विद्या के बिना जीवन अधूरा है, विद्या सर्वश्रेष्ठ धन है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

सीकर। विद्या में विनय, विभूति और विराट समाहित है। अल्पता से अनंतता और सह-अस्तित्व का बोध विद्या की फल-श्रुति है..! आदि काल से ही हमारी भारतीय संस्कृति में विद्या का बड़ा महत्व रहा है। शिक्षा को अमरत्व का साधन माना गया है। “सा विद्या या विमुक्तेय …” का मंत्र एक मात्र भारतीय संस्कृति में ही मिलता है। और, इसी तरह से हमारी संस्कृति ने सनातन काल से गुरु शिष्य परंपरा के माध्यम से शिक्षा को जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग माना है। एक-एक क्षण गवाए बिना विद्या प्राप्त करनी चाहिए। विद्या विनय देती है; विनय से पात्रता, पात्रता से अर्थ (धन), अर्थ से धर्म और धर्म से मोक्ष की प्राप्ति होती है। विद्या अनुपम कीर्ति है; भाग्य का नाश होने पर भी यह आश्रय देती है। विद्या कामधेनु है, विरह में रति समान है, विद्या तीसरा नेत्र है, सत्कार का मंदिर है, कुल-महिमा है, विद्या बिना रत्न का आभूषण है। इसलिए अन्य सब विषयों को छोड़ कर विद्या का अधिकारी बनें। माँ सरस्वती का ये खजाना सचमुच अनमोल है, अवर्णनीय है। खर्च करने से ये बढ़ता है। और, संभालने से ये कम होता है। अतः विद्या जैसा कोई बंधु नहीं, विद्या जैसा कोई मित्र नहीं और विद्या जैसा अन्य कोई धन या सुख नहीं…।

“आचार्यश्री” ने कहा – ज्ञान से बुद्धि तीव्र होती है। जीवन में विद्या का बड़ा महत्व है। विद्या के बिना जीवन अधूरा है। विद्या सर्वश्रेष्ठ धन है। शिक्षा का क्षेत्र सीमित न होकर विस्तृत है। व्यक्ति जीवन से लेकर मृत्यु तक शिक्षा का पाठ पढ़ता है। प्राचीन काल में शिक्षा गुरुकुलों में होती थी। छात्र पूर्ण शिक्षा ग्रहण करके ही घर वापिस लौटते थे। लेकिन, आज जगह-जगह सरकारी और गैर-सरकारी विद्यालयों में शिक्षण कार्य होता है। वहां पर शिक्षक भिन्न-भिन्न विषयों की शिक्षा देते हैं। छात्र जब पढ़ने के लिए जाते हैं तब उसका मानसिक स्तर धीरे-धीरे ऊपर उठने लगता है। ”तमसो मा ज्योतिर्गमय …” अर्थात्, अधंकार से मुझे प्रकाश की ओर ले जाओ – यह प्रार्थना भारतीय संस्कृति का मूल स्तम्भ है। प्रकाश में व्यक्ति को सब कुछ दिखाई देता है, जबकि अन्धकार में नहीं। प्रकाश का तात्पर्य यहाँ ज्ञान से है। ज्ञान से व्यक्ति का अंधकार नष्ट होता है। उसका वर्तमान और भविष्य जीने योग्य बनता है। ज्ञान से उसकी सुप्त इन्द्रियाँ जागृत होती हैं । इस प्रकार उसकी कार्य क्षमता बढ़ती है, जो उसके जीवन को प्रगति पथ पर ले जाती है…।

“आचार्यश्री” कहा करते हैं कि जिधर से महापुरुष कर गए है उधर ही जीवन का मार्ग है। हम उन ज्ञानी पुरुषों का संग करें जो मानव समाज की जानकारी रखते हैं, जो जीवन-निर्माण के सिद्धांतों को समझते हैं। विद्वान आत्मविद्या और ब्रह्माविद्या को भली-भांति जानने वाले होते हैं। अच्छे लोगों की संगति करने से मनुष्य अपने ज्ञान में वृद्धि कर सकता है। शिक्षा द्वारा उपार्जित ज्ञान ही विद्या है। विद्या और ज्ञान एक अर्थ के दो पर्याय हैं। स्वामी दयानन्द जी का मानना था कि जिससे पदार्थों के यथार्थ स्वरूप का बोध हो वह विद्या है और जिससे वास्तविक स्वरूप न जान पड़े वह अविद्या कहलाती है। विद्या का धन सब धनों से प्रधान और श्रेष्ठ है। महाभारत में यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था – ‘यात्रा में सहायक कौन?’ तब युधिष्ठिर ने उत्तर दिया था – ‘विद्या’। परदेश में विद्या एक मित्र के समान सहायक होती है। इससे और आगे, विदेश में विद्या माता के समान रक्षक और हितकारिणी होती है, पिता के समान हित कार्यों में सहायक होती है। शिक्षा व्यक्ति को ज्ञान के प्रकाश से शुभाशुभ, भले-बुरे की पहचान करा के आत्म विकास की प्रेरणा देती है। अतः उन्नति का प्रथम सोपान शिक्षा है और इसके अभाव में हम लोकतंत्र और भारतीय संस्कृति की रक्षा नहीं कर सकते….।