भारतीय अध्यात्म के शिखर का सूर्य हुुआ अस्त

आज गंगा, गंगा सागर बनी और गंगा का विलय गंगासागर में हो गया। वैसे संतों का धरा पर क्या आना और क्या जाना, वे तो सदैव हम सभी के अन्तर्मन में; वे हमारे संस्कारों में; संस्कृति में और विचारों में जीवित रहते है उनका मार्गदर्शन हमेंशा हमें मिलता रहता है और आगे भी मिलता रहेगा। उन्होने आज देह जरूर त्यागी परन्तु वे देह-देव बनकर हमेशा हमारे बीच रहे और आगे भी रहेंगे। आज सनातन परम्परा के उस महान शिखर को श्रद्धांजलि; भावांजलि और पूष्पांजलि अर्पित करता हूँ, फिर न देखने को मिलेगा ऐसा महान शिखर।
हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व की रक्षा के लिये उन्होने अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनका हर कर्म सनातन परम्परा और वैदिक संस्कृति प्रचार-प्रसार के लिये ही था। वे भारत में ज्ञान और विज्ञान को एक साथ विकसित करना चाहते थे। उनका लक्ष्य था कि भारतीय युवा भारतीय आध्यात्मिक परिपेक्ष में वैज्ञानिक विकास करे; ऐसे वैज्ञानिक विकास की आंकाक्षा उनके मन में थी जिसका सामन्जस्य प्रकृति के साथ हो; ऋषि परम्परा पर आधारित हो और समस्त प्राणि जगत के हित में हो ताकि वसुधैव कुटुम्बकम का भाव चरितार्थ हो सके। उनका मानना था की सनातन परम्परा का मानव जीवन में धार्मिक दृष्टिकोण के साथ वैज्ञानिक पहलुओं के आधार पर भी महत्वपूर्ण योगदान है। वे मानते थे कि संस्कार युक्त मनुष्य प्रकृति, प्राणि और पर्यावरण के साथ बेहतर सम्बंध स्थापित कर सकता है। संस्कार, मनुष्य को धार्मिक ही नहीं बल्कि उत्कृष्ट बनाते है। वे महज 19 वर्ष की उम्र में शंकराचार्य बना दिये गये थे तब से उन्होने समाज के पीड़ित और निर्धन परिवारों के लिये अनेक सेवा कार्य की शुरूआत की। वे सेवा को ही अध्यात्म का प्रथम सोपान मानते थे उन्होने अनेक बार बड़े मंचों से अयोध्या मसले पर अपने स्पष्ट विचार रखे जिनकी सराहना भी हुई। वे वेदों के ज्ञाता ही नहीं वेदमय जीवन पद्धति को अपनाने वाले पुरोधा थे। आज वे हमारे साथ स्थूल रूप में तो नहीं है परन्तु सुक्ष्म रूप में हमेशा विद्यमान रहंेगे।
पूजा करते करते जिनका जीवन ही पूजा था, पूजा में ही लीन हो गया। स्नान के पश्चात आचमन करते हुये वे परब्रह्म के साथ एक हो गयेे। वे ईश्वर के साथ एक थे, एक है और एक रहेंगे। उनका जीवन ही पूरे समाज के समर्पित था उनके नाम का स्मरण कर पूरा सनातन चरित्र आचमन लेता था; गंगा का आचमन लेता था, आज उन्होने स्वंय आचमन के साथ आपने जीवन को प्रभु का आचमन बना दिया, ऐसे महापुरूष के सान्निध्य मेेें मुझे रहने का उनसे मिलने का अनेक बार अवसर प्राप्त हुआ। मुझे आज भी याद है जब महाग्रन्थ हिन्दू धर्म विश्वकोश का प्रारम्भ हुआ था तब उन्होने उस महाग्रन्थ की सफलता के लिये दक्षिण भारत से 400 प्रकाण्ड विद्वानों को लाकर यज्ञ किया था, आज वहीं हिन्दू धर्म विश्व कोश पूरे विश्व में, अनेकों विश्व विद्यालयों में सनातन संस्कृति के ज्ञान को वितरित कर रहा है और भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शन कर रहा है। मुझे याद आ रहा है कि जब वर्ष 1989 का कुम्भ मेला था जिसमें सनातन संस्कृति के कांची मठ कांचीपुरम के शंकराचार्य पूज्य जगद्गुरू जयेंद्र सरस्वती जी महाराज और बौद्ध परम्परा के शीर्षस्थ शिखर परम पावन दलाई लामा जी से मैने प्रार्थना कि की दोनों मिलकर संगम के तट पर आरती करे उन्होने इसे स्वीकार किया और उस भव्य और दिव्य आरती कोे पूरे विश्व के मीडिया चैनलों ने स्थान दिया था। आरती के माध्यम से दिये उस सद्भाव, एकता, समरसता, सादगी और एक-दूसरे के प्रति सम्मान के भाव का संदेश और वे क्षण आज भी मुझे स्मरण है।पूज्य जगद्गुरू जयेंद्र सरस्वती जी महाराज का स्वभाव और प्रभाव दोनों अद्भुत थे। वे भारत के हर परिवार मंे भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों को स्थापित करना चाहते थे और उन्होने पूरा जीवन इस हेतु समर्पित कर दिया। वे सादगी, सरलता और सजगता की त्रिवेणी थे। उन्होने हमेशा प्रयत्न किया कि वे ज्ञान के साथ विज्ञान का समन्वय कर एक अद्भुत परम्परा की स्थापना करे। आज वह ज्ञानरूपी गंगा हमारे बीच नहीं है;आज सनातन परम्परा का एक सूर्य अस्त हो गया, कांची मठ कांचीपुरम के शंकराचार्य पूज्य जगद्गुरू जयेंद्र सरस्वती जी महाराज सनातन परम्परा के महान स्तंभ थे उन्होेने सनातन परम्परा, वेद विद्यालय की स्थापना, गौशाला-गौ संरक्षण और वेदों के संरक्षण हेतु जीवनपर्यन्त अभुतपूर्व योगदान दिया । उनके जाने के पश्चात सनातन परम्परा को जो क्षति हुई है उसे युगों-युगों तक भूलाया नहीं जा सकता।
वे वेदों के ज्ञाता, वेद और उपनिषदों के उद्घोषक थे। यूनाइटेड नेशन में भारत से पहली बार 108 संतों एवं अनेक महापुरूषों का प्रतिनिधि मण्डल पूज्य जयेंद्र सरस्वती जी महाराज के नेतृत्व मंे अमेरिका की धरती पर पंहुचा था और सबसे पहली बैठक उन्ही के साथ हुई थी। इस प्रतिनिधि मण्डल ने पश्चिम की धरती पर भारतीय अध्यात्म, दर्शन और भारतीय संस्कृति की ध्वाजा को फहराया था। वे अध्यात्म और विज्ञान; ज्ञान और विज्ञान के समन्वय का स्ंतभ थे, जो भी वे कहते थे; जो भी वे सोचते थे वैज्ञानिक तरीके से सोचते और करते थे। सनातन धर्म के लिये जब-जब वे बोले; जहाँ-जहाँ वे बोले और जो भी उन्होने कहा विज्ञान सम्मत्त कहा, विज्ञान के पक्ष को पहले रखा। वे भीतर से शंकराचार्य परम्परा के एक ऐसे उद्घोषक और प्रेरक थे जिन्होने शंकराचार्य परम्परा का निर्वाह ही नहीं किया बल्कि उस परम्परा को जिया भी। वे संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों के पोषण के लिये निरन्तर गतिशील रहे। वे चाहते थे कि भारत के हर परिवार में इसके बीज अंकुरित होते रहे और वे सदैव इस हेतु प्रयास रहे।
इस महान विभूति को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम! उनके महाप्रयाण पर मैं भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

-स्वामी चिदानंद सरस्वती, परमाध्यक्ष, परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश।