बुद्धिमान व्यक्ति वह है जो हर पल अपने समाधान में रहता है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

सीकर। प्रकाश, ऊर्जा, आनन्द और सकल सामर्थ्य का स्रोत मनुष्य स्वयं ही है। अतः स्वयं का बोध हो ! अपनी निजता के बोध का फलादेश है – अनन्तता और अतुल्य सामर्थ्य का अनुभव। आत्म-स्वरूप का बोध और स्वयं की निजता में जीवन जीने का अभ्यास महती उपलब्धि है। आत्माभिमुखी बनें ! स्मृति का, बोध का शब्दार्थ है – याद बनी रहे। आपके चिंतन, धारणाओं तथा अभीप्साओं में मात्र जगत ना रहे, जगन्नाथ भी रहे। अतः आपमें भगवान की याद या स्मृति हर-पल बनी रहे। कभी-कभी हम भगवान से प्रार्थना में ये बात कहें – हे देव ! आपकी कृपा से हम वंचित नहीं हैं। बस, हमें यह ध्यान बना रहे कि आपका अनुग्रह हम पर है। हम यह शिकायत करना छोड़ दें कि आपका अनुग्रह हम पर नहीं है। भगवान की कृपा हम पर है ही, बस यह बात हमारे संज्ञान में बनी रहनी चाहिए। जब यह स्मृति आपको बनी रहेगी तो आप निर्भार, निश्चिंत हो जाएंगे। आपको लगेगा कि वे सर्वशक्तिमान प्रभु हर क्षण हमारे साथ हैं, उन जैसी सामर्थ्य किसी के पास नहीं है। ऐसे में आपमें भय नहीं रहेगा, अवसाद नहीं रहेगा। स्मृति का अर्थ यह भी है – आत्म की स्मृति बनी रहे, देह की नहीं। हम निरंतर देह की स्मृति में बने रहते हैं। हम तो अपने को शरीर माने बैठे हैं। यह मेरा सिर है, यह मेरा वक्षःस्थल है, ये मेरी भुजाएं हैं, ये मेरे कपोल हैं, यह मेरी चिबुक है, ये मेरे नेत्र हैं और यह मैं हूँ। इन सब से ऊपर उठें, आत्मचिंतन करें तभी हमें स्वयं में छुपी विराटता का, अनंतता का बोध होगा। पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा कि एक बार एक भक्त ने मुझसे कहा – स्वामी जी ! आजकल मुझे बहुत डर लगने लगा है। मैं पहले नहीं डरता था, यह डर मुझमें क्यों बैठ गया है? तो मैंने कहा – आपमें और परमात्मा में कुछ दूरी आ गई है, इसलिए आपको डर लगता है। दूरी अवसाद ला रही है, यही तनाव ला रही है और यही भय भी ला रही है। इसका कारण यह है कि आपके और संत-महापुरुषों के बीच, आपके और गुरु के बीच, आपके और भगवान के बीच में कुछ दूरी आ गई है। मेरी बात उनकी समझ में आ गई और वे चिंता तथा भय से मुक्त हो गये….।

“आचार्यश्री” ने कहा – हम अपनी स्मृति में जगत को रखते हैं। हमारी स्मृति में पदार्थ है। चूंकि ये सम्मानजनक हैं, प्रतिष्ठाकारक हैं तथा सुख के मूल हैं इसलिए इन्हीं को लक्ष्य मानकर हम जी रहे हैं। हमारी स्मृति में यही हैं कि इन्हें कैसे प्राप्त कर लें? ये हमारे बन जाएं, बड़ा मकान बन जाए, बहुत अच्छा वाहन हो, संतान हो, फिर वह बड़ा हो जाए, उसका अच्छा अध्ययन हो जाए; फिर बहू आए, उनके बच्चे हो जाएं आदि यही लक्ष्य है हमारा। हमारी स्मृति में यही सब कुछ रहता है। स्मृति मात्र यह है कि देह सुख किसमें छिपे हुए हैं? दैहिक आकर्षण की पूर्ति में ही हमारी स्मृति है। हमें निरंतर देह की याद रहती है कि मैं ‘ये’ हूं। जबकि देह की पूर्ति कभी नहीं हो सकती। यह एक रस नहीं है। यह दु:ख का एक कारण है। इसका निरंतर स्मरण रखना ही भयकारक है। इसी में भय छिपा हुआ है। हम अपने को देह मान बैठे हैं। और, अपने को देह मानने से भय आता है, क्योंकि यह विनाशी है, खंडित होने वाला है, जर्जर है, नाशवान है, रोगी है। हमारे पास जो भय, दु:ख और क्लेश आता है; वह अपने को देह मानने से ही आता है। साधु-महात्मा को ही भोग में योग की कला आती है कि संसार के सब भोगों में कैसे योग-युक्ति धारण की जाए? ये भोग हैं। इनका भोग करें या उपयोग करें ? संसार की सभी वस्तुओं का उपभोग नहीं उपयोग करें। उपभोग में योग जगाएं, इसीलिए योग-मुक्त होकर पदार्थों के साथ आत्मैक्यता हो, तादात्म्य हो एवं पदार्थ हितकारक हो। अतः ये निंदनीय हैं, ऐसी बात नहीं। पदार्थ कैसा है? उसके मूल में जाकर उसका परिणाम जानने का नाम योग है…।

“आचार्यश्री” ने कहा – जो लोग कभी अपना समाधान नहीं कर पाते और निरंतर समस्याओं से घिरे रहते हैं, वे अपने आपमें स्वयं एक समस्या हैं। ऐसे लोग अपनी दुविधाओं का अंत नहीं कर पाते, अपने संशयों का भंजन नहीं कर पाते, अपने संदेह को नहीं समझ पाते और अपने अज्ञान को नहीं माप पाते। फिर क्या ग्राफ है हमारे अज्ञान का? जो व्यक्ति अपने अज्ञान का ग्राफ नहीं समझ पा रहा है कि वह कितना ऊंचा या नीचे जा रहा है; अथवा जो अपनी अस्मिता, राग-द्वेष या अभिनिवेश को नहीं जानता एवं अपने भीतर के अज्ञान और अविद्या को नहीं पहचानता; वह अपना समाधान कभी भी नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह “येन केन प्रकारेण’’ अपने चित्त का स्थायी समाधान करें। वह समाधान की दिशा में पुरुषार्थ करें, अच्छे ग्रंथों को पढ़े, संतों के पास जाएं, विद्वानों के पास बैठे और अपने विवेक का लाभ उठाए। जो लोग अपने विवेक का कभी लाभ नहीं लेते, उन लोगों को स्थायी समाधान कभी नहीं मिलता। अब यह प्रश्न उठता है कि आखिर वह कौन सी चीज ऐसी है जिससे हमें स्थायी समाधान मिल सकता है? तो वह चीज है – विवेक। समाधि का आशय यहां समाधान से है। बुद्धिमान व्यक्ति वह है जो हर पल अपने समाधान में रहता है। जब आप समाधान में रहेंगे तो स्वाभाविक रूप से आपके होंठों पर एक मुस्कान आ जाएगी और आपके आस-पास एक प्रसन्नता छा जाएगी। यदि आपमें कोई समाधान नहीं है तो फिर आपके चेहरे पर उलझनें झलकती रहेगी और आपकी आंखों तथा चेहरे पर चिंताओं का जाल दिखेगा। समस्या होने पर कोई व्यक्ति हमें क्यों चुप कराए, हमें क्यों सांत्वना दे, हमें कोई क्यों ढ़ाढ़स बंधाए, हमारा संबल क्यों बने? क्या हम इतने कमजोर, इतने दुर्बल, इतने भीरू, इतने दब्बू और इतने कायर हैं कि कोई हमें चुप कराए, सांत्वना दे या कंधा थपथपाए कि बहुत बड़ा नुकसान हो गया? सहानुभूति जताने नहीं आ रहे हैं लोग। कोई चुप कराने नहीं आ रहा है। आप अपना समाधान स्वयं उसी समय करें। याद रखें, अगर आप रोने बैठ जाएंगे तो कोई साथ देने को तैयार नहीं होगा। लेकिन, अगर आप मुस्कराएंगे तो सब आपका साथ देंगे और सबको अच्छा भी लगेगा। यह मुस्कुराहट आपके भीतर से निकलनी चाहिए। और, ऐसी मुस्कान तब आएगी, जब आप अपने चित्त का स्थायी समाधान कर लेंगे एवं स्वयं में छुपी विराटता, स्वयं में छुपी अनंतता को अर्जित कर लेंगें …।