प्रेम से घृणा का और क्षमा से प्रतिशोध की भावना का शमन होता है- राम महेश मिश्र

नई दिल्ली। मध्यप्रदेश के इन्दौर राज्य की रानी अहिल्याबाई बड़ी न्यायप्रिय थीं। उन्होंने राजमहल के द्वार पर घंटा लगवा रखा था, जिसे कोई भी पीड़ित व्यक्ति बजा सकता था। तब तुरन्त न्यायसभा लगती और पीड़ित को न्याय दिया जाता।

एक बार की बात है- नगर के एक मार्ग से ‘महारानी देवी अहिल्यावाई होल्कर के पुत्र ‘मालोजीराव’का रथ निकला तो उनके रास्ते में हाल ही की जनी गाय का एक बछड़ा सामने आ गया। गाय अपने बछड़े को बचाने दौड़ी तब तक मालोरावजी का ‘रथ गाय के बछड़े को कुचलता हुआ’ आगे बढ़ गया।

किसी ने उस बछड़े की परवाह नहीं की। गाय अपने बछड़े के निधन से स्तब्ध व आहत होकर बछड़े के पास ही सड़क पर बैठ गई। कहते हैं कि फिर गोमाता ने राजमहल जाकर द्वार पर लगे घंटे में अपना मुंह मारकर उसे बजा दिया और वापस चली गयी। अहिल्याबाई ने मालूम कराया, तब राजकाज देख रहे लोगों को गाय को और उसके पास पड़े मृत बछड़े को देखकर घटनाक्रम के बारे में पता चला।

सारा घटनाक्रम जानने पर रानी अहिल्याबाई ने दरबार में मालोजी की पत्नी मेनावाई से पूछा- यदि कोई व्यक्ति किसी मां के सामने ही उसके बेटे की हत्या कर दे, तो उसे क्या दंड मिलना चाहिए?

मालोजी की पत्नी ने जवाब दिया- उसे  प्राण दंड मिलना चाहिए।

देवी अहिल्यावाई ने मालोराव को हाथ-पैर बाँध कर मार्ग पर डालने के लिए कहा और फिर उन्होंने आदेश दिया मालोजी को मृत्यु दंड रथ से टकराकर दिया जाए। यह कार्य कोई भी सारथी करने को तैयार न था।

देवी अहिल्याबाई न्यायप्रिय थी। अत: वे स्वयं ही मां होते हुए भी इस कार्य को करने के लिए भी रथ पर सवार हो गईं। वे रथ को लेकर आगे बढ़ी ही थीं कि तभी एक अप्रत्याशित घटना घटी। वही गाय फिर रथ के सामने आकर खड़ी हो गई, उसे जितनी बार हटाया जाता उतनी बार पुन: अहिल्याबाई के रथ के सामने आकर खड़ी हो जाती।

यह दृश्य देखकर मंत्री परिषद् ने देवी अहिल्यावाई से मालोजी को क्षमा करने की प्रार्थना की, जिसका आधार उस गाय का व्यवहार बना। उस तरह गाय ने स्वयं पीड़ित होते हुए भी मालोजी को द्रौपदी की तरह क्षमा करके उनके जीवन की रक्षा की।

इन्दौर में जिस जगह यह घटना घटी थी, वह स्थान आज भी गाय के आड़ा होने के कारण ‘आड़ा बाजार’के नाम से जाना जाता है। उसी स्थान पर गाय ने अड़कर दूसरे की रक्षा की थी। ‘अक्रोध से क्रोध को, प्रेम से घृणा का और क्षमा से प्रतिशोध की भावना का शमन होता है’।

भारतीय ऋषियों ने यूं ही गाय को मां नहीं कहा है, बल्कि इसके पीछे गाय का ममत्वपूर्ण व्यवहार, मानव जीवन में, कृषि में गाय की उपयोगिता बड़ा आधारभूत कारण है। गौपालन व गौसंवर्धन करना हर भारतीय का नैतिक, सामाजिक और संवैधानिक कर्तव्य है।

लेखक विश्व जागृति मिशन नई दिल्ली के निदेशक और गोमती एक्शन परिवार लखनऊ के महासचिव हैं।