हमारी संस्कृति नर से नारायण बनाने की संस्कृति है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

सीकर। जैसे ही अन्त:करण में शुभ-संकल्पता, सकारात्मकता और विधेयक भाव संपन्नता उदित होती है; उसी समय हमें संपूर्ण सृष्टि में सौन्दर्य, माधुर्य और अपनत्व अनुभूत होने लगेगा। अतः जीवन को आध्यात्मिक बनायें…! सकारात्मक सोच ही है जो बदल सकती है आपकी दुनिया और जीने का अंदाज़ भी। जो दे आपको जीने के लिए आशा की किरण और दिलाए सफलता प्राप्त करने का अचूक विश्वास। नकारात्मकता को दूर करने के लिए नित नूतन विचारों को पढ़ें, उनका प्रयोग करें। हम महापुरुषों की, वैज्ञानिकों की, विचारकों की आत्मकथाएं पढ़ सकते हैं। उनकी गौरव गाथाएं पढ़ें जिससे आप नैतिक रूप से मजबूत हो सकें। उनकी आत्म कथाओं से पता लगेगा कि उन्होंने चुनौतियां किस रूप में स्वीकारी, कठिनाइयों को किस तरह से सरल किया। सकारात्मकता का मतलब है- आप बहुत आशावादी हैं। आशावादिता का अर्थ यह है कि आप में निराशा नहीं है। सकारात्मकता तीन चीजें साथ लेकर चलती हैं। पहली – नव सृजन यानी नूतनता या अभिनवता। आपको हर चीज नई करनी है। दूसरी चीज है – पुरातन। इससे आपको सीखना है। पुरातन यानी भूतकाल आपका शिक्षक बने और भविष्य के प्रति आप आशावादिता रखें। अब तीसरी चीज है – वर्तमान। वर्तमान में यदि कहीं कठिनाई, दुविधा है या कोई चुनौती अनुभव कर रहे हैं तो इसका अर्थ है कि वो चुनौती आपकी सक्षमता को जगाने के लिए है। आप और अधिक योग्य बनें, श्रमवान बनें अथवा अपने सामर्थ्य को जगाएं। जिनमें हम देखते हैं कि सकारात्मकता खो गई है तो इसका अर्थ यह हुआ कि वे वर्तमान की प्रति सजग नहीं हैं और भविष्य के प्रति आशावादी नहीं हैं। आशावादिता एक चीज साथ लेकर चलती है जिसका नाम है – आत्मविश्वास। सकारात्मक व्यक्ति वही है जो अपने आत्मविश्वास को संभालकर रखता है। और, आत्मविश्वासी व्यक्ति ही सफलता की ओर बढ़ता है। आत्मविश्वास सफलता की कुंजी है। इसलिए सफलता वहां है जहां स्वयं के प्रति विश्वास है और इसका मूल है – सकारात्मकता…।

“आचार्यश्री” ने कहा – सकारात्मक विचारों से ही नकारात्मक विचारों पर विजय प्राप्त की जा सकती है। नकारात्मक सोच से बचने के लिए स्वयं के भीतर विश्वास पैदा करें। अपनी प्रतिभाओं को पहचानें। नकारात्मक विचारों वाले लोगों से दूर रहें। तनाव हमारी सोच को काफी हद तक प्रभावित करता है। तनाव की उत्पत्ति का मुख्य कारण ही नकारात्मक सोच है। नकारात्मक होना बहुत सरल है। रिजेक्शन में कोई कठिनाई तो है नहीं। स्वीकृति में जरूर कठिनाई है। हम जिस परिवेश में रह रहे हैं वह स्वाभाविक रूप से अस्वीकृति और अमान्यता का परिवेश है। इसमें शीर्षस्थ पुरुषों को भी अमान्य कर दिया जाता है। हमें उनकी नीतियों, उनके श्रम, साधना पर ध्यान देना होगा। अध्यात्म हमारी सोई हुई श्रद्धा को जगाने का कार्य करता है। जिस दिन भी आपमें माता-पिता के प्रति, बन्धु-बांधवों के प्रति, अपने से बड़ों के प्रति, संत-सत्पुरुषों के प्रति, गुरुजनों के प्रति श्रद्धा और विश्वास जाग जाएंगे तब जीवन में दिव्य परिणाम आने लगेंगे। श्रद्धा आपमें और आपके चिंतन में व्यापकता प्रदान करेगी। चिंतन में एक स्वीकृति पैदा हो जाएगी जो सबके लिए स्वीकृति है। आपमें ऐसी ग्राह्यता पैदा हो जाएगी कि आप ग्राह्म बन जाएंगे और धारण करने लग जाएंगे…।

“आचार्यश्री” ने कहा – विविधता- बहुरूपता सृष्टि का स्वभाव है, अतः अन्य के लिए आदर और सहज स्वीकृति रखें, यही दिव्यता है। अपने उत्साह को कम न होने दें और ना ही अपने सपनों को कम करें। हमेशा बड़े सपने को लेकर जीएं। जब आप ऐसा करेंगे तो जीवन में सदैव सक्रियता बनी रहेगी। इसके साथ में समय प्रबंधन भी आवश्यक है। एक और बात, जीवन को उत्सव बनाएं, उसमें कलात्मकता लाएं, फिर देखें पूरा जीवन आपको संगीत की तरह मधुर लगेगा। “आचार्यश्री” ने श्रीमद्भागवत कथा के महत्व को समझाते हुए कहा कि भागवत कथा वैचारिक पवित्रतायें प्रदान करती हैं। हमारी संस्कृति नर से नारायण बनाने की संस्कृति है। भागवत कथा सुनने से दीनता समाप्त हो जाती है। अभाव व संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। कुछ भी अपूज्य नहीं रहा जाता। श्रीमद्भागवत कथा सुनने से सभी पाप-ताप-संताप नष्ट हो जाते हैं। यह कथा मनुष्य को मनुष्य बनने के लिए प्रेरित करता है। मनुष्य अपने सोच व संकल्प की उपज है। मनुष्य की सोच सकारात्मक होनी चाहिए। यह कथा मृत को भी चैतन्य कर देता है। पत्थर में भी चेतना जगा देता है। मनुष्य में ईश्वरीय चैतन्य है। हमें विचार व कर्म की स्वायत्तता मिली है जबकि अन्य प्राणियों को नहीं। बुद्धि को परिभाषित करते हुए “आचार्यश्री” ने कहा कि जो ठीक निर्णय करे, वह बुद्धि है। बुद्धि व मन मोक्ष का साधन हैं। कथा से मन नियंत्रित होता है। वेदांत के अनुसार मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण मन ही है। पूज्य गुरुदेव कहा कहते हैं कि मन संसार का प्रवेश द्वार है। प्रत्येक द्वार की भांति मन रूपी द्वार के भी दोनों उपयोग प्रवेश तथा निकास संभव है। यदि मनुष्य मन का उपयोग संसार में प्रवेश हेतु करता है तो वह बंधन का कारण बनता है। लेकिन मनुष्य ये मन रूपी द्वार का उपयोग संसार से निकास (बाहर निकलने) में करता है तो यही मुक्ति अर्थात्, मोक्ष का कारण (साधन) बन जाता है। अतः मन के सम्यक उपयोग पर ही मनुष्य की मुक्ति निर्भर होती है…।