“राष्ट्रहितों के हितैषी ब्राह्मणों की उपेक्षा न करें हमारी सरकारें और राजनैतिक दल” -राम महेश मिश्र

नई दिल्ली। इधर देश के अनेक ब्राह्मण संगठन उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण अधिकारियों व कर्मचारियों एवं जनता की घोर उपेक्षा और अपमान से आहत होकर भारतीय जनता पार्टी से दूर होने तथा कोई पात्र नहीं मिलने पर ‘नोटा’ का अभियानपूर्वक इस्तेमाल करने की पेशबन्दी कर रहे हैं, इससे मैं बेहद चिन्तित हूँ। हमने ऐसे संगठनों और उनके पदाधिकारियों को समझाने की भरपूर कोशिश की है। लेकिन उनके तर्क हमारी बातों पर भारी पड़ रहे हैं।

नीचे टैग पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक समाचार पर एक राष्ट्रीय बहस को होता हुआ हमने देखा व पाया है। हालाँकि किसी एस.पी. या अन्य अफ़सर का ट्रांसफ़र कोई बड़ा ईश्यू नहीं है, लेकिन यदि आमजनों तक को उसमें पक्षपात, भेदभाव अथवा जानबूझकर किया गया अपमान नज़र आने लगे, तो वह चिन्ता की बात है और गम्भीर चिन्तन की भी। आज अभी लखनऊ के युवा पत्रकार श्री कर्मवीर शांडिल्य द्वारा सनातन युवा वाहिनी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष श्री पुष्पेन्द्र मिश्र की पोस्ट पर लिखी बेहद चिन्तित करने वाली टिप्पणी के प्रतिउत्तर में हमने लिखा कि एक सन्यासी व योगी की सरकार में जातीय भेदभाव को लेकर ये बातें सुनना कत्तई अच्छा नहीं लग रहा।

पहले ये बातें देश और प्रदेश की राजधानी के स्तर पर होती थीं, अब नीचे जिलों, थानों और गाँवों से ऐसी बातें उठने लगना तो और ज़्यादा पीड़ादायक है। अब यह विषय बहराइच जिले तक सीमित नहीं रहा, यह विषय राष्ट्रीय बनता जा रहा है और उसमें ब्राह्मणों के साथ अतीत में हुए ढेरों पक्षपातों के प्रसंग भी जुड़ते जा रहे हैं। कुछ लोग अभी संकोच में हैं, वे भी देखादेखी मुखर होंगे।

अच्छे और प्रखर ब्राह्मणों का सरेआम अपमान अब देश भर के सहनशील ब्राह्मण भी सहन नहीं कर पा रहे हैं। जैसा समय-समय पर सुनने को मिलता है, उत्तर प्रदेश में यह बहुत बढ़ रहा है। इसे तत्काल रोका जाना चाहिए और इसमे बिना कोई देर किए सुधार लाया जाना चाहिए।

राजा (प्रशासक) की तुलना ईश्वर से की जाती है, उसकी दृष्टि में सभी बराबर होने चाहिए।ठीक 2019 के पहले बड़े स्तर पर शुरू हो गया यह विरोध आद.योगी जी तक सीमित नहीं रह जाएगा, बल्कि इसकी आँच व तपन अन्य प्रदेशों के साथ-साथ दिल्ली तक भी आएगी, जो राष्ट्र के वर्तमान परिदृश्य में भारत के लिए बिलकुल काश! ऐसा न हो और भाजपा इसे यथाशीघ्र नियंत्रित कर ले। इसका एक ही उपाय है- “सबका साथ-सबका विकास” और “सबका लिहाज़-सबका सम्मान”।

राजा (प्रशासक) की तुलना ईश्वर से की जाती है, उसकी दृष्टि में सभी बराबर होने चाहिए।ठीक 2019 के पहले बड़े स्तर पर शुरू हो गया यह विरोध आद.योगी जी तक सीमित नहीं रह जाएगा, बल्कि इसकी आँच व तपन अन्य प्रदेशों के साथ-साथ दिल्ली तक भी आएगी, जो राष्ट्र के वर्तमान परिदृश्य में भारत के लिए बिलकुल भी उचित नहीं।

काश! ऐसा न हो और भाजपा इसे यथाशीघ्र नियंत्रित कर ले। इसका एक ही उपाय है- “सबका साथ-सबका विकास” और “सबका लिहाज़-सबका सम्मान”।

आशा की जानी चाहिए कि माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी और माननीय श्री अमित शाह जी बिना कोई देर किए इसे अपने संज्ञान में लेंगे और त्वरित क़दम उठाकर वह सब कुछ अवश्य करेंगे, जो करणीय है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व को भी इस ओर गम्भीरता से ध्यान देना चाहिए।

चूँकि मैं स्वयं कई प्रभावशाली सार्थक आध्यात्मिक एवं सामाजिक संगठनों से मार्गदर्शक के नाते सम्मानास्पद अवस्था में प्रदेशीय, राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़ा हूँ, अतः मैं दख़ल देकर उन्हें ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि’ का हवाला देकर समझाने का भरसक प्रयत्न करूँगा। उनसे कहना चाहूँगा कि सभी स्वजन किंचित धैर्य रखें। बस! सरकारों के स्तर पर ध्यान यह रखा जाना चाहिए कि उनकी निगाह में सभी बराबर हैं और उनके किसी क़दम से ब्राह्मण अपने को बुरी तरह उपेक्षित व अपमानित महसूस न करें। यह बात केवल भाजपा से ही नहीं कही जा रही, बल्कि यह निवेदन सभी दलों से राष्ट्रहित में किया जा रहा है।

साभार- राम महेश मिश्र, संरक्षक, आल इंडिया जर्नलिस्ट यूनियन