प्रकृति की क्रियात्मक शक्ति हैं मां कात्यायनी

वाराणसी। मां कात्यायनी, यह देवी का छठां स्वरुप है। कात्यायन ऋषि के आश्रम मे प्रकट होने के कारण इनका नाम कात्यायनी पडा। ऋषि का गौत्र भी कात्य था अस्तु वह कात्यायनी के नाम से विख्यात हुई। ऋषि ने अम्बा की अराधना मे कठोर तप किया और प्रार्थना कि आप मेरे यहां पुत्री के रुप मे जन्म लें। भगवती को अजन्मा क्हा गया है। सीताजी का जन्म भी धरती के गर्भ से हुआ है। ऋषि के कठोर तप का ही परिणाम था कि मां ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार किया और अपने भक्त की मनोकामना करने के लिए पुत्री के रुप मे जन्म लिया।

ऐसा क्हा जाता है कि श्रीकृष्णजी को पति के रुप मे प्राप्त करने के लिए गोपियों ने इन्ही देवी की अराधना की थी। रुक्मणी की तो यह अराध्य देवी थी। विश्व का जीवन जीव के मन से संचालित होता है। जीवन और मृत्यु का कारण भी मन ही है। इसलिए मन की शक्ति कात्यायनी कही गई है। वह प्रकृति की क्रियात्मक शक्ति है जो मन को तत्त्वात्मक रुप से सचंलित करती है। मन को सर्वदा अधिक शक्तिशाली क्हा गया है, मन ही तृष्णा जागृत करता है, मन ही विकारो और क्लेशो का जनक है, जिसने मन को वश मे कर लिया उसने जग जीत लिया इंद्रियो और कामेंद्रियो पर जीत मन को जीतने से होती है।

ऋषि ने तप करके पुत्री के रुप मे जिस शक्ति की कामना की, उसका भाव यही है कि मेरी इंद्रियां वश मे हो जाये। मेरा मन पिता की तरह हो जाये और मन को पुत्री मानकर उसका लालन पालन करुं। अगर मन को पुत्री माना जाये तो सारी विषय वासनाएं अपने आप ही समाप्त हो जायेंगी। यही देवी कात्यायनी के पूजा का तात्पर्य है। दिव्य सौम्यस्वरुप, गौरवर्णा, त्रिनेत्री, अष्टभुजी, सिंह सवार, कात्यायन देवी साधना और तप को फलीभूत करने वाली देवी है।

मां कात्यायनी का भोग

छठे नवरात्रे मां कात्यायनी देवी के पूजन में मधु का महत्व बताया गया है। इस दिन प्रसाद में मधु यानि शहद का प्रयोग करना चाहिए। इसके प्रभाव से साधक सुंदर रूप प्राप्त करता है.

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

कात्यायनी शुभं दद्याद देवी दानवघातिनी।

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारुपेण संस्थिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

 

लेखक अभय पाण्डेय प्रख्यात ज्योतिर्विद् हैं।

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