कर्नाटक की इस नदी में हैं हजारों शिवलिंग, खुद नदी करती है अभिषेक

सिरसी/ अमित यादव। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के अधिपति हैं शिव! शिव अनादि हैं। शिव नाम और गुणों की महिमा अनंत, अपार है। शिव की महिमा को कौन नहीं जानता, लेकिन यहां सिर्फ एक या दो शिव नहीं है बल्कि हजारों शिव हैं। दरअसल शलमाला नदी में एक साथ बने है हज़ारों शिवलिंग। ये अपने आप में एक आश्चर्य हैं। यहां बने शिवलिंगों को नदी निरन्तर अभिषेक करती रहती है।

कर्नाटक के एक शहर सिरसी में शलमाला नाम की नदी बहती है। यह नदी अपने आप में खास है क्योंकि इस नदी में एक साथ हजारों शिवलिंग बने हुए हैं। ये सभी शिवलिंग नदी की चट्टानों पर बने हुए हैं। इतना ही नहीं नदी में मौजूद चट्टानों पर शिवलिंगो के साथ-साथ नंदी, सांप आदि भगवान शिव से संबंधित चिन्होंस की भी आकृतियां भी बनी हुई हैं। इन शिवलिंगों के हजारों की संख्या में एक साथ बने होने की वजह से इस स्थान का नाम सहस्त्रलिंग भी है।
इस नदी को बेहद पवित्र माना जाता है, जिसका एक कारण तो यहां इतनी तादात में शिवलिंगों का मौजूद होना तो है ही साथ ही चट्टानों के नदी के बीच होने के कारण नदी स्वसयं ही इन लिगों का जलाभिषेक करती है। इस कारण भी इसे बेहद पवित्र माना जाता है। सावन के महीने में दूर दूर से हजारों श्रद्धालु यहां इन लिगों के दर्शन और पूजन के लिए आते हैं।

राजा सदाशिवाराय ने करवाया था इनका निर्माण
घने जंगलों के बीच बहने वाली इस को देखा जाए तो यह काफी शांत प्रतीत होती है लेकिन जब आप इसके पास जाते हैं तो आपको दिखाई देगा कि इस नदी के बीचोंबीच शिवलिंग बने हैं। इस नदी में बने शिवलिंगों की ऐतिहासिक मान्यताएं भी हैं। इतिहासकार अंबुजेश कुमार के अनुसार 16वीं सदी में सदाशिवाराय नाम के एक राजा थे। वे भगवान शिव के बड़े भक्त थे। शिव भक्ति में डूबे रहने की वजह से वे भगवान शिव की अद्भुत रचना का निर्माण करवाना चाहते थे। इसलिए राजा सदाशिवाराय ने शलमाला नदी के बीच में भगवान शिव और उनके प्रियजनों की हजारों आकृतियां बनवा दीं। नदी के बीच में स्थित होने की वजह से सभी शिवलिंगों का अभिषेक और कोई नहीं बल्कि खुद शलमाला नदी के द्वारा किया जाता है।

सहस्त्रलिंग के दर्शन का सही समय
इस नदी को देखने के लिए दुनिया भर से लोग आते हैं। लेकिन शिवरात्रि व श्रावण के सोमवार पर यहां भक्त विशेष रूप आते हैं। यहां पर आकर भक्त एक साथ हजारों शिवलिंगों के दर्शन और अभिषेक का लाभ उठाते हैं। इस स्थान में जाने का सबसे अच्छा समय नवंबर का माना जाता है। महाशिवरात्री के समय लोग इस नदी के पास आकर पूजा-अर्चना करते हैं। इस नदी के आसपास हरियाली और शांति होने के कारण यह भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है।