अनन्त यात्रा पर चले गए अटल जी, आप हम सबके दिलों से कभी भी जा नहीं सकते?

नई दिल्ली। कल शाम से आपकी कई यादों ने भीतर तक भिगोया। सांसद के रूप में लखनऊ रेलवे स्टेशन पर आपसे मिलना, गायत्री शक्तिपीठ कुर्सी रोड में आपके चुनावी आगमन पर हमारे कुछ शब्दों पर आपका मुस्कराना और बाद में मुझसे नाम पूछना, उस दिन आदिशक्ति माँ गायत्री के सम्मुख आपका पूर्वत: ‘राजतिलक’ हो जाना और आपका पहली बार पीएम बनना, बतौर प्रधानमन्त्री आपके लखनपुरी आगमन पर वीवीआईपी गेस्ट हाउस के मिलन-कक्ष में गायत्री परिवार की पाँच सदस्यीय टीम का नेतृत्व करते हुए मेरी आपसे लखनऊ के विकास पर चर्चा, मुख्यमन्त्री आवास पर आपके साथ रात्रिभोज में आपके प्रतिनिधि वरिष्ठ क़ाबीना मन्त्री श्री लालजी टण्डन के आमन्त्रण पर हम पाँच गायत्री परिजनों की भागीदारी, सभी स्मृतियाँ बीते कुछ घण्टों में मानस पटल पर आती रहीं। लखनऊ सहित सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश व देश की बड़ी-बड़ी चमचमाती हुई सड़कें आपको बहुत याद कर रही हैं, सभी आपकी ही तो देन हैं।
हमें याद है, लखनऊ के हनुमान सेतु पर से गुज़रते हुए प्रधानमन्त्री का क़ाफ़िला अचानक पुल पर रुक गया था। गोमां को निहारते हुए आपने कहा था- माँ गोमती बीमार दिख रही हैं और बड़ी उदास हैं। उसके बाद वरिष्ठ आईपीएस अफ़सर श्री शैलजाकांत मिश्र की अगुवाई में हम सब हर रविवार वहाँ जाकर सफ़ाई करते थे। कुछ सालों बाद तो पूर्व आईएएस श्री जय शंकर मिश्र की अध्यक्षता में बने गोमती एक्शन परिवार में बतौर महासचिव हमें भी आहुति देने का मौक़ा मिला और तत्कालीन अखिलेश सरकार के बड़े क़दमों से गोमती अच्छी-ख़ासी निर्मल हो गयी थी। आज लखनऊ से एक भाई ने कहा कि अटल जी के जाने से गोमती भी उदास लग रही है। नदियों, शिक्षा, स्वच्छता, खेती, गाय, अध्यात्म आदि की चिन्ता करने वाले आप भारत के (शायद) अन्तिम संस्कारी ब्राह्मण शासनाध्यक्ष थे आप। आपको हृदय से नमन है।
वह भी याद है कि महान अध्यात्मवेत्ता और ३ हज़ार पुस्तकों के लेखक और महान तपस्वी युगपुरुष परम पूज्य गुरुदेव पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य ने आपकी युवावस्था में आपके भाषण की आवाज़ आने पर अपनी जीप एक किनारे रुकवाकर कहा था- ‘गाड़ी बन्द कर दो ज़रा, थोड़ा अटल जी को सुन लूँ’ फिर कुछ देर आपको सुनकर वे अपने प्रोग्राम में पहुँचे थे। वह भी याद आया जब ऐतिहासिक लखनऊ अश्वमेध महायज्ञ के बौद्धिक मंच से आपने कहा था- “मैं यज्ञ भगवान को नमन करने तो आया ही हूँ, विशेष रूप से हम-सबकी वन्दनीय माता जी को प्रणाम करने आया हूँ।”
जब हमारा सरकारी कार्यालय ए.पी.सेन रोड पर था तब एक बुज़ुर्ग व्यक्ति की वह बात आज मुझे याद आ रही है। उनने कहा था- वो सामने वाले घर में अटल जी बतौर पत्रकार रहते थे और इसी सड़क पर साइकिल से आया-जाया करते थे। आपके परमप्रिय कुशल सर्जन तत्कालीन स्वास्थ्य निदेशक और बाद में आपकी इच्छा पर लखनऊ के मेयर बने स्मृतिशेष डॉक्टर सतीश चन्द्र राय और तत्कालीन मन्त्री स्मृतिशेष श्री भगवती प्रसाद शुक्ल से आपके बारे में सुनी ढेरों बातें आज भीतर से कुरद-कुरद कर बाहर आती रहीं। 
डॉ. एस.सी.राय को ‘ए सर्जन’ कहकर आप द्वारा बुलाना, उनके घर आना सब कुछ आज याद आया। वह भी यादों में आया कि दुबारा महापौर का चुनाव लड़ने को आप द्वारा कहे जाने पर डॉ. राय ने कहा था- “मान्यवर अटल जी! चुनाव बहुत मंहगे हो गए हैं और मेरे पास धन है नहीं।” तब आप मुस्करा दिए थे और कहा था- “तुम पर्चा भरो, तुम ही जीतोगे।”  …और वह भारी मतों से जीते थे।
प्रियवर मान्यवर अटल बिहारी बाजपेयी जी, यह देश आपको सदैव याद रखेगा, वैश्विक समुदाय भी। हमारी कोशिश होगी कि आपको जिया जाय…