विनम्रता से व्यक्ति को सत्य की अथाह शक्ति प्राप्त होती है – अवधेशानंद गिरी जी महाराज

अम्बाला/ असित अवस्थी। जीवन की परिपूर्णता और सिद्धि सहजता और विनम्रता के समावेश से ही सम्भव है। जीवन की श्रेष्ठता और उच्चता के लिए सहज, सरल और विनम्र रहें ..! प्रकृति अत्यंत सरल है। इसकी समस्त क्रियाएं बड़ी सरलता के साथ होती हैं। सूर्य का उदय होना, तारों का टिमटिमाना और नदियों का निरंतर बहना आदि कुदरती क्रियाएं स्वतः होती रहती हैं। वृक्ष फलते-फूलते हैं, रात के बाद दिन आता है, पर्वत-चट्टानें स्थिर हैं। वस्तुत: प्रकृति जटिलताओं का उद्गम-स्रोत नहीं है, उन्हें वह निर्मित भी नहीं करती। प्रकृति की क्रियाएं क्यों हो रही हैं? या फिर क्या होना चाहिए? जैसे प्रश्नों से जटिलताएं आती हैं। प्रकृति में सब कुछ स्वयं ही होता है। प्रकृति की तरह जो चीज सरल रहती है, वही सत्य है। ऊपर से यह बात सहज जान पड़ती है, पर यह उतनी सरल नहीं है। यही जीवन के साथ भी है। सरल रहने तक मानव जीवन सम्यक अर्थों में वास्तविक जीवन बना रहता है। यही हमारा जीवन जीना होता है। इससे पृथक होते ही जीवन मात्र व्यतीत करने तक सीमित हो जाता है। पद और ज्ञान का दंभ जीवन को जटिलतम बनाता है। जीवन के न सुलझने वाले गणित को सुलझाने के अनावश्यक कार्य में हम इतने अधिक उलझ जाते हैं कि अंत में मृत्यु ही इनके उलझाव को सुलझाती है। सहज और सरल जीवन द्वारा प्रयास के बिना ऊंचाई मिलती है। जीवन की सहजता में जीवन को असाधारणता और अलौकिकता प्राप्त होती है। सरलता ही सत्य है। सत्य ईश्वर है। सत्य बोलना कठिन नहीं है। जो वास्तविकता है, मात्र उसे ही कहना है। सत्य में जोड़ना, घटाना और गुणा-भाग नहीं करना पड़ता। झूठ बोलना इसके ठीक विपरीत है। जो नहीं है, वही कहना है। जल को हवा सिद्ध करने के लिए प्रपंच की सृष्टि करनी पड़ती है। वास्तविकता से दूर जाना पड़ता है। सत्य का यथार्थ से संबंध है। संकोच करने पर मायावी-दिखावे के कारण अवसर निकल जाता है। संबंध की दीर्घता में सत्य और सरलता सेतु सदृश है। सत्य को कभी स्मरण नहीं रखना पड़ता। स्वयं स्मृति में रहता है। जबकि झूठ को सदा स्मृति पटल पर रखना होता है। झूठ को जितनी बार दोहराते हैं, उतनी बार उसका अर्थ बदलता जाता है। झूठ जटिलताएं उत्पन्न करता है, जो मानसिक तनाव का कारण बनकर सरलता को नष्ट करता है। सरलता के बिना सत्य की निकटता नहीं मिलती। इस प्रकार जटिलता छोड़ने पर आनंद की धारा फूट पड़ती है …।

आचार्यश्री ने कहा कि विनम्रता आपके आंतरिक प्रेम की शक्ति से आती है। दूसरों को सहयोग व सहायता का भाव ही आपको विनम्र बनाता है। यह कहना गलत है कि यदि आप विनम्र बनेंगे तो दूसरे आपका अनुचित लाभ उठाएँगे। जबकि यथार्थ स्वरूप में विनम्रता आपमें अदम्य उत्साह व धैर्य पैदा करती है। आपमें सोचने-समझने की क्षमता का विकास करती है। विनम्र व्यक्तित्व का एक प्रचंड आभामण्डल होता है। धूर्तो के मनोबल उस आभा से निस्तेज हो स्वयं परास्त हो जाते हैं। विनम्रता हृदय को विशाल, स्वच्छ और ईमानदार बनाती है। यह आपको सहज सम्बंध स्थापित करने के योग्य बनाती है। विनम्रता न केवल दूसरों का हृदय जीतने में सफल होती है, अपितु आपको अपना ही हृदय जीतने के योग्य बना देती है। जो आपके आत्म-गौरव और आत्म-बल में उर्ज़ा का अनवरत संचार करती है और आपकी भावनाओं के द्वन्द समाप्त हो जाते हैं। साथ ही व्याकुलता और कठिनाइयां भी स्वतः दूर होती चली जाती है। एक मात्र विनम्रता से ही सन्तुष्टि, प्रेम और सकारात्मकता आपके व्यक्तित्व के स्थायी गुण बन जाते हैं। जहां विनम्रता होती है वहाँ तो व्यक्ति को सत्य की अथाह शक्ति प्राप्त होती है। सत्य की शक्ति, मनोबल प्रदान करती है। अतः विनम्रता मानव का सबसे बड़ा गुण है, आज तक संसार में जिसने भी श्रेष्ठ पद की प्राप्ति की है, वह विनय गुण के कारण ही संभव हो पाई है …।