न्याय व्यवस्था के लिये शक्ति और सत्तावान होना उपयोगी ही नहीं, अतिआवश्यक भी है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

टीकमगढ़। समस्त जैव-समूह और प्राणियों के सकल कल्याण और उद्धार के निमित्त निरन्तर समर्पित हैं – नियंता-नियति एवं परमात्मा-प्रकृति। अतः ईश्वरीय विधान सम्पूर्ण जीव-जगत के लिये सर्वथा हितकर और कल्याणकारी है…! गीता का उद्देश्य ही परमात्मा, आत्मा और सृष्टि विधान के ज्ञान को स्पष्ट करना है। प्रत्येक कर्म का कोई अधिष्ठाता जरूर होता है। परिवार के वयोवृद्ध मुखिया के हाथ सारी गृहस्थी का नियन्त्रण होता है, मिलों-कारखानों की देख-रेख के लिए मैनेजर होते हैं, राज्यपाल-प्रान्त के शासन की बागडोर सँभालते हैं, राष्ट्रपति सम्पूर्ण राष्ट्र का स्वामी होता है। जिसके हाथ में जैसी विधि-व्यवस्था होती है, उसी के अनुरूप उसे अधिकार भी मिले होते हैं। अपराधियों को दण्ड व्यवस्था, सम्पूर्ण प्रजा के पालन-पोषण और न्याय के लिये उन्हें उसी अनुपात से वैधानिक या सैद्धान्तिक अधिकार प्राप्त होते हैं। अधिकार न दिये जायें तो लोग स्वेच्छाचारिता, छल-कपट और निर्दयता का व्यवहार करने लगें। न्याय व्यवस्था के लिये शक्ति और सत्तावान होना उपयोगी ही नहीं, अतिआवश्यक भी है। मनुष्य का विधान तो देश, काल और परिस्थितियों केअनुसार तो बदलता ही रहता है। किन्तु, उस परम सत्ता का विधान सदैव एक जैसा कल्याणकारी ही है। जैसा कर्मबीज, वैसा ही फल; यह उसका निश्चल विधान है। आचार्यश्री जी ने कहा कि प्राणी मात्र के प्रति यदि प्रेम पनपने लगे, तो समझिये कि आप भक्ति पथ पर बढ़ने लगे हैं। जिस समय हम में यह भावना आ जायगी कि मैं ईश्वर का ही अंश हूँ, मैं ही विश्व की आत्मा हूँ, मैं सदानन्द हूँ, जीवन मुक्त हूँ ! तब वास्तविक प्रेम उत्पन्न होगा, भय जाता रहेगा और दुःख-क्लेश का अन्त हो जायगा। मनुष्य का वास्तविक स्वरूप सच्चिदानन्द ही है। अपने में आत्म-श्रद्धा और आस्था का विकास करिये। मिथ्या से निकलकर सत्य में आइए। जीवतत्व से ईश्वरत्व की ओर बढ़िए। ईश्वरीय कर्तव्यों का पालन करने के लिये धर्म को धारण करिये। उपकारी और परमार्थी बनकर सत्य, सेवा, त्याग, और आत्मीयता के भाव जगाइए। इस प्रकार निश्चय ही आप अपना वह अधिकार और स्वत्व पा लेंगे, जो ईश्वर में सन्निहित है और जिसकी सत्ता है – सत्+चित्+आनन्द …।

“आचार्यश्री” ने कहा ईश्वरीय कर्तव्य के पालन की प्रेरणा, सामर्थ्य और क्षमता लाने के लिए मनुष्य को चाहिये कि वह संसार की नश्वर और भ्रामक वासनाओं से दूर रहें। उनसे सुरक्षित रहकर अपनी शक्ति और स्वरूप को पहचानें। निकृष्ट भोग-वासनायें पाशविक प्रवृत्ति की घोतक है, ईश्वरीय कर्तव्य की नहीं। ईश्वरीय कर्तव्य का घोतक तो आत्मसंयम, आत्म-विकास और आत्म-विस्तार से ही होता है। यदि हमारे हृदयों में यह धारणा दृढ़ हो जाये कि हम उस परम पवित्र, महान और सर्वोपरि सत्ताधारी ईश्वर के पुत्र और संसार में उसके प्रतिनिधि हैं तो संसार की निकृष्ट वासनाओं और तुच्छ भोगों से विरक्ति हो जाना आसान हो जायेगा। जब तक अपने उच्च-स्वरूप का विश्वास नहीं होता तब तक मनुष्य निम्नता की ओर झुकता रहता है। “आचार्यश्री” ने कहा – ईश्वर का पुत्र और प्रतिनिधि होने के नाते हर मनुष्य सत्, चित और आनंद का सहज अधिकारी है। अपने इस अधिकार को प्राप्त करने के लिये, उसे यह विश्वास जगाना ही होगा कि वह ईश्वर का पुत्र है। उस ईश्वर का पुत्र जिसकी शक्ति अपार है। जो सर्वशक्तिमान और निखिल ब्रह्माण्डों का स्वामी है। जिसके संकेत से सृष्टि की रचना उसका पालन और प्रलय होता है। जो सार्वकालिक और सर्वदर्शी हैं। जो अणु-अणु में, आदि, मध्य और अन्य रूप में ओत-प्रोत है। मेरा जन्म और जीवन उसके ही अधीन, उसकी सत्ता का ही एक अंश है। हमारे कर्म और वैचारिक क्रियाओं में उसकी प्रेरणा और चेतना प्रतिबिम्बित होती है। इस दिव्य विश्वास के स्थिर होते ही मनुष्य में आत्मगौरव के भाव प्रस्फुटित होने लगेंगे और वह अपने को ईश्वर का उचित प्रतिनिधि प्रकट करने का प्रयत्न करने लगेगा। गुणों का विकास होते ही मनुष्य का अस्तित्व विस्तृत होगा और वह ईश्वर की सारी सम्पदाओं का स्वामित्व पाने लगेगा। अतः दीनता-हीनता और दरिद्रता का कलुष हटने लगेगा और हृदय में सुख-शांति और सन्तोष सम्पन्नता का समावेश होने लगेगा और इस प्रकार हमारा जीवन धन्य बन जायेगा..।

“आचार्यश्री” कहा करते हैं कि जो विश्व-कल्याण की कामना में ही अपना कल्याण मानते हैं और तदनुसार आचरण करते हैं, ईश्वर के अनुदान उन्हें उसी तरह प्राप्त होते हैं जैसे कोई पिता अपने सदाचारी, गुणी, आज्ञा पालक और सेवा भावी पुत्र को ही अपनी सुख-सुविधाओं का अधिकांश भाग सौंपता है। संसार की इस लम्बी जीवन-यात्रा को एकाकी पूरा करने के लिए चल पड़ना निरापद नहीं है। इसमें आपत्तियाँ आयेंगी, संकटों का सामना करना होगा। निराशा और निरुत्साह से टक्कर लेनी होगी। और, इन सभी बाधाओं और दुःखदायी परिस्थितियों से लड़ने के लिए एक विश्वस्त साथी का होना बहुत आवश्यक है। और, वह साथी ईश्वर से अच्छा और कोई हो नहीं सकता। उसे कहीं से लाने-बुलाने की आवश्यकता नहीं होती है। वह तो हर समय, हर स्थान पर विद्यमान है। एक अणु भी उससे रहित नहीं है। वह हमारे भीतर ही बैठा हुआ है। किन्तु, हम अपने अहंकार के कारण उसे जान नहीं पाते। ईश्वर हमारा महान उपकारी पिता है। वह हमारा स्वामी और सखा भी है। हमें उसके प्रति सदा आस्थावान रहना चाहिये और आभारपूर्वक उसके उपकारों को याद करते हुए उसके प्रति विनम्र एवं श्रद्धालु बने रहना चाहिये। इसमें हमारा न केवल सुख निहित है, बल्कि लोक-परलोक दोनों का भी कल्याण है। वह करुणा सागर है, दया का आगार है। जिसने ईश्वर से मित्रता कर ली है, उसे अपना साथी बना लिया है, उसके लिये यह संसार बैकुण्ठ की तरह आनन्द का सागर बन जाता है। जिसकी यह सारी दुनिया है, जो संसार का स्वामी है, उससे संपर्क कर लेने पर, साथ पकड़ लेने पर, फिर ऐसी कौन-सी सम्पदा, फिर ऐसा कौन-सा सुख शेष रह सकता है, जिसमें भाग न मिले? अतः जो स्वामी का सखा है, वह उसके ऐश्वर्यों का भी भागी हो जाता है…।