पहचान छुपाकर फकीर की शरण में रहा अमीर बाप का बेटा

हैदराबाद/ धनंजय राजपूत। मानवता के लिए दुनियाभर में मशहूर भारत आज भी अपनी पहचान को बनाए हुए है। भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां एक-दूसरे के लिए टाइम नहीं होता है वहीं एक संत ऐसे भी हैं जो जरूरत मंदों को अपने आश्रम में शरण देने के लिए कोई गुरेज नहीं करते। इसी कड़ी में एक जरुरतमंद उनके पास आया और आश्रम में रहने की बात कही। संत जी ने बिना पहचान जाने उसे अपने आश्रम में जगह दे दी। आश्रम में जिस लड़के को रहने के लिए रखा उसका पहचान पत्र फर्जी था। अपनी पहचान को जाहिर किए बिना रह रहा यह आम लड़का नहीं बल्कि सूरत के अरबपति डायमंड बिजनेसमैन घनश्याम ढ़ोलकिया का बेटा हितार्थ ढ़ोलकिया निकला ये सारी कहानी फ़िल्म जैसी है हालांकि की इस घटना के बाद उन्होंने सन्त जी को अपना पूरा परिचय दिया और उनके परिवार के लोगो ने संत जी को सम्मानित भी किया।

कौन हैं वो संत
ये संत कोई और नहीं बल्कि हैदराबाद के संत रूद्र गुप्तपदाचार्य हैं। जिन्होंने अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी बंद करके अपनी सारी डिग्री का त्याग कर संत जीवन धारण किया और गौ सेवा के साथ मानव सेवा कर रहे हैं।

संत के पास रहने के लिए क्यों गया था हितार्थ
सूरत के डायमंड बिजनेसमैन घनश्याम ढ़ोलकिया ने अपने 23 वर्षीय बेटे हितार्थ को गरीबी और पैसे की कीमत समझाने के लिए 500 रुपए देकर हैदराबाद भेजा। उससे कहा गया है कि वो बिना अपनी पहचान उजागर किए वहां रहकर अकेले अपना खर्च उठाए। हैरान करने वाली बात यह है कि पिता ने हितार्थ को मोबाइल तक नहीं दिया है, लेकिन कहा कि कहीं से दिन में एक बार घर पर फोन कर सकते हो।

आखिर कौन है हितार्थ
23 वर्षीय हितार्थ ढ़ोलकियाघनश्याम का सातवां बेटा और 71 देशों में फैली 6000 करोड़ की कृष्णा डायमंउ एक्सपोर्ट्स के संस्थापकों में से एक है। हितार्थ के पिता ने उससे बिना किसी पहचान के बिल्कुल गुमनाम जिंदगी बिताने को कहा है। यहां तक कि मुंबई पहुंचने तक उसके पिता ने उससे उसके नए ठिकाने हैदराबाद का जिक्र तक नहीं किया। 10 जुलाई को शमशाबाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरने के बाद हितार्थ ने बताया कि वह जिंदगी में पहली बार हैदराबाद आया है। अब जबकि उसके अज्ञातवास का एक माह भी पूरा हो चुका है, तो वह बताता है कि जब मैं यहां आया तो मुझे यहां की भाषा, खाने-पीने की आदत व कल्चर की कोई समझ नहीं थी।

भूख लगी थी लेकिन नहीं थे पैसे
हितार्थ हैदराबाद में रहा और एक महीने काम करने के बाद 5000 रुपए कमा कर लौटा। बताया जाता है कि ढ़ोलकिया परिवार अपनी युवा पीढ़ी को इसी तरह दुनियादारी समझने की ट्रेनिंग देता है। हितार्थ ने बताया कि भूख लगी थी, लेकिन जेब में पैसे कम थे। इसलिए इधर-उधर भटका, एक ठेले पर नजर पड़ी, 20 रुपए में राइस प्लेट। जिंदगी में पहली बार राइस प्लेट खाई। दो दिन भटकने के बाद मैकडोनॉल्ड में नौकरी मिली।

संघर्ष के बाद समझ आया नौकरी क्या चीज है
हितार्थ ने बताया कि मैकडोनॉल्ड में प्रोडक्शन सेल्स एवं इन्वेन्टरी में काम किया तब समझ में आया कि आखिर नौकरी क्या चीज है। हितार्थ को दूसरी नौकरी व्हाइट बोर्ड बनाने वाले कारखाना में मिली। बाइक पर घूम-घूम कर मार्केटिंग करना और ऑर्डर डिलिवरी करना था। उसने बताया कि पूरे दिन बाइक पर भागदौड़ करने के बाद जब शाम को वह वापस लौटता था तो थक कर चूर हो चुका होता था। हितार्थ के पिता घनश्यामभाई का कहना है कि हम संघर्ष करके ही आगे आए हैं। इसलिए छोटी-छोटी बातों का महत्व-मूल्य समझते हैं। हमारे बच्चे भी यह सब समझें, इसके लिए इन्हें अज्ञातवास में भेजना जरूरी है।