योग से मन बुद्धि और आत्मा सकरात्नक कार्यों में अग्रसर रहती है – आचार्य लोकेश मुनि

नईदिल्ली। दिल्ली के आई.सी.सी.आर. में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय योग परंपरा व अनुप्रयोग कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए अहिंसा विश्व भारती के संस्थापक जैन आचार्य डा. लोकेश मुनि ने कहा कि योग से व्यक्ति का सर्वांगीण विकास संभव है। योग से नकारात्मक सोच नष्ट होती है और सकारात्मक विचार उत्पन्न होते है। योग से मन बुद्धि और आत्मा सकरात्नक कार्यों में अग्रसर रहती है जिससे मन, बुद्धि और कर्म का विकास होता है। कांफ्रेंस को  योगी अमृत देसाई एवं डी.आर. कार्तिकेयन ने भी संबोधित किया।

आचार्य लोकेश ने योग की परंपरा व अनुप्रयोग पर चर्चा करते हुए कहा कि योग विज्ञान हजारों वर्ष पुराना है, किसी भी धर्म की उत्पत्ति से पहले। योग भारत की सभ्यता और परम्पराओं में शामिल है। आज सम्पूर्ण विश्व योग विज्ञान को अपनाने का प्रयत्न कर रहा है यह मानव जाति के लिए अति उत्तम है। भारत मानवता के कल्याण के लिए योग को विश्व के कोने कोने में ले जाने में अहम भूमिका निभा रहा है।

आचार्य लोकेश ने आगे कहा कि योग व्यक्ति के विभिन्न स्तरों पर कार्य करता है शरीर, मन, बुद्धि एवं उर्जा। योग का चार भागों में वर्गीकरण किया जा सकता है, कर्म योग में शरीर का, भक्ति योग में मन का, ज्ञान योग में बुद्धि का व क्रिया योग में उर्जा का उपयोग होता है।

योग को 40 वर्ष पूर्व सर्वप्रथम पश्चिमी देशों में ले जाने वाले योगी अमृत देसाई ने इस अवसर पर अपने संस्मरण सुनाये। योग अभ्यास की विशेषता को रेखांकित करते हुए उन्होंने योग क्रियाओं का अभ्यास भी कराया।