आधुनिकता की चकाचौंध में धूमिल होते प्राचीन धरोहर

वृंदावन/ संजय मिश्र। धार्मिक नगरी में आज कल नये आकर्षक मंदिरों की होड़ लगी है जी हां इन मंदिरों में प्रेम मंदिर सबसे आर्कर्षक मंदिर है वहीं वृंदावन के प्राचीन धरोहर आज अपने अस्तित्व से दो चार करते नजर आ रहे हैं। जहां एक तरफ ब्रज में चैतन्य महाप्रभु के आगमन की 500 वीं वर्षगांठ मनायी जा रही है, वहीं दूसरी ओर उनके अनुयायियों द्वारा स्थापित प्राचीन सप्तदेवालय गुमनामी के अंधेरे में है। सवाल इस बात की है कि क्या इन देवालयों के उत्थान को एक बार फिर चैतन्य महाप्रभु जैसे कृष्ण भक्त को वृंदावन का संज्ञान लेने की जरूरत है। या फिर ये देवालय इसी तरह अपनी स्मिता के लिये कराहती रहेंगी। लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व जब गौड़ीय संप्रदाय प्रवर्तक चैतन्य महाप्रभु पश्चिम बंगाल से वृंदावन आये। उस समय वृंदावन वृक्षावलियों के अंदर सिमट कर रह गया था। जिसे प्रकाशित करने के लिए और फिर से स्थापित करने के लिए चैतन्य महाप्रभु ने अपने 6 अनुयायियों और 60 गोस्वामियों को वृंदावन भेजा। जिन्होंने यहां हरिनाम संकीर्तन की मदद से भक्तिकालीन दौर में सप्तदेवालयों की स्थापना की। जिनमें सबसे पहला मंदिर यमुना किनारे बसाया गया, जिसे आज भी मदनमोहन मंदिर के नाम से जाना जाता है। इसके बाद गोविंद देव मंदिर, गोपीनाथ मंदिर, राधारमण मंदिर, राधादामोदर, राधाश्याम सुंदर मंदिर व गोकुलानंद मंदिरों की स्थापना भक्तिकालीन दौर में हुई। वृंदावन के पुन:प्रकाशित होने की शुरूआत में यही वह देवालय हैं, जिनके आधार पर वृंदावन को नई पहचान मिली और उन्हीं अनुयायियों ने वृंदावन में भगवान की प्राचीन लीलास्थलियों की खोज कर उन्हें प्रकाशित किया। चाहे वंशीवट हो, या फिर राधारानी, कालीदह मंदिर निधिवन, सेवाकुंज, मानसरोवर, समेत अनेक मंदिर और प्राचीन धरोहरों को प्रकाशित कर उन्हें स्थापित किया। आज ये धरोहरें गुमनामी के अंधेरे में हैं इनकी दुर्दशा को संज्ञान ना तो सरकार ले रही है ना ही सामाजिक संगठन।
वक्त बदला समाज बदला अगर नहीं बदला तो वृंदावन के मंदिरों की तस्वीर। दरअसल बदलते परिवेश में आज प्रेम मंदिर जैसी आकर्षक मंदिर की स्थापना के बाद तो वृंदावन में मंदिरों की होड़ मची हुई है लेकिन आज भी ब्रज और वृंदावन की प्राचीन धरोहरें आज भी अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं।