मैं रहूं ना रहूं ये देश रहना चाहिए लोकतंत्र रहना चाहिए- अटल बिहारी वाजपेई

नई दिल्ली। मुक्तसंगो नहंवादी धृ त्युत्साहसमन्वित:। सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्विक उच्यते।।

जो कर्ता संग दोष से रहति होकर अहंकार के वचन ना बोलने वाला धैर्य और उत्साह से युक्त होकर
कार्य के सिद्ध होने और ना होने पर हर्ष शोक इत्यादि विकारों से सर्वथा रहित होकर कर्म में अर्थात अहिरनिश
प्रदित है वो कर्ता सात्विक कहा जाता है यही उत्तम साधक के लक्षण हैं कर्म वही है नियत कर्म है.. ))

श्रीमदभगवत गीता के अठारहवें अध्याय में उत्तम साधक यानी सर्वश्रेष्ठ कर्मयोगी पर जिस तरह का संवाद भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुआ। कलियुग में स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने सर्वश्रेष्ठ कर्मयोगी के उसी जीवन को धरातल पर उतारा और जिया।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपई ने कहा था कि “कभी हम इस सदन में 2 रह गए थे पहली बार चुने गए तो 4 थे, जब आएगा तो हम उसका सामना करेंगे । आज तो हम इतनी बड़ी संख्या में बैठे हैं कि आपके साथ कोई तुलना नहीं हो सकती है । हम विजय हुए हैं हम में विनम्रता है पराजय में तो आत्ममंथन होना चाहिए।”

वे एक सच्चे कर्मयोगी की तरह अटल जी ने भारतीय लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद में खड़े होकर सत्ता के लालच-लोभ, लाभ-हानि, द्वेष और अनुराग से दूरी बनाते हुए कहा था। मैं रहूं ना रहूं ये देश रहना चाहिए लोकतंत्र रहना चाहिए।

जब जब कभी आवश्यकता पड़ी, संकटों के निराकरण में हमने उस समय की सरकार की मदद की है मैं चाहता हूं ये परंपरा बनी रहे प्रकृति बनी रही सत्ता का खेल तो चलेगा सरकारें आएंगी जाएंगी पार्टियां बनेंगी बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए।

गीता में जैसे हार की चिंता किए बिना कर्तव्य पथ चलने का दर्शन है। अटल भी कर्तव्य पथ बिना हार माने हमेशा चलते रहे।

गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ
गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी
हार नहीं मानूँगा,
रार नई ठानूँगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ।