“माँ को मानों और माँ की भी मानों, परमात्मा की अवज्ञा की तो नहीं मिलेगी कहीं भी ठौर” 

नई दिल्ली। हमें आज आपसे यही कहना है कि वो जो परमात्मा है ना! जो हमारे सम्मुख हर समय है, आगे, पीछे, दायें, बायें, हर जगह; अपनी साधना में और अपने ध्यान में उस परम-शक्ति का अहसास  करो, उसे अनुभव करो। अगर हम चाहते हैं कि वह शक्ति हमारे अन्दर उतर आये, तो तुम्हें थोड़ा झुकना पड़ेगा, अपना पूर्ण समर्पण उस दिव्य शक्ति के सम्मुख करना पड़ेगा। यह बात आज समझ लो या कभी आगे समझो, लेकिन समझनी पड़ेगी; इसके बिना कोई बात बनेगी नहीं।
अब्राहिम अबहम नाम के अच्छे चिन्तक हुए हैं और कहना चाहिए कि वे सन्त परम्परा के एक जागृत विभूति थे। जो भी सूफी लोग रहे हैं ना! उनकी एक अलग तरह की परम्परा रही है। ज्ञान कहीं से भी निकला हो, किसी के भी मुँह से आया हो, ग्रहण करना चाहिए। भाषा अलग हो सकती है, वेश अलग हो सकता है लेकिन धारा उसी तरह से जागती है। उन्होंने कहा कि अगर तू उसका दास है, तू अपने मालिक का भक्त है, तो इस बात का खयाल रखना कि उसके राज्य में तू बसता है और उसका दिया हुआ खाता है। तू उससे प्यार करना सीख, जिससे मालिक तेरा हो सके, वह सम्पूर्ण रूप से तेरा बन सके। उनने कहा कि जब कभी मालिक के हुकुम की अवज्ञा कर बैठो, कभी हुक्मऊदूली कर जाओ, मतलब तुमसे कोई गुनाह हो जाये तो एक काम करना कि मालिक की दी हुई रोजी उस दिन मत खाना। ये अच्छा नहीं है कि जिसकी तुम रोटी खाते हो, उसका कहा न मानो। और अगर उसकी दी हुई रोजी-रोटी खाते हो तो इस बात का ध्यान रखना कि उसका हुक्म मानना है, उसके कहे हुए के अनुसार चलना है।
सन्तश्री ने कहा कि अवज्ञा करके उसके यहाँ रहो मत। या तो उसकी मानो अथवा उसका राज जहाँ तक चलता है वहाँ से बाहर चले जाओ। जब ये मानता है कि उसका राज तो हर जगह है, तब भी उसका कानून तोड़कर तू उसके यहाँ रहना चाहता है? ना! ना! ऐसा नहीं हो सकता, तू उसके राज्य में कहीं पर भी नहीं रह सकता। प्रभु से विपरीत तेरी मर्ज़ी नहीं चल सकती। तेरी मनमर्ज़ी के कारण जब परमात्मा तेरे विपरीत हो जाएगा तो तुझे कहीं पर भी ठौर नहीं मिल सकेगी, तू बहुत परेशान होगा और कोई भी तेरी सहायता नहीं कर पाएगा।
सन्त अबहम ने कहा था कि अगर अल्लाह को मानते हो तो फिर उसकी अवज्ञा नहीं करना, उसके नियमों को न तोड़ना, उसकी हुक्मउदूली नहीं करना; बल्कि उनकी सारी बातों को मानना। नवरात्रि पर्व पर आज कलश स्थापना के साथ ही हमारा संकल्प हो कि हम माँ को मानेंगे और माँ की भी मानेंगे। प्रभु को मानेंगे और प्रभु की भी मानेंगे, धर्मग्रंथों को मानेंगे और धर्मग्रंथों की भी मानेंगे। मैं आज आपसे कहता हूँ कि आप ऐसा ही करना।
लेखक विश्व जागृति मिशन नई दिल्ली के संस्थापक हैं।