काबो की आराध्य है माता करणी

बीेकानेर/ उमाशंकर उपाध्याय। क्षत्रियों की भूमि राजस्थान, इस धरती के इतिहास का जितना महत्व है उससे भी कहीं ज्यादा है यहां की धार्मिक मान्यताएं। यहां दैवीय शक्तियों नें अनगिनत रुपों में अवतार लिया है और हर अवतार के साथ इस धरती की ख्याति और भी बढ़ गयी है। इसके साथ ही मरभूमि राजस्थान अपने अनेक सांस्कृतिक रंग और ऐतिहासिक गौरव के लिये देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में मशहूर है।
वीर सपूतों की इस धरती पर धर्म और आध्यात्म के भी कई रंग दिखाई देते हैं। कहीं बुलट वाले बाबा की पूजा होती है तो कहीं तलवारों के साये में मां जगदंबा की आरती की जाती है। आज हम एक ऐसे मंदिर का दर्शन कराएंगे जहां खुद मां जगदम्बा अपने इष्ट देव की पूजा अर्चना किया करती थीं। साथ ही जिनके आशीर्वाद से जोधपुर और बीकानेर राज्य की स्थापना भी हुई।
दरअसल बीकानेर का देशनोक नामक स्थान आज सारे विश्व के तीर्थ यात्रियों के लिये श्रद्धा का परम धाम बन गया है। यही वह आलौकिक धरती है। जहां दुख हरनी सुख करनी माता करणी ने पावन अवतार लिया था। करणी माता को काबो वाली माता भी कहा जाता है। काबा का अर्थ है चूहा। और इस मंदिर में अद्भुत काबों के दर्शन होते हैं। अपनी इसी विशेषता के लिये यह मंदिर संपूर्ण संसार में विख्यात है। मां की लीला अपरंपार है। उनकी चरणों में स्थान पाकर ये चूहे भी वंदनीय हो गये हैं। करणी माता के मंदिर में इन चूहों का बड़ा मान सम्मान है। यहां आने वाले भक्त इन्हें चूहा नहीं बल्कि काबा कहते हैं। मां के मंदिर में इन काबों का होना अपने आप में एक ऐसी गाथा है जिसे पूरा विश्व एक चमत्कार मानता है। लेकिन इस चमत्कार के पीछे मां की करुणा और उनकी प्रेम की एक अनोखी कहानी भी है। कहते हैं कि करणी माता के सौतेले पुत्र की कुएँ में गिरने से मृत्यु होने पर उन्होंने यमराज से बेटे को जीवित करने की माँग की यमराज ने करणी माता के आग्रह पर उनके पुत्र को जीवित तो कर दिया पर चूहे के रूप में तभी से यह माना जाता है कि करणी माता के वंशज मृत्युपर्यंत चूहे बनकर जन्म लेते हैं और देशनोक के इस मंदिर में स्थान पाते हैं। सदियां बीत गयीं लेकिन मां का वचन आज भी जिंदा है। उनके सगे संबंधियों में जो भी मृत्यु को प्राप्त होता है वह काबा का रुप लेकर माता के चरणों में वापस लौट आते हैं मां ने तो अपने बच्चों के लिये यमराज से भी टकरा गयीं। लेकिन उन्होंने सृष्टि का नियम नहीं बदला। इस लोक में हम जैसे कर्म करते हैं यमलोक में उसी का फल या कष्ट भोगने को मिलता है। करणी माता के वंशज यमलोक नहीं जाते लेकिन उनके कर्मों का फल इसी धरती पर मिल जाता है। जिनका जीवन सतकर्मों भरा होता है वह सफेद काबे के रुप में जन्म लेते है कहते हैं अगर सफेद काबे का दर्शन हो जाय तो जीवन में सबसे पून्य का काम होगा। यह भी कहा जाता है कि इस काबे के दर्शन उसी व्यक्ति को मिलता है जो यहां सच्ची श्रद्धा के साथ निहस्वार्थ भाव से आता है।
मान्यता है माता के पास 500 गायें थी और उनकी रखवाली करता था। उसी गांव का दशरथ नाम का एक दलित एक बार कुछ डाकुओं नें मा के गउवों पर हमला कर दिया। उस समय दशरथ उन गउओं की रखवाली कर रहा था रखवाली करते हुए उसने अपने प्राण त्याग दिये। तब मां ने अपने भक्तों को आदेश दिया की दशरथ का मंदिर उनके निकट बनाया जाए और जब तक यह संसार है तब तक उनकी पूजा और आराधना की जाए। करणी माता का मंदिर मानवता का प्रतीक है जिसे दुनिया दलित मानकर धुतकारती थी तब मां की कृपा ने उसे भी पूज्य कर दिया। जिसे लोग अछूत मानकर लोग हाथ लगाना पसंद नहीं करते थे आज उसके चरणों के धूल को सिर माथे लगाया जाता है दशरथ को इस देवी तीर्थ स्थान का कोतवाल माना जाता है आज भी माना जाता है, कि जिस तरह दशरथ मां के गउओं की रक्षा करते थे उसी तरह आज भी वो वहां आने वाले भक्तों की रक्षा करते हैं।
राजस्थान भारत का एक ऐसा राज्य जो जितना खूबसूरत है उतना ही विचित्र भी कहीं रेत के बड़े-बड़े अस्थायी पहाड़ हैं तो कहीं तालाब की सुंदरताशौर्य और परंपरा की गाथाओं से सजती शाम जहाँ है तो वहीं आराधना का जलसा दिखते आठों पहर भी रेत की तरह ही फैले हैं। ऐसी ही तिलिस्मी दुनिया से दिखते इस मरूस्थल में आश्चर्य और कौतूहल का विषय लिए बसा देशनोक कस्बा सुनहरी रेत के बीच अपनी आभा लिए दमक रहा यह स्थान वैसे तो छोटा ही है पर इसकी महत्ता व ख्याति विदेशों तक फैली हुई है।
रेत के दामन में सुनहरे संगमरमर से गढ़ा एक मंदिर जिसकी नक्काशी यदि ऊपरी दिखावे से आकर्षित करने की बात को चरितार्थ करती है तो भीतर की अलौकिकता अच्छी सीरत का उदाहरण पेश करती है। दैवीय शक्ति को समर्पित इस स्थान के कुछ रहस्य आज भी बरकरार हैं। जो किसी के लिए श्रद्धा तो किसी के लिए खोज का विषय बने हुए हैं। लोग इस मंदिर में आते तो ‘करणी माता के दर्शन के लिए हैं पर साथ ही नजरें खोजती हैं सफेद चूहे को ‘चूहे वाला मंदिर’ के नाम से भी प्रसिद्ध यह मंदिर बीकानेर से कुछ ही दूरी पर देशनोक नामक स्थान पर बना हुआ है।
बीकानेर से करीब 30 किमी दूर बने इस मंदिर को 15 वीं शताब्दी में राजपूत राजाओं ने बनवाया था। माना जाता है कि देवी दुर्गा ने राजस्थान में चारण जाति के परिवार में एक कन्या के रूप में जन्म लिया और फिर अपनी शक्तियों से सभी का हित करते हुए जोधपुर और बीकानेर पर शासन करने वाले राठौड़ राजाओं की आराध्य बनी। 1387 में जोधपुर के एक गाँव में जन्मी इस कन्या का नाम वैसे तो रिघुबाई था पर जनकल्याण के कार्यों के कारण करणी माता के नाम से इन्हें पूजा जाने लगा और सबसे खास बात तो यह है कि करणी माता को यह नाम मात्र 6 साल की उम्र में ही उनके चमत्कारों व जनहित में किए कार्यों से प्रभावित होकर ग्रामीणों ने दिया था। वैसे यहाँ साल भर श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है लेकिन साल में दो बार नवरात्रि में यहाँ विशेष मेले का आयोजन किया जाता है। जिसमें देश भर के भक्त देवी दर्शन के लिए आते हैं। कहा जाता है कि यह मंदिर करणी माता के अंतर्ध्यान होने के बाद बनवाया गया था।
इतिहास गवाह कि देशनोक का करणी माता मंदिर बीकानेर के राजा गंगासिंह ने बनवाया था। संगमरमर पर की गई नक्काशी और आकर्षित करती आकृतियों के अलावा चाँदी के दरवाजे मंदिर की शोभा और भी बढ़ा देते हैं। दरअसल 1453 में राव जोधा ने अजमेर, मेड़ता और मंडोर पर चढ़ाई करने से पूर्व करणी माता से आशीर्वाद लेने देशनोक गये। इसके बाद 1457 में राव जोधा ने जोधपुर के एक किले की नींव भी करणी माता से ही रखवाई थी। बात यहीं नहीं खत्म होती राजनीति और एकता की बात भी करणी माता की कथाओं के माध्यम से जानने को मिलती है। उन दिनों भाटी और राठौड़ राजवंशों के संबंध कुछ ठीक नहीं थे। ऐसे में राव जोधा के पाँचवें पुत्र राव बीका का विवाह पुंगल के भाटी राजा राव शेखा की पुत्री रंगकंवर से करवाकर करणी माता ने दो राज्यों को मित्र बना दिया। तत्पश्चात 1485 में राव बीका के आग्रह पर बीकानेर के किले की नींव भी करणी माता ने ही रखी।
आस्था की डोर से इंसान ही नहीं बल्कि भगवान भी जुड़़े हैं करणी माता तीनो लोकों में पूज्य हैं लेकिन उनकी आस्था का केंद्र है आव़ड़ माता। आव़ड़ माता साक्षात शक्ति की देवी हैं। करणी माता की आराध्य देवी भी यही हैं। इनके चरणों में सिर झुकाकर ही यहां की तीर्थ यात्रा पूरी होती है। करणी माता का कर्ज राजस्थान की धरती कभी नहीं चुका पाएगी।
राजस्थान की तपती हुइ रेत पर माता का शीतल जल बरसाने वाली ममता मयी करणी माता सदियों की प्रार्थनाओं का फल हैं। जब तक इस संसार में सूरज की तपिश और चंद्र्मा की शीतलता इस धरती पर रहेगी तबतक करणी माता का आशिर्वाद रहेगा। पूण्य का इतना बड़ा खजाना इस मंदिर में मां के आंचल में बिखरा है जिसे समेटने के लिये धरती की आंचल और आकाश की झोली भी छोटी पड़ जाए। यहां मां के नाम से सुबह हो ती है और उन्हीं के नाम से शाम एक बार जिसने भी यहां दीप जलाया उसके जीवन की ज्योति कभी मध्धम नहीं हो सकती। यही मां का आशिर्वाद है। जय मां करणी।