देहभाव से ऊपर उठ कर आत्मभाव की मंजिल तक पहुँचना ही ध्यान है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार/ पंकज कौशिक। सुख-दुःख, मान-अपमान और लाभ-हानि सब मन के अनुभव हैं। मनुष्य जैसे ही स्वयं के स्वरूप से परिचित होता है; तब केवल आनन्द ही आनन्द है…! आनंद की अनुभूति बाहर से नहीं होती। भूल करके आनंद को सुख न समझना। आनंद और सुख में अंतर है। सुख दुःख का अभाव है; जहां दु:ख नहीं है, वहां सुख है। जबकि दु:ख सुख का अभाव है, क्योंकि जहां सुख नहीं है, वहां दुख है। आनंद में दु:ख और सुख दोनों का अभाव होता है; जहां दु:ख और सुख दोनों का अभाव होता है, वैसी चित्त की परिपूर्ण शांत स्थिति आनंद की स्थिति है।

आनंद का अर्थ है – जहां बाहर से कोई भी आंदोलन हमें प्रभावित नहीं कर रहा, न दु:ख का और न सुख का। सुख भी एक संवेदना है, दु:ख भी एक संवेदना है। सुख भी एक पीड़ा है और दु:ख भी। सुख भी हमें बेचैन करता है, दु:ख भी हमें बेचैन करता है। दोनों अशांतियां हैं। इसे थोड़ा अनुभव करें, सुख भी अशांति है और दु:ख भी अशांति है। दु:ख की अशांति अप्रीतिकर है, जबकि सुख की अशांति प्रीतिकर है। लेकिन दोनों उद्विग्नताएं हैं, दोनों चित्त की उद्विग्न, उत्तेजित अवस्थाएं हैं। सुख में भी आप उत्तेजित हो जाते हैं। आनंद सबके भीतर है। महावीर को, बुद्ध को, क्राइस्ट को जो आनंद मिला वह आनंद आप में भी विद्यमान है। आप में और उनमें आनंद की दृष्टि से भेद नहीं है, भेद केवल ज्ञान की दृष्टि से है। पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा कि ध्यान का अर्थ है – मन को एक स्थान पर एकाग्र कर लेना। देहभाव से ऊपर उठ कर आत्मभाव की मंजिल तक पहुँचना ही ध्यान है। मन बुद्धि में लीन हो जाता है और बुद्धि आत्मा में लीन होकर परम आनंद प्राप्त करती है, अहंकार का अस्तित्व खो जाता है। इस अवस्था में हम अपने भीतर की यात्रा आरंभ करते हैं। हमारे मस्तिष्क से निकलने वाली तरंगें व्यवस्थित होने लगती हैं और सोई हुई शक्तियाँ जागने लगती हैं। हम उत्साह, उल्लास और मस्ती से भर जाते हैं..।

“आचार्यश्री” जी ने कहा – दुःख भी उत्तेजना है, सुख भी उत्तेजना है। अनुत्तेजना आनंद है। जहां कोई उत्तेजना नहीं, जहां चेतन पर बाहर का कोई कंपन, प्रभाव नहीं कर रहा, जहां चेतन बाहर से बिलकुल पृथक और अपने में विराजमान है। उत्तेजना का अर्थ है – अपने से बाहर संबंधित होना, अपने से बाहर विराजमान होना। जैसे झील पर लहरें उठती हैं, लहरें झील में नहीं उठती हैं, लहरें हवाओं में उठती हैं और झील में कंपित होती हैं। हवाओं के प्रभाव में, हवाओं के फर्क में झील पर लहरें उठती हैं। लहरों के उठने का अर्थ है – झील अपने से बाहर किसी चीज से प्रभावित हो रही है। अगर झील अपने से बाहर की किसी चीज से प्रभावित न हो तो क्या हो? तो झील परिपूर्ण शांत होगी, उसमें कोई लहरें नहीं होंगी। इसी तरह हमारा चित्त भी बाहर से प्रभावित होता है तो लहरें उठती हैं सुख की, और दु:ख की और जब हमारा चित्त बाहर से अप्रभावित होता है अथवा नहीं होता, तब जो स्थिति है उस स्थिति का नाम आनंद है। सुख और दु:ख अनुभूतियां हैं जो बाहर से आई हुईं, आनंद वह अनुभूति है जब बाहर से कुछ भी नहीं आता। आनंद बाहर का अनुभव न होकर अपना अनुभव है। इसलिए सुख और दु:ख छीने जा सकते हैं, क्योंकि वे बाहर से प्रभावित हैं, अगर बाहर से हटा लिए जाएंगे तो सुख और दु:ख बदल जाएंगे। जो आदमी सुखी था, किसी कारण से था; कारण हट जाएगा, दु:खी हो जाएगा। जो आदमी दु:खी था, किसी कारण से था; जब कारण हट जाएगा, तब वह सुखी हो जाएगा। अतःआनंद निःकारण है, इसलिए आनंद को छीना नहीं जा सकता। आपका सुख छीना जा सकता है, आपके दु:ख छीने जा सकते हैं, लेकिन आपका आनंद नहीं छीना जा सकता। जो भी बाहर पर निर्भर है वह छीना जा सकता है। इसलिए सुख भी क्षण स्थायी है, दु:ख भी क्षण स्थायी है, जबकि आनंद नित्य है। सुख भी परतंत्रता है और दु:ख भी परतंत्रता है, क्योंकि दूसरे का उसमें हाथ है। जबकि आनंद स्वतंत्रता है। इसलिए दु:ख भी बंधन है और सुख भी बंधन है परन्तु आनंद मुक्ति है…।