“विरोधात्मक ऊर्जा का विस्फोट है क्रोध”-सुधांशु जी महाराज

नई दिल्ली। भगवान ने ये क्रोध दिया ही क्यों है? मन में यह विचार आना चाहिए। क्रोध क्या रूप लेकर प्रकट होता है? ये क्रोध है क्या चीज? यदि इसका विवेचन किया जाय तो कहना होगा कि आपके विरोध में जब भी कोई चीज खड़ी होती है और आप उसको सह नहीं पाते, तब आपकी ऊर्जा का एक विस्फोट होता है; वह ऊर्जा-विस्फोट ही ‘क्रोध’ कहलाता है। वह विरोध की भावना से शुरू होता है, और आप सामने वाले के विरोध पर उतर आते हैं। अक्सर विरोध पर यह उतरना होता है अपने बचाव के लिए, अपनी सुरक्षा के लिए। यही सत्यता है।

अगर आप अपने बचाव के लिए और अपनी सुरक्षा के लिए इसका प्रयोग कर रहे हैं, तो इसका मनु वाला रूप रखना। ऐसा रूप बनाये रखना कि तुम जब रोकना चाहो तो इसे रोक सको। सीधे ढंग से अगर कहा जाये तो कहना होगा कि इसे कितना भी नियंत्रित करो, इतना तो अन्दर बचा रह ही जायेगा, जिससे आपका काम ठीक ढंग से चल जाये। इसलिए इससे घबराओ नहीं। जितना हो सके उसे रोको, उसे हटाओ, मिटाओ और पोंछ डालो। बाद में जो कुछ थोड़ा बहुत बचेगा, उससे आपके संसार के व्यवहार अच्छे ढंग से पूरे हो सकते हैं।

इसलिए यह मत सोच लेना कि सारा ही क्रोध खत्म हो गया। तो फिर जिया कैसे जायेगा? दुनिया में रहा कैसे जायेगा? अगर इसको थोड़ा और विशुद्ध रूप में कहा जाये तो यह कह सकते हैं कि आग जब तक आपके नियंत्रण में है, तब तक वह आपके उपयोग की है और यदि नियंत्रण के बाहर हो गयी तो फिर पहले आपको जलायेगी, आपके घर को जलायेगी, आपकी सम्पत्तियों को ख़ाक करेगी, तबाह कर देगी।

जब आप यह बात समझने लग जाओगे कि मैं अक्सर आपे से बाहर होने लग जाता हूँ और कुछ का कुछ बोलने लग जाता हूँ, तब यह समझ लेना कि ये आग बरतन में रहने वाली नहीं है, चूल्हे में समाने वाली नहीं है, वह तो जलाने को तैयार खड़ी है; तब समझ लेना कि आपके सामने खतरा मँडराने लगा है और उस ख़तरे से बचने का उपाय आपको शुरू कर देना चाहिए। आप इस ख़तरे से आध्यात्मिक तौर-तरीक़ों से ही निजात पा सकते हैं।

लेखक विश्व जागृति मिशन के संस्थापक हैं।