मनुष्यता ईश्वरीय उपहार और उदारता का रूप है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

सीकर। पारमार्थिक भावना, उदारता और परदोष-दर्शन का अभाव अन्त:करण की पवित्रता और विशालता का निर्माण करता है। अतः शुभ संकल्प, परोपकारता और सह-अस्तित्व जैसी दिव्य भावना सहेज कर रखें…! आत्मा का साक्षात्कार सद्गुणों के बिना सम्भव नहीं। उत्कृष्टता और उदारता का समन्वय सेवा धर्म में है। सेवा धर्म ही अध्यात्म का प्रतिफल है। परमार्थ पथ पर अग्रसर होने वाले को सेवा-धर्म अपनाना होता है। जिसके हृदय में दया, करुणा, प्रेम और उदारता है वही सच्चा अध्यात्मवादी है। इन सद्गुणों को, दिव्य विभूतियों को, जीवन क्रम में समाविष्ट करने के लिए सेवा धर्म अपनाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। मनुष्य जीवन को मधुर बनाएं। इसके लिए जीवन व्यवहार में बदलाव की आवश्यकता है। पवित्रता हमारे जीवन की महान संपत्ति है, इसे सुरक्षित रखें। संत वाणी जीवन में सहृदयता, सरलता, मृदता एवं मैत्री भावना का विकास करती है। “आचार्यश्री” ने कहा – ईश्वर का दर्शन इन चर्मचक्षुओं से नहीं, अन्तरात्मा द्वारा होता है। सत्कर्मों द्वारा आत्मा को विस्तृत व्यापक और निष्कलुष बनाइये। ईश्वर की झाँकी स्वतः ही उसमें जगमगा उठेगी। आत्मा का विकास आत्म-विश्वास द्वारा होता है। अपने को शरीर न मानकर आत्मा मानिये और उस रूप में अपने को ईश्वर का केन्द्र उसका निवास और उसी का अंश विश्वास कीजिये। ऐसा विश्वास दृढ़ होते ही आपमें आत्म-गरिमा का भाव, अपने महत्व का गौरव, अपने उत्तरदायित्व की पुनीतिमा प्राप्त हो जायेगी। तब आप क्षुद्र से महान, तुच्छ से श्रेष्ठ बनकर जीवन से स्वयं ईश्वरत्व की ओर बढ़ने लगेंगे। वासनाएं, विषमताएं और अज्ञान की बाधक श्रृंखलाएं आपसे-आप टूट कर गिर जायेंगी। सद्गुणों और सदाशयों से आपकी अन्तरात्मा विभूषित हो उठेगी और आप ईश्वर प्राप्ति के अपने लक्ष्य की ओर उन्मुख हो चलेंगे…।

“आचार्यश्री” ने कहा – मनुष्यता ईश्वरीय उपहार और उदारता का रूप है। दूसरो के साथ वैसी ही उदारता बरतें, जैसी ईश्वर ने आपके साथ बरती है। उदारता से बड़ी कोई उच्चता नही है। उदारता का अर्थ है कि जिसका हृदय दुखियों को देख करुणित हो जाय, सुखियों को देख प्रसन्न हो जाय। उदारता में रस है, सुख नहीं। रस में और सुख में एक बड़ा भेद है। रस उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है, कभी घटता नहीं और सुख उत्तरोत्तर घटता रहता है, कभी बढ़ता नहीं। “आचार्यश्री” ने कहा कि उदारता ईश्वरीय गुण है। जैसे ही हमारे अन्तःकरण में औदार्य और सेवा-भावना प्रकट होती है, उसी समय हम पर देव-अनुग्रह और आशीष बरसने लगते हैं। उदारता के प्रसव का नाम ही उत्सव है। दूसरों के विचारों, तर्कों, स्वार्थों और उनकी परिस्थितियों को समझने के लिए उदारतापूर्वक प्रयत्न किया जाय तो अनेकों झगड़े सहज ही शान्त हो सकते हैं। उदारता में दूसरों को अपना बनाने का अद्भुत गुण है। जितने अंशों में दूसरों से एकता हो, सर्वप्रथम उस एकता को प्रेम और सहयोग का माध्यम बनाया जाय। मतभेद के प्रश्नों को पीछे के लिए रखा जाय और मन की शान्त अवस्था में उनको धीरे-धीरे सुलझाया जाय। सामाजिकता का यही नियम है। संसार में पीने वाला रस सिर्फ भागवत रस है। उन्होंने कहा कि परमात्मा की संपूर्ण कला की रचनात्मकता ही मनुष्यता है। देवसत्ता में जो अलौकिक ऐश्वर्य है, वह सब मनुष्य की चेतना में विद्यमान है। ईश्वर जहां पूरा-पूरा रमा है वहां धर्म, ज्ञान, वैराग्य भगवान के अलौकिक तथा ऐश्वर्य, यश लौकिक रूप हैं। ईश्वर की प्रतिकृति मनुष्यता ही है। करुणा, उदारता और समानता के भाव चेतना की उच्च-आरोहता के सहायक तत्त्व हैं। अतः सदगुण-संचयन गम्भीरता परम तत्व को आकर्षित करती है…।

“आचार्यश्री” ने कहा – जीव का मूल स्वभाव प्रेम और शांति ही है। कोई भी इंसान चौबीस घंटे क्रोध नहीं कर सकता। उसको शांत होना पड़ता है। संतों, मुनियों और ऋषियों के बताए मार्ग पर चलें, फिर भटकने की आवश्यकता नहीं है। और, फिर भी यदि आपके जीवन में अशांति है तो इसके लिए कोई दूसरा नहीं, आप स्वयं जिम्मेदार हो। अक्सर इंसान सोचता है कि यदि उसके पास धन, पद, सुविधाएं तथा मान-सम्मान आदि सभी भौतिक सुख आ जाएं, तो वह आनंदपूर्वक और शांति से जीवन व्यतीत करेगा। क्या ऐसा वास्तव में होता है? असल में ऐसा बिल्कुल नहीं होता। संसार में ऐसे करोड़ों लोग हैं जिनके पास सभी भौतिक सुख सुविधाएं हैं, लेकिन फिर भी वे दु:खी हैं, अशांत हैं। सचाई यह है कि यदि लोग कुछ कथित सुखों का त्याग कर दें तो वे असीम शांति, सुख और संतुष्टि प्राप्त कर सकते हैं। हमारे धार्मिक ग्रंथ, महापुरुष और मनीषी बताते हैं कि मनुष्य के जीवन में श्रेष्ठ सुख सिर्फ सात्विक सुख हैं। भले ही इसकी प्रारंभिक अनुभूति कष्टकारी हो, किंतु भविष्य में इसके परिणाम सुखद होते हैं। आरंभ का कष्ट व्यक्ति को सांसारिक सुख से हटने के कारण होता है और बाद का सुख आध्यात्मिक सुख की तरफ प्रवृत्ति से होता है। यह सुख आत्मा परमात्मा के ज्ञान, ध्यान तथा भजन आदि पारमार्थिक गतिविधियों से होता है। सात्विक सुख अक्षय या असीम सुख है। इसलिये एक बार प्राप्त हो जाने के बाद यह कभी समाप्त नहीं होता और व्यक्ति सदा ही इसके आनंद में डूबा रहता; और, इसी में जीवन की सार्थकता है…।