जानिए प्रेम विवाह के बारे में ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय से…

वाराणसी। भारत में विवाह को एक पवित्र धार्मिक और सामजिक संस्कार माना जाता है । षोडश संस्कारों में से यह एक अनिवार्य संस्कार है । जाति , धर्म, भाषा ,देश ,आर्थिक स्तर  और कुटुंब की अनदेखी कर किये जाने वाले गन्धर्व विवाह या प्रेम विवाह के संकेत जातक की कुंडली में भी मिलते हैं  ।

कुंडली में प्रेम विवाह के योग

लग्नेश एवं सप्तमेश का स्थान परिवर्तन या युति होना प्रेम विवाह का कारण  बनता है। पंचम भाव एवं सप्तम भाव प्रेम विवाह में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। पंचमेश एवं सप्तमेश की युति पंचम या सप्तम भाव में होना या दोनों का राशि परिवर्तन करना या पंचमेश और  सप्तमेश में दृष्टि सम्बन्ध होना प्रेम-विवाह का  कारण बनता है।

गुरु और शुक्र दाम्पत्य जीवन में पति और पत्नी के कारक ग्रह हैं। लड़कियों के जन्मपत्री में गुरु का पाप प्रभाव में होना और पुरुष की कुंडली में शुक्र ग्रह का पाप प्रभाव में होना प्रेम-विवाह की सम्भावना को बढ़ाता है ।

लग्नेश एवं पंचमेश की युति या दृष्ट सम्बन्ध या राशि परिवर्तन प्रेम विवाह योग को उत्पन्न करता है ।

राहु का लग्न/सप्तम भाव में बैठना और सप्तम भाव पर गुरु का कोई प्रभाव न होना प्रेम विवाह का कारण बन सकता है ।

नवम भाव में धनु/मीन राशि हो और शनि/राहू की दृष्टि सातवें भाव, नवम भाव और गुरु पर हो तो प्रेम विवाह होता है ।

सातवें भाव में राहु+मंगल हों ।

राहु+मंगल+सप्तमेश तीनो वृष/तुला राशि में हो तो प्रेम-विवाह का योग बनता है ।

जन्मलग्न ,सूर्यलग्न और चन्द्रलग्न में दूसरे भाव और उसके स्वामी का सम्बन्ध मंगल से हो तो भी प्रेम विवाह होता है ।

कुंडली का दूसरा भाव पाप प्रभाव में हो या उसका स्वामी शुक्र, राहु शनि के साथ  बैठा हो और सप्तमेश का सम्बन्ध शुक्र ,चन्द्र एवं लग्न से हो  ।

जन्म लग्न या चन्द्र लग्न में शुक्र का पांचवे/नवें भाव में बैठना प्रेम विवाह का  कारण बनता है ।

लग्न में लग्नेश+चन्द्रमा हो  तो प्रेम विवाह होता है या सप्तम में सप्तमेश+चन्द्रमा  हो तो भी प्रेम-विवाह हो सकता है  ।

लेखक अभय पाण्डेय प्रख्यात ज्योतिर्विद् हैं।

9450537461, abhayskpandey@gmail.com