सफ़ेद झूठ का एक दुखद उदाहरण: “कुतुबुद्दीन ऐवक और क़ुतुबमीनार का”

नईदिल्ली। किसी भी देश पर शासन करना है तो उस देश के लोगों का ऐसा ब्रेनवाश कर दो कि वो अपने देश, अपनी संस्कृति और अपने पूर्वजों पर गर्व करना छोड़ दें। इस्लामी हमलावरों और उनके बाद अंग्रेजों ने भी भारत में यही किया। हम अपने पूर्वजों पर गर्व करना भूलकर उन अत्याचारियों को महान समझने लगे, जिन्होंने भारत के लोगों पर बेहिसाब जुल्म किये थे।

अगर आप दिल्ली घूमने गए हों तो आपने विष्णु- स्तम्भ (क़ुतुबमीनार) को भी अवश्य देखा होगा. जिसके बारे में बताया जाता है कि उसे कुतुबुद्दीन ऐवक ने बनबाया था. हम कभी जानने की कोशिश नहीं करते,, कि कुतुबुद्दीन कौन था, उसने कितने बर्ष दिल्ली पर शासन किया, उसने कब विष्णु-स्तम्भ (क़ुतुबमीनार) को बनवाया या विष्णु-स्तम्भ (कुतुबमीनार) से पहले वो और क्या-क्या बनवा चुका था ?

कुतुबुद्दीन ऐवक मोहम्मद गौरी का खरीदा हुआ गुलाम था. मोहम्मद गौरी भारत पर कई हमले कर चुका था मगर हर बार उसे हारकर वापस जाना पडा था. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की जासूसी और कुतुबुद्दीन की रणनीति के कारण मोहम्मद गौरी, तराइन की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को हराने में कामयाबी रहा और अजमेर / दिल्ली पर उसका कब्जा हो गया।

अजमेर पर कब्जा होने के बाद मोहम्मद गौरी ने चिश्ती से इनाम मांगने को कहा. तब चिश्ती ने अपनी जासूसी का इनाम मांगते हुए, आज की दिल्ली के एक भव्य और अनुपम मंदिर की ओर इशारा करके गौरी से कहा कि तीन दिन में इस मंदिर को तोड़कर मस्जिद बना कर दो. तब कुतुबुद्दीन ऐवक ने कहा आप तीन दिन कह रहे हैं मैं यह काम ढाई दिन में करके आपको दूंगा।

कुतुबुद्दीन ने ढाई दिन में उस मंदिर को तोड़कर मस्जिद में बदल दिया. आज भी यह जगह “अढाई दिन का झोपड़ा” के नाम से जानी जाती है. जीत के बाद मोहम्मद गौरी, पश्चिमी भारत की जिम्मेदारी “कुतुबुद्दीन” को और पूर्वी भारत की जिम्मेदारी अपने दुसरे सेनापति “बख्तियार खिलजी” (जिसने नालंदा को जलाया था) को सौंप कर वापस चला गय था।

कुतुबुद्दीन कुल चार साल (१२०६ से १२१० तक) दिल्ली का शासक रहा. इन चार साल में वो अपने राज्य का विस्तार, इस्लाम के प्रचार और बुतपरस्ती का खात्मा करने में लगा रहा. हांसी, कन्नौज, बदायूं, मेरठ, अलीगढ़, कालिंजर, महोबा, आदि को उसने जीता. अजमेर के विद्रोह को दबाने के साथ राजस्थान के भी कई इलाकों में उसने काफी आतंक मचाया।

जिसे क़ुतुबमीनार कहते हैं, वो महाराजा वीर विक्रमादित्य की वेधशाला थी, जहाँ बैठकर प्रख्यात खगोलशास्त्री वराहमिहिर ने ग्रहों, नक्षत्रों, तारों का अध्ययन कर, भारतीय कैलेण्डर “विक्रम संवत” का आविष्कार किया था. यहाँ पर २७ छोटे-छोटे भवन (मंदिर) थे, जो २७ नक्षत्रों के प्रतीक थे और मध्य में विष्णु-स्तम्भ था, जिसको ध्रुव स्तम्भ भी कहा जाता था।

क़ुतुबुद्दीन ऐवक ने उन २७ मंदिरों को तुड़वा दिया।विशाल विष्णु स्तम्भ को तोड़ने का तरीका समझ न आने पर उसने उसे तोड़ने के बजाय अपना नाम दे दिया। तब से उसे क़ुतुबमीनार कहा जाने लगा. कालान्तर में यह यह झूठ प्रचारित किया गया कि क़ुतुबमीनार को कुतुबुद्दीन ऐवक ने बनबाया था. जबकि वो एक विध्वंसक था, न कि कोई निर्माता।

भारतीय घोड़े की बड़ी रोचक जानकारी:

अब बात करते हैं कुतुबुद्दीन की मौत की।इतिहास की किताबों में लिखा है कि उसकी मौत पोलो खेलते समय घोड़े से गिरने पर से हुई. ये सरासर झूठ है। कारण, तुर्क लोग “पोलो” नहीं खेलते थे, पोलो खेल अंग्रेजों ने शुरू किया. अफगान / तुर्क लोग बुजकशी खेलते हैं, जिसमें एक बकरे को मारकर उसका सिर लेकर घोड़े पर भागते हैं। जो व्यक्ति उसे लेकर मंजिल तक पहुंचता है, वो जीतता है।

सत्य यह है कि कुतबुद्दीन ने अजमेर के विद्रोह को कुचलने के बाद राजस्थान के अनेकों इलाकों में कहर बरपाया था. उसका सबसे कडा विरोध उदयपुर के राजा ने किया, परन्तु कुतुबद्दीन उसको हराने में कामयाब रहा. उसने धोखे से राजकुंवर कर्णसिंह को बंदी बनाकर और उनको जान से मारने की धमकी देकर, राजकुंवर और उनके घोड़े शुभ्रक को पकड कर लाहौर ले आया।

एक दिन राजकुंवर ने कैद से भागने की कोशिश की, लेकिन पकड़ा गया. इस पर क्रोधित होकर कुतुबुद्दीन ने उसका सर काटने का हुकुम दिया. दरिंदगी दिखाने के लिए उसने कहा कि बुजकशी खेला जाएगा लेकिन इसमें बकरे की जगह राजकुंवर का कटा हुआ सर इस्तेमाल होगा. कुतुबुद्दीन ने इस काम के लिए, अपने लिए घोड़ा भी राजकुंवर का “शुभ्रक” चुना।

कुतुबुद्दीन “शुभ्रक” घोड़े पर सवार होकर अपनी टोली के साथ जन्नत बाग में पहुंचा. राजकुंवर को भी जंजीरों में बांधकर वहां लाया गया. राजकुंवर का सर काटने के लिए जैसे ही उनकी जंजीरों को खोला गया, शुभ्रक ने ज़ोर से उछलकर कुतुबुद्दीन को अपनी पीठ से नीचे गिरा दिया और अपने पैरों से उसकी छाती पर कई बार किये, जिससे कुतुबुद्दीन वहीं पर मर गया।

इससे पहले कि सिपाही कुछ समझ पाते राजकुवर शुभ्रक घोड़े पर सवार होकर वहां से निकल गए. कुतुबुदीन के सैनिकों ने उनका पीछा किया मगर वो उनको पकड न सके. शुभ्रक कई दिन और कई रात दौड़ता रहा और अपने स्वामी को लेकर उदयपुर के महल के सामने आकर रुका. वहां पहुंचकर जब राजकुंवर ने उतरकर पुचकारा तो वह मूर्ति की तरह शांत खडा रहा।

शुभ्रक घोड़ा मर चुका था, सर पर हाथ फेरते ही उसका निष्प्राण शरीर लुढ़क गया। कुतुबुद्दीन ऐवक की मौत और शुभ्रक की स्वामिभक्ति की इस अनुपम घटना के बारे में भारतीय इतिहासकार मौन हैं। इस विषय पर हमारे देश के स्कूलों में तो कुछ नहीं पढ़ाया जाता है, लेकिन इस घटना के बारे में फारसी के प्राचीन लेखकों ने काफी कुछ लिखा है. *धन्य है भारत की वीरभूमि, जहाँ इंसान तो क्या जानवर भी अपनी स्वामिभक्ति के लिए अपने प्राण दांव पर लगा देते हैं।

विश्व जागृति मिशन के निदेशक राम महेश मिश्र के व्हाट्सएप से साभार