मन की संवेदनशीलता ही दुःख की अनुभूति कराती है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

अम्बाला।अनियंत्रित कामना ही दुःख का कारण है। अतः अन्तहीन कामनाओं के सैन्यदल को पराभूत करने के लिए विवेक-व्यूहरचना एवं संयम-सजगता साधक की प्राथमिकता होनी चाहिये…! मनुष्य के दु:ख का, संताप का, परेशानियों व दुर्गति का कारण है – अनियंत्रित कामना, इच्छा व वासना। इच्छा की अपूर्ति में दु:ख होता है एवं इच्छा में बाधा लगने से ही क्रोध की उत्पत्ति होती है। अगर कोई क्रोधी है, तो इसका कारण है कि उसके भीतर इच्छाएं दबी पड़ी हैं। यदि आप दुःखों से निवृत्ति चाहते हैं तो अति संग्रह वृत्ति से विरत होना होगा। गृहस्थी को कुछ संग्रह चाहिए… हारी-बीमारी का सामना करने के लिए। पर, पीढियों तक का संग्रह करने की चाह दुःखदायी है। इस मृगतृष्णा में भटकता-भटकता आदमी बुढापे में अत्यन्त ही अस्थिर चित्त एवं बैचेनी का जीवन जीता है। महत्वाकांक्षी होना पाप नहीं है, पर अति महत्वाकांक्षा दूसरों के हित एवं अधिकारों का हनन करके ही प्राप्त की जा सकती है। महत्वाकांक्षा की अंधी दौड़ के कारण ही आज का आदमी एक ही रात में करोड़पति बनने के नुस्खे खोजने लगता है। यह माफियावाद, यह तस्करी, यह आतंकवाद, यह भोगवाद सब अति महत्वाकांक्षा के ही परिणाम हैं। अतः हमें सीमाओं में जीने का अभ्यास करना चाहिए। सुख एवं शान्ति के लिए इन्द्रिय संयम बहुत आवश्यक है। आज की उपभोक्तावादी संस्कृति की चकाचौंध से बचकर एक सीधा एवं सरल जीवन का अभ्यास ही वास्तविक सुख एवं शान्ति दे सकता है….।

आचार्यश्री ने कहा – जो बीज बोएंगे, वही फल काटेंगे। हम सभी अच्छा स्वास्थ्य चाहते हैं, हम सभी आनन्द चाहते है, हम सभी सुख की बरसात चाहते हैं; परन्तु, न तो आनन्द बरसता है और न ही सुख की बयार बहती है। हमारी चाह से फल नहीं आते, हम जो बोते हैं उससे आते हैं। हम बो रहे हैं जहर और चाहते हैं अमृत। एक आदमी घृणा के बीज बोए और प्रेम की फसल काटना चाहे। एक आदमी क्रोध के बीज बोए और शांति पाना चाहे। मैं सबको दु:ख पहुंचाऊं, लेकिन मुझे कोई दुःख न पहुंचाए। मैं सबको धोखा दूं, पर मुझे कोई धोखा न दे। ऐसा संभव नहीं है। जो हम बोएंगे, वही हम पर लौटने लगेगा। जीवन का सूत्र ही यह है कि जो हम फेकते हैं, वही हम तक लौटकर आता है। चारों ओर हमारी ही फेंकी हुई ध्वनियां प्रतिध्वनित होकर हमें मिल जाती हैं। थोड़ी देर अवश्य लगती है। पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – प्रार्थना का फल उत्तम हो, इसके लिए हमें अपने अंदर उत्तम विचार और एकाग्र मन उत्पन्न करने होते हैं, क्योंकि विचार ही मनुष्य को पीड़ा पहुंचाते हैं या उससे मुक्त करते हैं। हमारे विचार ही हमें ऊंचाई तक ले जाते हैं या फिर खाई में गिरा देते हैं। यह मन ही हमारे लिए दु:ख लाता है और यही आनंद की ओर ले जाता है। दुःख क्या है तथा इससे निवृत्त होने के क्या उपाय हैं? इन दोनों प्रश्नों का समाधान व्यक्ति को सुख एवं शान्ति दे सकता है। दुःख तीन प्रकार के हैं – आधि, व्याधि एवं उपाधि। आधि से अर्थ है – मानसिक कष्ट। व्याधि से अर्थ है – शारीरिक कष्ट; एवं उपाधि से मतलब है – प्रकृति जन्य व समाज द्वारा पैदा किया गया दुःख। इन सभी दुःखों को अनुभव करने वाली चीज का नाम है – मन। मन की संवेदनशीलता ही दुःख की अनुभूति कराती है। प्रिय संवेदन मन को सुखी बनाते हैं तथा अप्रिय संवेदन मन को दुःखी बनाते हैं। चाह की पूर्ति से मन महसूस करता है, अचाह के आगमन से मन दुःखी हो जाता है। जिस स्थिति में मन रमता है, वह सुख की स्थिति है तथा जिस स्थिति से मन भागना चाहता है वह दुःख की स्थिति है। इसीलिए कहा गया कि ‘मन एवं मनुष्याणं कारणं बन्ध मोक्षयोः …‘ अर्थात्, मन ही मनुष्य के बन्धन का कारण है तथा मन ही मुक्ति का साधन है….।