हिंदू-मुस्लिम एकता और विश्व शांति का प्रतीक है काकी का मजार

दिल्ली/ बुशरा असलम। दिल्ली और सूफ़ी फ़लसफ़े का रिश्ता तकरीबन आठ सदी पुराना है। हिंदुस्तान में सूफ़ियों के चिश्तिया सिलसिले की बुनियाद रखने वाले ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के ख़लीफा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी ने तेरहवीं सदी की शुरुआत में महरौली को अपना डेरा बनाया। मुहब्बत और भाईचारे के उनके पैग़ाम की ख़ुशबू चारों तरफ़ फैलने लगी और दिल्ली पर सूफ़ियाना रंग चढ़ता गया।
सूफ़ी पीरों के खानकाहों ने दिल्ली को एक अनूठी पहचान दी दिल्ली की कला, तहज़ीब और अदब पर इन खानकाहों का ज़बर्दस्त असर रहा है। इनके दरवाज़े हर मज़हब के लिए हमेशा खुले रहे चाहे वो हिंदू हों या मुसलमान या फिर किसी भी मजहब के जी हां हम जिसकी बात कर रहे हैं वो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं इन्हें बाअदब हजरत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी चिश्तियां के नाम से जाना जाता है।
दरअसल हजरत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी चिश्तियां सूफी परंपरा के महान संतों में से हैं वह अजमेर के ख्वाजा मोहनुद्दीन चिश्ती के खलीफा थे। इसी परंपरा में बाबा शेख फरीद और हजरत निजामुद्दीन जैसे संत हुए जिनका भारतीय अध्यात्म और संस्कृति के विकास में अहम योगदान है। बख्तियार काकी का जन्म सन 1173 में वर्तमान किर्गिजीस्तान के फरगाना प्रांत में औश नामक जगह पर हुआ था। जब बख्तियार काकी डेढ़ वर्ष के थे तब उनके पिता का निधन हो गया, उनकी शिक्षा का इंतजाम उनकी मां ने किया। छोटी उम्र से ही उनका रुझान आध्यात्म में लगने लगा और जब ख्वाजा मोइनुद्दीन औश से गुजरे तो बख्तियार काकी ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। गुरु की आज्ञा से वे दिल्ली में महरौली में आकर बस गए।

बख्तियार काकी इंसानियत औऱ भाई चारा कायम रखने वाले संतों में से एक हैं। उनके गुरु हजरत मुईनुद्दीन ने भी उन्हें यही तालीम दी थी कि उनके दरवाजे आये हर जरुरत मंद की मदद करें। बख्तियार काकी अपने उसूलों के पक्के थे। साथ ही दूसरों की किसी भी हद तक मदद करने का माद्दा रखते थे इसी विनम्रता और अकिंचनता के चलते बख्तियार काकी ने यह इच्छा प्रकट की थी कि उनका मजार न बनाया जाए ताकि जहां वे दफन हों, वहां पैर रखकर पवित्र लोग गुजर सकें अब भी उनका मजार नहीं है बल्कि जिस जमीन पर उन्हें दफनाया गया था उसी को घेर कर उनके मुरीदों ने दरगाह बना ली है बख्तियार काकी के खलीफा हजरत फरीदुद्दीन गंजशकर हैं जिन्हें बाबा फरीद के नाम से जाना जाता है। बाबा फरीद पंजाबी के आदि कवि माने जाते हैं जिनकी रचनाएं गुरु ग्रंथ साहब में संकलित हैं। बाबा फरीद के खलीफा हजरत निजामुद्दीन औलिया हैं और उनके खलीफा शेख नसिरुद्दीन महमूद हैं जिन्हें ‘चिराग दिल्ली’ कहा जाता है
हजरत बख्तियार काकी के मुरीदों में आम लोगों के अलावा कई राजघराने के लोग भी थे। मुगल खानदान के कई लोगों को कुतुब साहब की दरगाह के अहाते में दफनाया गया। बहादुर शाह जफर भी यही चाहते थे कि उनहें यहीं दफनाया जाए लेकिन उनका इंतकाल रंगून में हुआ और उनहें इस पाक जमीन नसीब नहीं हुई और उन्हें रंगून में ही दफनाया गया।
मुगल शासक अकबर शाह की बेगम जीनत महल जब अपनी मन्नत पूरी होने पर महरौली स्थित ख्वाजा बख्तियार काकी की मजार के लिए अपने किले से निकली थीं, तो दिल्ली वाले बेहद गर्मजोशी के साथ इस काफिले में शामिल हुए थे जो बाद में ‘फूल वालों की सैर’ नाम से मशहूर हुए। इस काफिले को बाद में त्योहार की तरह मनाया जाने लगा। आज करीब 175 साल बाद भी ख्वाजा की दरगाह पर ऐसी ही गर्मजोशी देखी जा सकती है। हर धर्म के लोग मजार पर मत्था टेकने आ रहे हैं और ख्वाजा से दुआएं मांग रहे हैं।
हजरत कुतुबद्दीन की दरगाह के साथ जुड़ी एक रस्म फूलवालों की सैर है। इसमें हजरत कुतुबद्दीन की दरगाह पर फूलों की चादर और योगमाया के मंदिर में फूलों का पंखा चढ़ाया जाता है। इस रहस्य की शुरुआत 1812 में तत्कालीन मुगल सम्राट अकबर शाह द्वितीय के कार्यकाल में हुई थी असल में मुगल शासक अकबर शाह अपने दूसरे बेटे मिर्जा जहांगीर को शाही वारिस बनाना चाहते थे, लेकिन अंग्रेजों को यह मंजूर नहीं था। इससे नाराज होकर मिर्जा ने अंग्रेज अधिकारी सीटन को बुरा-भला कह दिया। गुस्साए अंग्रेजों ने शहजादे को इलाहाबाद के किले में नजरबंद कर दिया। मिर्जा की मां जीनत महल ने इससे बेहद परेशान हो गईं। कई कोशिशें करने के बाद अंत में उन्होंने महरौली में ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की मजार पर अपने बेटे की वापसी और बदले में मजार पर फूलों की चादर और मसहरी चढ़ाने की मन्नत मांगी। आखिरकार ख्वाजा ने उनकी सुन ली, उसके बाद शहजादे को रिहा कर दिया गया और दिल्ली लौटने की इजाजत भी दे दी। माँ की दुआ रंग लाई और मिर्जा जहांगीर को छोड़ दिया गया। जहांगीर रिहा होकर जब दिल्ली आए तो जनता ने उनका खूब स्वागत किया। अपने बेटे की रिहाई पर मुमताज महल ने ख्वाजा बख्तियार की मजार पर फूलों की चादर चढ़ाई। उनकी इस खुशी में हिन्दुओं ने भी जमकर शिरकत की और दरगाह के पास स्थित योग माया के मंदिर में फूलों के पंखे चढ़ाए ।
‘हिन्दू-मुस्लिम एकता’ की मिसाल हजरत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी चिश्तियां का मजार आज भी अपने मिसाल को जिंदा किया हुआ है। हर साल यहाँ फूल वालों की सैर नामक अनूठा आयोजन होता है। इसकी शुरुआत 187 साल पहले मुगल काल में हुई थी। सर्वधर्म संभाव का जीता जागता उदाहरण इस मेले की रौनक आज भी बरकरार है। यह मेला देखने के लिए यहाँ देश-विदेश के लोग जुटते हैं। देश की शायद ही कोई ऐसी बड़ी शख्सियत हो जिसने ख्वाजा बख्तियार की शान शिरकत न की हो….