कुंभ 2019: नाथ संप्रदाय में शिष्य बनने की परंपरा सबसे कठिन

प्रयागराज/ देवेश दुबे। यूपी के प्रयागराज में चल रहे कुंभ मेले में पहली बार नाथ संप्रदाय का अखाड़ा शामिल हुआ है। हालांकि पहले भी यहां नाथ आया करते थे, लेकिन अखाड़े के रूप में उनकी व्यवस्था पहली बार देखने में आई है। यहां कल्पवास करने नाथ संप्रदाय के प्रमुख और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ भी जल्द शिरकत करेंगे। नाथ संप्रदाय की स्थापना आदिनाथ भगवान शिव ने खुद की थी। यह किंबदंति भी प्रचलित है कि भगवान से ही मत्स्येन्द्रनाथ ने ज्ञान प्राप्त किया था और फिर मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य गोरखनाथ हुए। इस संप्रदाय में गुरु -शिष्य परंपरा से जुड़ी परंपरा सबसे कठिन मानी जाती है।

बाबा गोरखनाथ की आरती करते हुऐ योगी आदित्यनाथ जी

कर्ण छेदन के बाग होती है नाथ संप्रदाय में पहली एण्ट्री
महंत डॉ. योगी विलासनाथ महाराज के मुताबिक इस संप्रदाय में गुरु-शिष्य परंपरा बेहद कठिन है। दीक्षा प्राप्त करने को लेकर काफी रहस्य होता है। सबसे कठिन परीक्षा कर्ण छेदन के दौरान होती है। नाथ संप्रदाय में कान के निचले हिस्से में नहीं, बल्कि ठीक बीच के हिस्से में छेदन होता है, जहां से नसें और हड्डियां गुजरती हैं। शिष्य इस दर्द को जब सह लेता है, तभी उसकी पहली एण्ट्री नाथ संप्रदाय में मानी जाती है।

डॉ. योगी विलासनाथ महाराज

नाथ संप्रदाय में शामिल होने की प्रक्रिया
सर्व प्रथम शिष्य को पांच से सात साल गुरु सानिध्य में रहना पड़ता है। इस परंपरा में हठ योग द्वारा छोटी दीक्षा के साथ शिष्य का मुंडन कर चोटी काटी जाती है। उसका नामकरण कर नाथ जनेऊ पहनाया जाता है। चोटी काटने का मतलब उसका पूर्व जन्मों का लेखा-जोखा खत्म कर अब से नया जन्म होना माना जाता है। इसके बाद ही मंत्र मिल पाता है।

हठ योग की मुद्रा में योगी आदित्यनाथ जी

हठ योग के जरिए सिखाई जाती तपस्या
गुरु के आदेश पर शिष्य को 40 दिनों तक गुप्त स्थान पर रहना होता है। कर्ण छेदन को चीरा गुरु कहा जाता है। गुरु के आदेश पर शिष्य को 40 दिनों तक ऐसे स्थान पर बिना उपचार रहना होता है, जहां किसी से मिलना न हो सके। इसे अवधूत रूप में रहना कहते हैं। भोजन भी 40 दिनों तक वही करना होता है, जो गुरु आदेश होता है। गुरु ही अत्यधिक जरूरत पड़ने पर मिलता है। 40 दिनों में हठ योग के जरिये तपस्या सीखता है। कहा जाता है कि ऐसा करने से संसार, परिवार, भोग-विलासता से मोह भंग हो जाता है। सतयुग से पहले असंख्य युग नाथ संप्रदाय का था। उद्देश्य संस्कार, बाना गुरु संस्कार बाद में होता है। जमीन पर सोना, नंगे पांव ही रहना पड़ता है।

जर्मनी में नाथ संप्रदाय के सबसे ज्यादा अनुयायी
नाथ संप्रदाय में 4000 से ज्यादा विदेशी शिष्यों की तादाद है। जर्मनी, अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, ऑस्ट्रेलिया समेत कई स्थानों पर सैकड़ों विदेशी भी इस परंपरा से जुड़े हैं। देश में 80 से अधिक नाथ संप्रदाय से जुड़े मठ, आश्रम हैं। सभी लोग कुंभ के दौरान प्रयागराज आएंगे। सबसे ज्यादे अनुयायी जर्मनी में हैं।

गंगा तट पर नाथ साधु

उम्र के आखिरी पड़ाव में अखंड धूनी रमाते हैं नाथ साधु
हिन्दुओं के मुख्‍यत: चार संप्रदाय हैं- इनमें वैदिक, वैष्णव, शैव और स्मार्त। शैव संप्रदाय के अंतर्गत ही शाक्त, नाथ और संत संप्रदाय आते हैं। उन्हीं में दसनामी और 12 गोरखपंथी संप्रदाय शामिल है। जिस तरह शैव के कई उप संप्रदाय हैं उसी तरह वैष्णव और अन्य के भी हैं। भारत में नाथ संप्रदाय को संन्यासी, योगी, जोगी, उपाध्याय, बाबा, नाथ, अवधूत आदि नामों से जाना जाता है। ऐसी मान्‍यता है कि नाथ संप्रदाय के साधु-संत, दुनिया भर में भ्रमण के बाद उम्र के अंतिम चरण में किसी एक स्थान पर रुकते हैं और वहां अखंड धूनी रमाते हैं। अगर वे ये ना करना चाहें तो हिमालय में खो जाते हैं। एक नाथ साधु हाथ में चिमटा, कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध, जटाधारी धूनी रमाकर ध्यान करते हैं।

नाथ संप्रदाय के प्रमुख हैं योगी
नाथ संप्रदाय के मठ-मंदिर भारत के अलावा कई देशों में फैले हैं। नेपाल, पाकिस्तान, काबुल, म्यांमार समेत अनेक देशों में इसकी शाखाएं हैं। जबकि गुरु गोरखनाथ अखाड़ा का मुख्यालय हरिद्वार में है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अखिल भारतवर्षीय अवधूत मेध बारहपंथ योगी महासभा के अध्यक्ष हैं। महंत बालकनाथ के मुताबिक नाथ सम्प्रदाय की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। विश्व में योग-ध्यान की साधना के जरिए मानव को संन्मार्ग पर चलाना हमारा उद्देश्य है, जिसे लेकर दुनियाभर में मुहिम चल रही है।