमूना प्रस्तुत करते हैं। एक साथ एक मण्डप में एक ही उद्देश्य के लिये विभिन्न धर्मों के मंत्र एक साथ पढ़कर सामूहिक वातावरण में धार्मिक सद्भावना का सन्देश देना समाज में एक नई पहल हो सकती है।

इस प्रकार के सामूहिक विवाह संस्कार गणमान्य विशिष्टजनों की साक्षी में होते हैं। सामूहिक विवाह होने से एकल विवाह में होने वाली फिजूलखर्ची को भी रोका जा सकता है। सामूहिक विवाह से सामाजिक सन्तुलन भी बना रहेगा। धन के निरर्थक अपव्यय और प्रदर्शन से भी बचा जा सकेगा। इन विवाहों से निर्धन पिता की मासूम पुत्री के वैभवपूर्ण हर्षोल्लास के साथ विदा होने के मृतप्राय सपनों को एक नयी उड़ान मिलती है और उसकी खुशी के आनन्द का सुख पूरा समाज एहसास करता है। धार्मिक अनुष्ठान के द्वारा सम्पन्न विवाह से समाज में एकता की भावना का विकास होगा। सामाजिक क्रान्ति के इस अनूठे आयाम से सामाजिक व धार्मिक समन्वय को नवोदित प्रोत्साहन मिलेगा। इससे जातिवाद, धर्मवाद जैसी बुराइयाँ स्वतः क्षीण हो जायेंगी। दहेज के नाम पर अनावश्यक खर्च न करके उपयोगी और आवश्यक जरूरतों को पूरा किया जाना चाहिये। इस प्रकार के विवाहों से हम एकल विवाह में होने वाली आतिशबाजी तथा इस तरह के अनावश्यक प्रदर्शनों पर भी रोक लगा सकते हैं, जिससे होने वाले प्रदूषण को भी कम किया जा सकता है। इस प्रकार धीरे-धीरे सुधार की दिशा में उठते हुए धीमे कदम भी अगले दिनों छोटी चिनगारी से बढ़कर सुधारात्मक क्रांति के रूप में विलक्षण परिणाम प्रस्तुत करेंगे।

 

लेखक (श्री राम महेश मिश्र) विश्व जागृति मिशन, नयी दिल्ली के निदेशक हैं।