भारत के प्रहरी हिमालय को़ बचाने के लिये पेड़ और पानी का सम्वर्द्धन जरूरी- राम महेश मिश्र   

नई दिल्ली। पहाड़ को जीवन्त बनाने के लिए जरूरी मुख्य तत्वों में पेड़ और पानी दोनों आवश्यक हैं। वृक्ष से पानी, पानी से अन्न तथा अन्न से जीवन मिलता है और जीवन को परिभाषित करने के लिए जीव और वन दोनों जरूरी है। यानी जहाँ वन होता है वहीं जीव होते हैं। जहाँ जीव और वन दोनों होते हैं, वहाँ पहाड़ विकसित हो जाता है। पहाड़ की आंतरिक व बाह्य संरचना मे अहम् भूमिका निभाने वाला जो पेड़ है  वह न केवल परिस्थितिकी तन्त्र को सृजित करता है, वरन् उसके सन्तुलन के लिए भी उत्तरदायी होता है। भूस्खलन रोककर मृदा को उर्वरकता प्रदान करने वाला पेड़ ही इस सृष्टि का ऐसा एक घटक है जो पहाड़ को समग्रता व पूर्णता प्रदान करता है।

पहाड़ स्वधर्म नहीं निभा सकते पेड़ों के बिना

पेड़ के बिना हमारा पहाड़ अपनी भौतिकता से दूर रहकर अपना धर्म नहीं निभा पाता है और प्राकृतिक असंतुलन का दंश आपदाओं के रूप में देखने को मिलता है। प्रकृति में जो हलचल होती है वह पहाड़ पर ही दिखायी देती है, चाहे वह भूकम्प, बाढ़, सुनामी, चक्रपात या भूस्खलन आदि विविध रूपों में क्यों न हो। ये आपदायें पहाड़ के विनाश के कारण ही होती है और पहाड़ के विनाश की हर गतिविधि में सबसे पहले पेड़ अपनी बलि देता है। सघन वन क्षेत्रों वाली पहाड़ियों की जलवायु कितनी अनुकूल होती है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। विश्व के भूगोल में वसुन्धरा ने अपनी व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए वृक्षों को सर्वाधिक महत्व दिया है, लेकिन हमारे विनाशकारी विकास ने पेड़ को तुच्छ समझकर पर्यावरण संकट पैदा करने हेतु धरती को वृक्ष विहीन करने की ठान ली है।

वृक्ष विहीन पहाड़ों से हुई ग्लोबल वार्मिंग की समस्या

ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन की विश्वव्यापी समस्या का जन्म पेड़ रहित पहाड़ों से ही हुआ है। जो भी प्राकृतिक आपदाएं आ रही हैं उन सभी के मूल में नंगे और गंजे होते पहाड़ ही मुख्य कारण है। पहाड़ों की जैव-विविधता नष्ट हो रही है, तापमान में निरन्तर बढ़ोत्तरी के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं, संजीवनी का कार्य करने वाली वनस्पतियाँ विलुप्त हो रही हैं तथा पहाड़ों का मूल स्वरूप बिगड़ रहा है। इसके कारण प्राकृतिक असन्तुलन की स्थिति बन रही है। हमारा मानना है कि पहाड़ों के अस्तित्व के लिए केवल पेड़ ही एकमात्र ऐसा आयाम है, जो पहाड़ को जीवन प्रदान कर सकता है।

 

पहाड़ बचाने के लिए वानिकी सम्पदा बढ़ाना जरूरी

यह बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि हम पेडों से विमुख रहते हैं, पेड़ों की कद्र नहीं करते एवं उनकी रक्षा नहीं करते हैं, पौधरोपण नहीं करते हैं और पेड़ बनने तक उनकी परवरिश नहीं करते हैं तो हम अपने पहाड़ों को नहीं बचा सकते। पहाड़ को संरक्षित करने के लिए सबसे पहले वानिकी सम्पदा का संरक्षण व सम्वर्द्धन करना होगा। इस सम्बन्ध में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत सी संधियाँ हुई हैं तथा कानूनों के माध्यम से पर्यावरण विनाश को रोकने की नाकामयाब कोशिशें की जा रही है। लेकिन जनसहभागिता, जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, वह सुनिश्चित नहीं हो पा रही है। यह बहुत जरूरी है कि व्यावहारिक योजनाएँ बनें, जिनमें आमजन के दायित्व का निर्धारण हो। पहाड़ बचाने की रचनात्मक पहल तभी सार्थक होगी, जब हम पेड़ व पहाड़ के साथ भावनात्मक रिश्ता कायम कर सकें। आइए, मिलकर पेड़ लगायें-पहाड़ बचायें। पर्यावरण हित के, अपने जीवन हित के इस कार्य को जनक्रान्ति का रूप प्रदान करें।

प्रकृति-पर्यावरण हित में सभी वर्गों से अपील

समस्त सन्त समाज, पुरोहित समाज धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्थाओं तथा समाज के सभी वर्गों से हमारा आह्वान है कि हम-आप-सब पेड़ों के माध्यम से अपनों को श्रद्धांजलि दें, पौधरोपण करके राष्ट्र के अमर जवानों के प्रति सम्मान प्रकट करें, देश के भाल-प्रान्त देवभूमि उत्तराखण्ड तथा अन्य हिमालयी राज्यों को हरा-भरा बनायें और वृहद् पौधरोपण करके अपने गौरवशाली राष्ट्र के प्रमुख प्रहरी देवात्मा हिमालय को सृदृढ़ता प्रदान करें, ताकि वह सदैव अपना सिर ऊँचा रखकर खड़ा रह सके। हम सभी देशवासी तभी सिर ऊँचा करके कह सकेंगे झण्डा ऊँचा रहे हमारा। उज्ज्वल भविष्य लेकर आई इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में पेड़ लगाओ-पहाड़ बचाओ‘‘ हम सबका प्रमुख उद्घोष बने।

लेखक विश्व जागृति मिशन नयी दिल्ली के निदेशक हैं।