मैं अटल बिहारी वाजपेयी ईश्वर की शपथ लेता हूं।

नई दिल्ली। प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी।।18.30।।

पार्थ प्रवृति और निवृति को कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को जो बुद्धि यथार्थ को जानती है वो बुद्धि सात्विकि है, अर्थात परमात्म पथ, आवागमन पथ दोनों की भली प्रकार जानकारी, सात्विक बुद्धि है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि प्रवृति की जानते हुए कर्तव्य पथ पर चलना सर्वश्रेष्ठ गुण है। अटल जी ने अपने जीवन में इस गुण को आत्मसात किया था।
प्रवृति जानते हुए भी कर्तव्य पथ पर अटल बिहारी वाजपेयी कैसे चले। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 1996 में देखने के लिए मिला।
1996 पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने थे। उनके पास बहुमत नहीं था लेकिन सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते उनका कर्तव्य था कि वो देश की सत्ता संभाले और उन्होंने इसका पालन किया। मैं अटल बिहारी वाजपेयी ईश्वर की शपथ लेता हूं। अटल जी को ये भी पता था कि उनकी सरकार गिर जाएगी। बावजूद इसके उन्होंने सदन में परीक्षा दी और कहा, “हम भी अपने ढंग से देश की सेवा कर रहे हैं और अगर हम देशभक्त ना होते, निस्वार्थ भाव से राजनीति में अपना स्थान बनाने का प्रयास ना करते और हमारे इन प्रयासों के पीछे 40 साल की साधना है ये कोई आकस्मिक जनादेश नहीं है ये कोई चमत्कार नहीं हुआ है हमने मेहनत की है हम लोगों में गए हैं हमने संघर्ष किया है। हम देश की सेवा के कार्य में जुटे रहेंगे हम संख्या बल के सामने सर झुकाते हैं।”
अटल जी को ये गीता ज्ञान भलि भांति पता था कि मुश्किलों के बावजूद अपने कार्मो को करते जाना। सर्वश्रेष्ठ गुण हैं। इसे उन्होंने कविता के जरिए लोगों तक भी पहुंचाया था।

बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।