मन, मानव जाति को मिला एक वरदान है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

अम्बाला। पवित्र-मन, समर्पित-बुद्धि, निराभिमानता और सत्संग-सातत्त्य भवतारक साधन हैं! शुद्धि के बिना सिद्धि संभव नहीं है। तभी तो हमारे दैनिक जीवन में पवित्रता का विशेष महत्व है। साधना की पहली सीढ़ी है – शुद्धि। यानी, यम और नियम का पालन। जीवन में जितनी पवित्रता होती है, जीवन का उत्कर्ष भी उतना ही होता है। शुद्धि से तात्पर्य मात्र शरीर का नहीं है; बल्कि मन, प्राण और भाव-विचार के साथ-साथ हमारा अंत:करण भी निर्मल होना चाहिए। शुद्धि का प्रारंभ समता से होता है। इसके माध्यम से व्यक्ति धीरे-धीरे अज्ञान व अंधकार के आवरण से पार पाता है। इस शुद्धि के फलस्वरूप मन की शांति, चित्त की स्थिरता और प्राण की एकाग्रता व हृदय की तन्मयता का प्रादुर्भाव स्वभावत: होने लगता है और आनंद का अवरोहण भी तभी संभव होता है। शुद्धि से आत्मा विभिन्न वासनाओं और आकर्षणों से मुक्त होती है। सिद्धि प्राप्ति से पहले की प्रारंभिक अवस्था शुद्धि है। शुद्ध भावों वाला व्यक्ति ही परमात्मा को प्रिय होता है। पूजन-अर्चन व प्रार्थना में शुचिता यानी पवित्रता का विशेष महत्व है। आचार-विचार के साथ-साथ जीवन के अन्य क्षेत्रों, जैसे – व्यापार में पैसे के लेन-देन और नौकरी आदि में ईमानदारी व क‌र्त्तव्य के प्रति निष्ठावान बने रहना भी पवित्रता की ही श्रेणी में आते हैं। व्यक्ति चाहे किसी भी क्षेत्र में कार्यरत हो, वह वहां रहते हुए भी पवित्रता का ध्यान रख सकता है। पवित्रता को नित्य-प्रतिदिन की दैनिकचर्या में रखकर हम अपने बौद्धिक स्तर तो उत्तम बना ही सकते हैं, साथ ही स्वयं सुखी रहते हुए अन्य लोगों को भी इस राह पर अग्रसर कर सकते हैं। पवित्रता जीवन का मूल आधार है। आज समाज में जो नैतिक पतन हो रहा है, उसका एक खास कारण शुचिता की ओर ध्यान नहीं दिया जाना है। व्यक्ति जैसे ही पवित्रता की तरफ एक कदम बढ़ाता है, उसकी सोच में निखार आने लगता है, उसकी भौतिक प्रगति के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी होती है। अन्य लोग भी ऐसे व्यक्ति के प्रति श्रद्धा व आस्था का भाव रखने लगते हैं। जो भी महापुरुष या ऋषि-मुनि इस देश में हुए हैं, उन्होंने साधना के संदर्भ में पवित्रता को विशेष महत्व दिया है। वे ही हमारे प्राचीन व आधुनिक भारत के प्रेरणास्त्रोत बने। सच तो यह है कि पवित्रता का ध्यान रखे बिना मानव जीवन का कल्याण संभव नहीं है…।

 “आचार्यश्री” ने कहा शक्तिशाली मन इस धरती पर मात्र एक ही प्राणी को मिला है और वह है – मनुष्य। मन मानव जाति को मिला एक वरदान है। “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत” … यह बात महज एक कहावत ही नहीं है, बल्कि पीढिय़ों के अनुभव से जन्मी ऐसी उक्ति है, जो शरीर के पर मन की ताकत को सहज ही समझा जाती है। जीवन के भौतिक कार्यों को करने में निस्संदेह हम अपने शरीर का ही इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वही भौतिक शरीर तब हमारा साथ नहीं देता, जब हमारा मन बहुत उदास होता है। दूसरी तरफ हर्ष और उल्लासभरा मन एक कमजोर और रुग्ण शरीर से भी कठिन कार्य करवा लेता है। मन की इस अद्भुत क्षमता का हम सबने अपने जीवन में कभी न कभी अनुभव अवश्य किया होगा। पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – जीवन में बदलाव के लिए सत्संग परम आवश्यक है। अच्छी संगति में अच्छे विचारों का ज्ञान प्राप्त होने के साथ अच्छे गुणों का भी जन्म होता है। सत्संग में समय का सदुपयोग होता है, जिससे पारिवारिक जीवन भी सुखी होता है। सत्संग से साधक के सत्त्वगुण की मात्रा बढ़ाने के लिए सहायता प्राप्त होती है। सत्संग में आने वाले अन्य साधक अपने ही हैं, ऐसा भाव निर्माण होता है। सुख की इच्छा, आशा और भोग ये तीनों दु:ख के कारण हैं, इनसे निवृति सत्संग से ही संभव है। परमात्मा के संग से योग और संसार के संग से भोग होता है। अतीत की स्मृतियाँ और भविष्य की कल्पनाएँ मनुष्य को वर्तमान जीवन का सही आनंद नहीं लेने देतीं। वर्तमान में सही जीने के लिये आवश्य है – अनुकूलता और प्रतिकूलता में सम रहना। अध्ययन, विचार, मनन, विश्वास एवं आचरण द्वारा जब एक मार्ग को मजबूती से पकड़ लिया जाता है, तो अभीष्ट उद्देश्य को प्राप्त करना बहुत सरल हो जाता है। भीष्म पितामह ने भगवान श्रीकृष्ण को अपनी बुद्धि समर्पित करते हुए अपने प्राणों का त्याग कर दिया। अतः हमें भी अपनी बुद्धि को भगवान के श्रीचरणों में समर्पित करना चाहिए, ताकि वह निर्मल रहे और हमें भी मुक्ति प्राप्त हो जाए…।