महाराजा अग्रसेन जयन्ती पर CM योगी ने दी बधाई

लखनउ/ बुशरा असलम। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने महाराजा अग्रसेन जयन्ती पर प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई दी है।
एक बधाई संदेश में मुख्यमंत्री जी ने कहा कि महाराजा अग्रसेन ने अपने शासनकाल में समाज के सभी वर्गाें के कल्याण के लिए कार्य किया। महाराजा अग्रसेन का बन्धुत्व तथा सद्भाव का संदेश वर्तमान समय में और अधिक प्रासंगिक है।

दरअसल महाराजा अग्रसेन त्याग, अहिंसा, शांति तथा समृद्धि के प्रतीक समाजसेवी अवतार थे। उनका जन्म प्रताप नगर के राजा वल्लभ के घर में हुआ। महालक्ष्मी व्रत अनुसार उस वक्त द्वापर युग का अंतिम चरण था। उन्होंने बचपन में ही वेदों, शास्त्रों, अस्त्रों-शस्त्रों, राजनीति तथा अर्थशास्त्र का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। सभी क्षेत्रों में कुशल बनने के बाद उनका विवाह नागों के राजा कुसुद की पुत्री माधवी के साथ हुआ। राजा वल्लभ ने संन्यास लेकर अग्रसेन जी को शासन की बागडोर सौंप दी। उन्होंने कुशलता के साथ राज्य का संचालन किया और इसका विस्तार करते हुए प्रजा के हितों के लिए काम किया। वह बहुत धार्मिक प्रवृत्ति के थे। उन्होंने अपने जीवन में कई बार देवी लक्ष्मी जी से यह वरदान हासिल किया कि जब तक उनके कुल में देवी लक्ष्मी की आराधना होती रहेगी तब तक अग्रकुल धन-धान्य से खुशहाल रहेगा।

देवी लक्ष्मी जी के आशीर्वाद से अग्रसेन जी ने नए राज्य के लिए रानी माधवी के साथ भारत-भ्रमण शुरू किया। अपने भ्रमण के दौरान वह एक स्थान पर रुके जहां उन्होंने देखा कि शेर तथा भेडि़ए के कुछ शावक खेल रहे थे। उन्होंने रानी माधवी को कहा कि यह बहुत शुभ संकेत है और यह क्षेत्र वास्तव में वीरभूमि है। उन्होंने इस भूमि को अग्रोहा नाम दिया और यहीं पर अपना राज्य बनाने का निर्णय लिया। आगे चलकर अग्रोहा कृषि तथा व्यापार के क्षेत्र में एक प्रसिद्ध स्थान बन गया।

अग्रसेन जी ने राज्य तथा प्रजा के कल्याण हेतु 18 यज्ञ किए जिनसे उनके 18 पुत्र पैदा हुए। उन्हीं के नाम से अग्रवाल समाज के 18 गोत्र बने। कहा जाता है कि 17 यज्ञ विधि-विधान से निर्विघ्न सम्पन्न हुए परन्तु 18वें यज्ञ से पहले उनके मन में आया कि इस पवित्र कार्य में पशु बलि जैसा अपवित्र कार्य क्यों? उन्होंने घोषणा की कि भविष्य में यज्ञ जैसे पवित्र कार्यों में पशु बलि के स्थान पर नारियल तोड़ कर पूर्णाहूति दी जाएगी। कहा जाता है कि महाराजा तथा उनके वंशजों ने बाद में वैश्य समुदाय स्वीकार कर लिया था। इसके पीछे देवी महालक्ष्मी जी का वरदान तथा पशु बलि के प्रति उनकी अरुचि ही मुख्य कारण थी।