कुम्भ विभिन्न संस्कृतियों के मिलन का केन्द्र है – स्वामी चिदानन्द सरस्वती

प्रयागराज/ सदाकत हुसैन। लेह, लद्दाख की धरती से आर्य संस्कृति को लेकर संगम के पावन तट पर 30 सदस्यों का एक दल अपनी पारम्परिक वेशभूषा धारण कर पधारा, उन्होेने परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज और जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती जी से भेंटवार्ता की।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि भारत की संस्कृति, आर्य संस्कृति है यह संस्कृति आज भी लेह, लद्दाख के गांवों में जिंदा है। इस प्यारे दल ने अपनी संस्कृति के साथ सिन्धु का जल भी अपने साथ लाया है जिसे संगम में प्रवाहित किया गया तथा संगम, त्रिवेणी का पवित्र जल ले जाकर सिन्धु में डाला जायेगा जिससे सिन्धु और संगम दोनों ही एक नहीं होंगे बल्कि हम सब भी एक हो रहे हैं। यही तो संगम है; यही तो मिलन है जल का; संस्कृति का और संस्कारों का। 
स्वामी जी महाराज ने कहा कि इस देश का यही संगम है जिस तरह से नदियां मिलकर चलती है और महासागर बन जाती है, ये देश भी हम सभी की जाति-पाति के बन्धन तोड़कर, छोटी-छोटी दीवारों को तोड़कर, छोटी-छोटी बातों की दरारों को भरते हुये यह देश भी एक महासागर की तरह; एक महासंगम की तरह सदैव पूरे विश्व को संगम का संदेश देता रहे।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि आप सिन्धु नदी का जल लायें है हमने उसे संगम में अर्पण किया। हम सब मिलकर आपको संगम का जल सौगात में दे रहे है आप इसे लेह, लद्दाख की धरती में बह रही सुन्दर सिन्धु नदी में अर्पण करे। यह केवल सिन्धु और त्रिवेणी का संगम नहीं बल्कि हमारे देश का संगम है। स्वामी जी महाराज ने इतने वर्षो तक आर्य संस्कृति को बचाकर रखने हेतु उन सभी की सराहना की। करगिल क्षेत्र के आसपास के गांवों से आये कुछ बहादुर लोग ऐसे थे जिन्होने कारगिल युद्ध के समय में मुखबिरी करके सही समय पर गुप्त सूचनायें देकर कारगिल युद्ध में विजय प्राप्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वालों का अभिनन्दन किया तथा प्रेरित किया कि सीमाओं पर रह कर देश की सुरक्षा में अपना योगदान प्रदान करते रहे। पूज्य स्वामी जी के साथ सबने ’’गायत्री मंत्र एवं बुद्धं शरणं गच्छामि।’’ मंत्रों का उच्चारण कर पूरे वातावरण को गुंजायमान कर दिया। 
लद्दाख के सुदूर गांव से आये एक श्रद्धालु ने कहा कि हम माइनस 20 तापमान पर रहते हुये अपनी भारतीय संस्कृति को जिंदा रखे हुये है। हमारी टोपी पर लगे ये विभिन्न रंग विविधता में एकता का प्रतीक है इसको बनाये रखने में परमार्थ निकेतन की बहुत बड़ी भूमिका है। हमारी संस्कृति सर्वत्र प्रसारित हो इस हेतु हम हमेशा स्वामी जी महाराज के साथ है। हम कुम्भ में अपनी संस्कृति को सांझा करने आये है और यहां आकर गौरवान्वित अनुभव कर रहे है।
सेमआॅन गेलसन जी ने कहा हम पहली बार कुम्भ मेला में आये है। कुम्भ मेला में आना हमारे लिये सौभाग्य की बात है, सचमुच यह एक यूनीक अनुभव है। हमंे प्रसन्नता है कि हम अपने अनूठी संस्कृति को लेकर यहां पर आये हंै और स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने संगम आरती का अद्भुत प्लेटफार्म हमें प्रदान किया है। हम लद्दाख के दुर्गम प्रदेश के चार गांवांे से आये हैं। हमारे गांव हेरिटेज विलेज के रूप में स्थापित है। संगम आरती और स्नान कर हमारे तो चारों धाम हो गये है।
एक अन्य श्रद्धालु ने कहा कि हमारी संस्कृति और सभ्यता सिन्धु घाटी की सभ्यता है।  हमारी भाषा का उद्गम संस्कृत से ही हुआ है। हम लगभग 4 हजार से भी कम लोग है जो दुर्गम घाटियांे में सिन्धु घाटी सभ्यता को आज भी जिंदा रखे हुये है। उन्होने कहा कि हमेें यहां अपार आनन्द का अनुभव हुआ, हम भी यही चाहते है कि हमारी नदियां स्वच्छ रहे तथा हम सभी मिलकर भारत को स्वच्छ बनायें रखे।
लद्दाख से आये इस दल ने स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज के पावन सान्निध्य में संगम आरती में सहभाग किया तथा विश्व शान्ति की कामना करते हुये वाॅटर ब्लेसिंग सेरेमनी सम्पन्न की और जाने से पूर्व परमार्थ निकेतन शिविर में यज्ञ कुण्ड में आहूतियाँ दे कर लद्दाख, जम्मु काश्मीर तथा पूरे भारत वर्ष एवं पूरे विश्व की शान्ति के लिये प्रार्थना की साथ ही जल एवं धरती को स्वव्छ रखने का संकल्प लेकर ’’बनेगा स्वच्छ इण्डिया’’ अभियान से जुड़ने का संकल्प लिया।