आखिर क्या था यज़ीद के ख़िलाफ़ इमाम के उठ खड़े होने का असली मक़सद

लखनउ/ बुशरा असलम। जब से करबला में आशूरा की घटना घटी है उस वक़्त से आज तक उस घटना के दर्शकों, मासूम इमामों, शायरों, ख़तीबों, लेखकों और दूसरे लोगों नें उसके बारे में बहुत कुछ कहा और बहुत कुछ लिखा है लेकिन वास्तविकता यह है कि आज तक उसे पूरी तरह कोई बयान नहीं कर सका है। फ़ारसी के मशहूर शायर मौलाना रूम कहते हैं-

अगर मैं उस घटना को बयान करने बैठ जाऊँ और उसे खोलकर बयान करने लगूँ तो सौ क़यामतें गुज़र जाएंगी लेकिन उसके बारे में बातें ख़त्म नहीं होंगी।

ईरान में इस्लामी इन्क़ेलाब की सफलता से पहले इस घटना के बारे में अनेक कोणों से परखने की कोशिश होती थी इसी तरह इन्क़ेलाब के बाद भी काफ़ी कुछ इस बारे में लिखा और बोला गया। लेकिन आज भी मुसलमानों को करबला के बारे में सोचनें, बात करने, लिखने और उसके रास्ते पर चलनें की ज़रूरत है। मेरी नज़र में आज की बीमार दुनिया का इलाज केवल यह है कि वह इमाम हुसैन अ. के बताये हुए सिद्धांतों को समझें, उनके बताए हुए रास्ते पर चलें। अगर हम इतना काम कर लें कि इस घटना को सही तरह से दुनिया के सामने बयान करें और उसे अपनी ज़िन्दगी, अपने इन्क़ेलाब, अपने समाज और अपने सिस्टम में अमल कर के दिखाएं तो इस तरह हम दुनिया के लिये बहुत बड़ी ख़िदमत कर सकते हैं।

आज पिछली कुछ शताब्दियों से हसैन इब्ने अली अ. को ज़्यादा पहचाना गया है। आज दुनिया के आज़ाद और सही सोच रखने वाले और विचारक लोग इमाम हुसैन अ. और करबला के बारे में विचार करते हैं तो उनके सर झुक जाते हैं। यहाँ तक कि वह लोग जो इस्लाम को नहीं समझते, जिन्हे इस्लाम के बारे में कुछ भी नहीं मालूम लेकिन आज़ादी, इन्साफ़, इज़्ज़त, इन्सानी मूल्यों जैसी चीज़ों को समझते हैं वह सब इमाम हुसैन अ. को अपना इमाम और आइडियल मानते हैं।

हमारी पूरी ज़िन्दगी इमाम हुसैन अ. की याद और उनकी मोहब्बत से भरी है। इसके लिये ख़ुदा का लाख लाख शुक्र अदा करते हैं। अगरचे करबला और आशूरा के बारे में काफ़ी कुछ बयान हुआ है लेकिन अभी बहुत कुछ है जो बयान नहीं हुआ, जो हमारे सामने नहीं आया, इस लिये ज़्यादा से ज़्यादा सोचने की और बयान करने की ज़रूरत है।

इमाम हुसैन अ. यज़ीद के ख़िलाफ़ क्यों खड़े हुए?

जब इमाम हुसैन अ. नें यज़ीद के ख़िलाफ़ उठने का इरादा किया तो बहुत से लोग इमाम के पास आये और एक तरह से उन्हे समझाना शुरू किया: आप मक्के या मदीने ही में रहिये यहां आपका बहुत ज़्यादा आदर किया जाता है या आप यमन चले जाइये वहाँ आपके बहुत ज़्यादा शिया हैं वहाँ जाकर इस्लाम का प्रचार कीजिये, इबादत कीजिये आप यज़ीद के ख़िलाफ़ कुछ न कीजिये यज़ीद भी आपसे कुछ नहीं कहेगा लेकिन इमाम नें उन लोगों की बातों पर कान नहीं धरे और यज़ीद के ख़िलाफ़ खड़े हो गये। यहाँ सवाल यह उठता है कि इमाम यज़ीद के ख़िलाफ़ क्यों उठे? क्या वजह थी?

क्या इमाम हुकूमत चाहते थे?

कुछ लोग कहते हैं इमाम का मक़सद यह था कि फ़ासिक़ यज़ीद को हटा कर ख़ुद हुकूमत करें इसलिये आपनें यज़ीद से जंग का ऐलान किया। यह बात किसी हद तक सही है हम उसको बिल्कुल ग़लत भी नहीं कह सकते क्योंकि बहेरहाल तमाम इमामों की एक ज़िम्मेदारी यह रही है कि वह इस्लामी हुकूमत बनाने की कोशिश करें, इमाम की नज़र में यह चीज़ भी थी कि अगर उन्होंने यज़ीद को पराजित कर दिया और हकूमत उनके हाथो में आ गई तो हकूमत करेंगे इस तरह कहा जा सकता है हकूमत भी इमाम की नज़र में थी लेकिन बात केवल यही नहीं थी बल्कि उसके अलावा भी कुछ था।

सिर्फ 8 दिन में ही उजड़ गई थी कर्बला की बस्ती

कर्बला का नाम सुनते ही मन खुद-ब-खुद कुर्बानी के ज़ज्बे से भर जाता है। जब से दुनिया का वजूद कायम हुआ है, तब से लेकर अब तक न जानें कितनी बस्तियां बनीं और उजड़ गईं, लेकिन कर्बला की बस्ती के बारे में ऐसा कहते हैं कि यह बस्ती सिर्फ 8 दिनों में ही तबाह कर दी गई। 2 मुहर्रम 61 हिजरी में कर्बला में इमाम हुसैन के काफिले को जब याजीदी फौज ने घेर लिया तो हुसैन साहब ने अपने साथियों से यहीं खेमे लगाने को कहा और इस तरह कर्बला की यह बस्ती बसी।इस बस्ती मे इमाम हुसैन के साथ उनका पूरा परिवार और चाहने वाले थे। बस्ती के पास बहने वाली फुरात नदी के पानी पर भी याजीदी फौज ने पहरा लगा दिया। 7 मुहर्रम को बस्ती में जितना पानी था, सब खत्म हो गया। 9 मुहर्रम को याजीदी कमांडर इब्न साद ने अपनी फौज को हुक्म दिया कि दुश्मनों पर हमला करने के लिए तैयार हो जाए। उसी रात इमाम हुसैन ने अपने साथियों को इकट्ठा किया। तीन दिन का यह भूखा, प्यासा कुनबा रात भर इबादत करता रहा। इसी रात (9 मुहर्रम की रात) को इस्लाम में शबे आशूर के नाम से जाना जाता है। दस मुहर्रम की सुबह इमाम हुसैन ने अपने साथियों के साथ नमाज़-ए-फ़र्ज अदा किया। इमाम हुसैन की तरफ से सिर्फ 72 ऐसे लोग थे, जो मुक़ाबले में जा सकते थे। यजीद की फौज और इमाम हुसैन के साथियों के बीच युद्ध हुआ, जिसमें इमाम हुसैन अपने साथियों के साथ नेकी की राह पर चलते हुए शहीद हो गए और इस तरह कर्बला की यह बस्ती 10 मुहर्रम को उजड़ गई।

तो क्या आपका मक़सद शहादत थी?

कुछ लोग कहते हैं हुकूमत वुकूमत की बात ग़लत है क्योंकि इमाम हुसैन अ. जानते थे कि वह यज़ीद को पराजित नहीं कर सकते बल्कि अस्ल बात यह है कि इमाम केवल शहीद होने के लिये आये थे, कई शताब्दियों तक यह बात कही जाती रही है (और आज भी कही जाती है) बहुत से लोग शाएरी में यही बात कहते थे (और कहते हैं) बल्कि हमारे बहुत से बड़े बड़े उल्मा नें भी यही बात कही है। वह कहते हैं: जब इमाम हुसैन अ. नें देखा कि ज़िन्दा रह कर इस्लाम और दीन के लिये कुछ नहीं किया जा सकता तो मर कर ही कुछ करते हैं अलबत्ता हमारी शरीयत में इस बात की इजाज़त नहीं है कि कोई इन्सान इस लिये जाए ताकि मार दिया जाए हाँ हमारे यहाँ शहादत है और शहादत को और शहीद को बहुत महत्व दिया गया है। शहादत का मतलब यह है कि इन्सान बहुत बड़े काम के लिये जो वाजिब हो या कम से कम जाएज़ हो अगर उसके लिये वह मारा जाए तो उसे शहीद कहा जाता है और यही सही इस्लामी शहादत है। इमाम हुसैन अ. नें जिस मूव्मेंट की शुरुवात की वह केवल यह नहीं थी कि घर से निकलो, मैदान में जाओ और शहीद हो जाओ बल्कि इमाम बहुत बड़े मक़सद के लिये निकले थे जिसमें शहीद भी हो सकते थे (बल्कि उन्हे शहीद होने का यक़ीन था) लेकिन इमाम का मक़सद केवल शहादत नहीं थी।

एक वाजिब पर अमल

इस लिये न यह कहना सही है कि इमाम केवल हुकूमत के लिये उठे थे और नाहि यह कहा जा सकता है कि इमाम का मक़सद केवल शहादत था। मेरी नज़र में वह लोग जिन्होंने यह कहा है कि इमाम का मक़सद हुकूमत था या वह लोग जो यह कहते हैं उनका मक़सद शहादत था उन्होंने लक्ष्य और परिणाम को आपस में मिला दिया है। इमाम का मक़सद इनमें से कुछ नहीं था अलबत्ता आप ने जिस रास्ते को चुना था उसका परिणाम इन दो में कोई एक चीज़ थी, हुकूमत या शहादत और हज़रत दोनों के लिये तैयार थे। इनमें से जो भी हाथ आता इमाम के लिये सही था लेकिन इनमें से कोई भी इमाम का मक़सद नहीं था बल्कि दोनों परिणाम थे। मक़सद कुछ और था। अगर हम इमाम के मक़सद को बयान करना चाहें तो हमें इस तरह कहना होगा कि आपका मक़सद एक बहुत अहेम वाजिब को अंजाम देना था। एक ऐसा वाजिब जिस पर इमाम से पहले किसी नें अमल नहीं किया था क्योंकि इमाम के अलावा किसी भी इमाम के ज़माने में इस तरह के हालात नहीं थे कि वह इस वाजिब को अंजाम देते (या यूँ कहा जाए कि वह उनके लिये वाजिब ही नहीं था)

इस्लाम का एक अहेम हुक्म जिसे पैग़मबरे इस्लाम स. नें बयान तो किया था लेकिन उस पर अमल करके नहीं दिखाया वह यह है कि अगर किसी ज़माने में इस्लाम की गाड़ी पटरी से बिल्कुल उतर जाए और दीन को बिल्कुल उलट दिया जाए तो उस वक़्त मुसलमानों की ज़िम्मेदारी क्या है? अगर पैग़म्बरे इस्लाम नें इस एक चीज़ को बयान न किया होता तो आपका काम अधूरा रह जाता लेकिन आपनें उसे बयान किया था और मुसलमानों को बताया था कि अगर कभी ऐसा हो जाए तो उस वक़्त उन्हे क्या करना है। उन्होंने बताया था कि अगर कभी मुनाफ़िक़ों, ताक़त वालों, पैसे वालों, हुकूमत वालों नें इस्लाम की गाड़ी को पटरी से हटा दिया और वह बिल्कुल उल्टे रास्ते पर चलने लगी तो उस वक़्त उन्हे क्या करना होगा। पैग़म्बरे इस्लाम के ज़माने में तो ऐसा नहीं हुआ लेकिन उनके बाद इमामों के ज़माने में ऐसा होने का ख़तरा था अब जिस इमाम के ज़माने में भी ऐसा होता उसके लिये वाजिब और ज़रूरी था कि वह पैग़म्बर (स.) के बताए हुए इस रास्ते पर चलता। अगर हज़रत अली अ. के ज़माने में ऐसा होता तो उन पर वाजिब था, अगर इमाम हसन अ. के ज़माने में होता तो उनके लिये ज़रूरी था, अगर इमाम अली नक़ी अ. या इमाम हसन अस्करी अ. के ज़माने में होता तो उन पर वाजिब था अलबत्ता यह हालात इमाम हुसैन अ. के ज़माने में पैदा हुए इस लिये उन पर वाजिब हो गया था कि इस पर अमल करते इसी लिये जब ऐसे हालात पैदा हो गए तो इमाम यज़ीद के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए, हुकूमत हासिल करने या शहीद होने के लिये नहीं बल्कि उस वाजिब पर अमल करने के लिये। यह था यज़ीद के ख़िलाफ़ इमाम के उठ खड़े होने का असली मक़सद।