बहके जो मैकदे में नामजो पे आ गए, यूँ आकबत को हमने संवारा कभी कभी

नई दिल्ली/ प्रदीप दुबे। जब मधुशाला में ज्यादा पी लिया और परेशानी मालूम हुई, मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ ली l ऐसे ही हम अपनी दुनिया को सम्हाल रहे है l बड़े होशियार लोग है हम, बड़े ही कुशल, बड़े ही व्यवसायी हैं l गणित जानते है l मधुशाल में भी पी लेते है और मस्जिद में नमाज भी पढ़ आते है l ऐसे ही संसार को भी रिझा लेते है और परमात्मा को भी सम्हाले रखते है l चोरी भी कर लेते है और दान भी कर आते है l

बुद्ध कहते है कृत्य तुम्हारा है, तुम पर ही लौटेगा l देर अबेर हो सकती है, वर्तुल छोटा बड़ा हो सकता है, कभी तो जन्मों लग जाते है तुम तक पहुचने में, इतना बड़ा वर्तुल होता है l जैसे की तुम आवाज दो और चाँद तारो से प्रतिध्वनि हो, तो जन्मों लग जायेंगे l बड़ा समय बीतेगा l पर लौटेगी प्रतिध्वनि l संसार के आखिरी किनोरो से लौटेगी l तुम यहाँ ना होवोगे, तुम कही और होवोगे, पर लौटेगी l

इसीलिए तो तुम कई बार चौकते हो की कभी बुरा तो किया नहीं, इतना दुःख पर रहा हूँ l किया होगा l अकारण यंहा कुछ भी नहीं होता l बुद्ध की दृष्टि बड़ी वैज्ञानिक तर्क लिए हुए है l वे कहते है, जो मिलता है, वह दिया होगा l जो काटते हो, वह बोया होगा l जो भोग रहे हो, वह तुम्ही ने निर्मित किया होगा l हम सब अपने ही बनाये घरों में रहते है l स्वयं से जात, स्वयं से उत्पन्न और स्वयं से किया गया पाप, दुर्बुद्धि मनुष्य को उसी तरह नष्ट करता है जिस तरह पत्थर से उत्पन्न वज्रमणि पत्थर को ही काट देती है l