इंसानियत और बलिदान की गाथा है मोहर्रम

लखनउ/ बुशरा असलम। मुहर्रम मुस्लिम कैलेंडर का पहला महीना है। इस महीने में इमाम हुसैन की शहादत को याद किया जाता है। सत्य के लिए जान न्यौछावर कर देने की जिंदा मिसाल बने हजरत इमाम हुसैन (अ.ल.) ने जीत की परिभाषा ही बदल दी। मुहर्रम कोई त्यौहार नहीं है बल्कि ये एक मातम दिन है। इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद साहब के छोटे नवासे (नाती) इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में मुहर्रम मनाया जाता है। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने इस मास को अल्लाह का महीना कहा है। इस माह को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है।

क्यों मनाते हैं मुहर्रम

इस्लाम में सिर्फ एक ही खुदा की इबादत करने के लिए कहा गया है। छल-कपट, झूठ, मक्कारी, जुआ, शराब, जैसी चीजें इस्लाम में हराम बताई गई हैं। हजरत मोहम्मद ने इन्हीं निर्देशों का पालन किया और इन्हीं इस्लामिक सिद्घान्तों पर अमल करने की हिदायत सभी मुसलमानों और अपने परिवार को भी दी।

सन् 60 हिजरी की बात है।हजरत अली के स्वर्गवास के बाद लोगों की राय इमाम हुसैन को खलीफा बनाने की थी, लेकिन अली के बाद हजरते अमीर मुआविया ने खिलाफत पर कब्जा किया। मुआविया की मृत्यु के बाद शाही वारिस के रूप में यजीद, शाम की गद्दी पर बैठा। यजीद  में सभी अवगुण मौजूद थे, यजीद इस्लाम का शहंशाह बनाना चाहता था। इसके लिए उसने आवाम में खौफ फैलाना शुरू कर दिया। यजीद पूरे अरब पर कब्जा करना चाहता था।

यजीद जैसे शख्स को इस्लामी शासक मानने से हजरत मोहम्मद के घराने ने साफ इन्कार कर दिया था क्योंकि यजीद के लिए इस्लामी मूल्यों की कोई कीमत नहीं थी।  यजीद, जो नाममात्र का मुसलमान और उस समय का खलीफा था, इमाम हुसैन पर दबाव बनाने लगा कि वह उसे ही अल्लाह का दूत और उसके द्वारा बनाए गए इस्लाम को कबूल कर ले। यजीद चाहता था कि इमाम हुसैन उसे अपनी इच्छानुसार इस्लाम में संशोधन करने दें। अगर हुसैन यजीद  के साथ मिल जाएं तो इस्लाम धर्म उसकी कठपुतली बन जाएगा, वह जैसे चाहेगा उसके साथ छेड़छाड़ कर सकता है। परंतु यजीद के लाख कहने के बाद भी इमाम ने उसकी बात कबूल नहीं की तो ऐसे में क्रोधित होकर उसने इमाम साहब को मारने की योजना बना ली।इमाम जंग का इरादा नहीं रखते थे हुसैन लगभग 72 लोग थे और यजीद के पास 8000 से अधिक सैनिक थे इमाम सब्र से काम लेते हुए जंग को टालते रहे। 7 से 10 मुहर्रम तक इमाम हुसैन उनके परिवार के मेंबर और अनुनायी भूखे प्यासे रहे।

10 मुहर्रम को इमाम हुसैन की तरफ एक-एक करके गए हुए शख्स ने यजीद की फौज से जंग की और यजीद की फौज के दांत खट्टे कर दिये। हालांकि वे इस युद्ध में जीत नहीं सके और सभी शहीद हो गए। खुदा की राह पर चलते हुए इमाम हुसैन ने हक और इंसाफ के लिए इंसानियत का परचम उठाकर यजीद से जंग करते हुए शहीद होना बेहतर समझा लेकिन यजीद जैसे बेईमान और भ्रष्ट शासक और बैअत करना मुनासिब नहीं समझा और इस्लाम को बचाने के लिए कर्बला की धरती पर इमाम हुसैन और उनके परिवार ने अपनी जान गंवा दी। हुसैन की शहादत वाले दिन को आज भी मोहर्रम के रूप में मनाया जाता है हमें अत्याचार और आतंक से लड़ने की प्रेरणा देती है।