चोटहिल हिमालय को स्वस्थ बनाने के लिए आगे आना होगा-राम महेश मिश्र

अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए दुनियाभर में मशहूर हिमालय

नई दिल्ली। हिमालय को स्वस्थ, सुदृढ़ और मजबूत रखना केवल उत्तराखण्ड और हिमालयी राज्यों की जिम्मेदारी नहीं है। पूरा देश हिमालय से शुद्ध जल, स्वच्छ हवा, विशुद्ध पर्यावरण पाता है। मानव हो या पशु-पक्षी, खेत हों या बाग, नहरें हों या ताल-तलैया, सभी हिमालय से पोषित होते हैं और जीवन प्राण पाते हैं। केवल मां भागीरथी गंगाजी से भारतवर्ष की आधे से ज्यादा खेती पोषित होती है, जिसका अन्न देशवासी खाते हैं तथा जानवर चारा पाते हैं। इसलिए आज जब हिमालय दरक रहा है, देवात्मा कहे जाने वाले पहाड़ चोटहिल हो रहें हैं, तब उसे ठीक करने और पूर्ववत स्थिति में लाने की जिम्मेदारी केवल देवभूमि उत्तराखण्ड और पर्वतीय प्रान्तों की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण देश की है, हर भारतीय की है। हमारी है और आपकी है।

भाल प्रान्त उत्तराखण्ड सबका है, सब उसे मजबूत बनाने का धर्म निभायें

पहाड़ों के मध्य अपनी छंटा बिखेरती मां गंगा

मैं अक्सर कहता हूं और तीर्थनगरी ऋषिकेश की गंगा आरती में सभी गंगाप्रेमियों, प्रकृतिप्रेमियों, संस्कृतिप्रेमियों, अध्यात्मप्रेमियों, राष्ट्रप्रेमियों को अपने सम्बोधन में कहता रहा हूं कि उत्तराखण्ड भारत का भाल-प्रान्त है। भाल माने मस्तक और मस्तक सिर के भाग में सामने की ओर चमकता हुआ दिखता है। सिर के नीचे होता है पूरा शरीर तथा काया के विभिन्न अंग-अवयव। देवभूमि उत्तराखण्ड राष्ट्ररूपी शरीर का सिर है तो भारत के अन्य प्रान्त उसके अन्य शरीरांग। जब माथा खराब होने लगे, तब काया के अन्य सभी अंगों को चिन्ता होनी चाहिए। मस्तक ठीक नहीं तो शरीर का कोई अंग ठीक नहीं। मस्तिष्क कमजोर होने पर स्वस्थ शरीर का कोई महत्व नहीं रह जाता। इसलिए सभी अंगों अर्थात् सभी प्रदेशों को अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए हिमालय को मजबूत बनाने के लिए आगे आना चाहिए। हिमालय और गंगा को सुदृढ़ एवं स्वच्छ बनाने का काम सभी राज्य मिलजुलकर करें।

साल 2013 में आई आपदा का दृश्य

भारत को कई बार आगाह कर चुका है हिमालय

बीते 20 वर्षों में सम्पूर्ण हिमालय में लगातार हुई आपदा की घटनाओं जैसे भीषण बारिश, बादल फटने, प्रलयंकारी बाढ़ ने हमें चेतावनी दी है कि हिमालयी नीति पर अब बिना देर किये पुनर्विचार की जरूरत आन पड़ी है। वर्ष 1991 से 1997 के बीच उत्तरकाशी के वरुणावत तथा हिमाचल प्रदेश की तहसील झाकरी और मांलिग में बड़ी प्राकृतिक आपदा की घटनाएँ हुई। वहीं 1998 से 2002 के बीच गुप्तकाशी, रुद्रप्रयाग, टिहरी में भीषण अतिवृद्धि भूस्खलन हुए। 2003 से 2004 के बीच कुल्लू (हि0प्र0) तथा अरुणाचल प्रदेश में भी आपदायें आईं। वर्ष 2010 तो आपदाओं का अनोखा वर्ष रहा। लेह लद्दाख से लेकर कुमाऊँ में अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, गढ़वाल के उत्तरकाशी क्षेत्र में अति-वृष्टि हुई। गत वर्ष 2013 में केदारनाथ की भीषण आपदा ने तो समूचे हिमालय को ही हिला दिया। चालू वर्ष 2014 में समूचे जम्मू कश्मीर की त्रासदी ने हम यह सोचने को विवश है कि ‘‘हिमालय बचाओ’’ की बात जरूरी क्यों है?

कश्मीर से लेकर उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों तक का पूरा हिमालयी क्षेत्र आज भीषण प्राकृतिक आपदाओं से ग्रसित है। ऐसी स्थिति में यह जरूरी हो जाता है कि हिमालयी क्षेत्र में चल रही वर्तमान गतिविधियों एवं नीतियों पर पुनर्विचार की जरूरत है, ये प्राकृतिक आपदायें यही संकेत दे रही है। हम कहीं न कहीं गलत दिशा में हैं तो जल्द ही हम बदलें और सुधरें। कहीं ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाये। हिमालय के पर्यावरणीय बदलाव को हम महसूस करें और इन संकेतों का सही अर्थ समझकर अविलम्ब संभल जायें।

उत्तराखंड के पहाड़ का मनोरम दृश्य

प्राकृतिक रूप से अत्यधिक संवेदनशील है हिमालय

हिमालय प्राकृतिक रूप से अति संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र है। विगत 20-25 वर्षों में आई भीषण आपदायें यही संकेत कर रही हैं। कई पर्यावरणविदों का मत है कि यहाँ बड़ी सड़कें, बड़े बांध बनाने हेतु हिमालय को तोड़-फोड़कर छलनी न करें। जो आघात हम हिमालय को दे रहे हैं, उसकी प्रतिक्रिया तो होंगी ही। यहां तथाकथित विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का अंधा-धुंध दोहन किया गया है, जिससे यहां के जल, जंगल, जमीन, खनिज संपदायें, भूगर्भीय प्लेटें तक प्रभावित हुई हैं। ये अंधा-धुंध दोहन लगातार हो रहा है और इस क्रम में प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला भी बढ़ रहा है। विकास की यह अंधी मानसिकता कहीं अपने पैर में कुल्हाड़ी तो नहीं मार रही, इस पर सोचने की जरूरत है। अंधाधुंध आर्थिक विकास ने प्राकृतिक संतुलन का प्रभावित किया है, इसलिये उत्तेजित प्राकृतिक प्रवाह हिमालय के आर्थिक विकास को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।

क्रिया की प्रतिक्रिया तो संसार का सार्वभौम सिद्धान्त है। शायद इसीलिये, अब हिमालय की खूबसूरत बरसात आज भयावह अतिवृष्टि बन गयी है। सुन्दर पहाड़ भूस्खलन का पर्याय बन रहे हैं। विकास के बड़े संरजामों ने प्रकृति की सीमाओं व संतुलन का अतिक्रमण किया है। इसे हमारी सरकारें, यहाँ के नीति निर्माता समझ नहीं पा रहे हैं। हिमालय का पर्यावरणीय जैवविविधता का सन्तुलन डगमगा गया है।

आपदा का कहर

परिणाम हम सबके सामने है

तभी हिमालय के जल, जंगल, जमीन तीनों ही तहस-नहस हो रहे हैं। कहते हैं कि हिमालय का प्रभाव पूरे देश पर पड़ता है। हिमालय डगमगाया तो देश डगमगायेगा। बेहतर है कि हम हिमालय को हिमालय ही रहने दें, इसे जल विद्युत परियोजनाओं का पर्याय न बनाएँ। हिमालय में मैदानी क्षेत्रों की विकास तकनीकें अपनाने की प्रतिस्पर्धा न करें। हिमालय है मैदान नहीं। आवश्यकता है कि हिमालय को बंगलौर, मुम्बई बनाने का प्रयास न करें। हिमालय की पहचान हिमालयी वातावरण से है।  इसे स्थिर रखकर और इसका विकास करके विकास का मॉडल बनायें।

 

कैसा हो हिमालयी विकास? कुछ रचनात्मक सुझाव

    • हिमालयी विकास प्राकृतिक, नैसर्गिक हो। जिसमें जड़ी-बूटी उत्पादन, सब्जी, चारा, फल उत्पादन आदि पर वृहद कार्य हों।
    • चीड़ जैसे हानिकारक पेड़ों के स्थान पर उपयोगी पौधे विकसित किये जायें जो जंगलों में आग का कारण न बनें, बल्कि उनमें चारा, औषधि, जल संरक्षण की अद्भुत क्षमताएँ अधिक हों, जो स्थानीय लोगों के जीवन की अधिक से अधिक जरूरतें पूरी करने में सक्षम हों।
    • इन वृक्ष वनस्पतियों में भीमल जैसे रेशों का हस्तनिर्मित हथकरघा जैसे कार्यों में प्रयोग हो। पहाड़ों पर उपयोगी पशुपालन विकसित हो, यहाँ की गायें, भेड़ें आदि बहुउपयोगी प्रजातियों का प्रचलन बढ़े। इनके दुग्ध, ऊन इत्यादि का उत्पादन बढ़े। ताकि भेड़पालकों, गौ पालकों दोनों का विकास हो।
    • प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित कृषि, बागवानी अर्थव्यवस्था का विकास हो।
    • चूँकि हिमालयी राज्य आपदा प्रभावित हैं, अतः इन्हें अतिरिक्त हिमालयी बोनस तथा कृषि भूमि के विशेष अधिकार दिये जायें। प्रत्येक परिवार को आजीविका चलाने हेतु आर्थिक भत्ता दिया जाये।
    • पर्वतीय कृषि को विकसित करने के लिए परम्परागत बीजों, कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण एवं सहायता दी जाये।
    • पर्वतीय औषधियों, अनाजों, सब्जियों, फलों एवं मधुमक्खी पालन व रेशमकीट पालन जैसे सहयोगी उद्योग विकसित किये जायें। तिलहनों का फसल बीमा तथा बिक्री कोष स्थापित किया जाये। इन हिमालयी उत्पादनों का मूल्य अधिक हो।
    • पूरे हिमालय मे पर्यटन की एक नीति बनें, जिसमें पर्यटकों को हिमालयी संस्कृति यहाँ की लोक-भूषा, लोक-कला, संस्कृति से, लोक-भोजन से परिचित करवाया जाये।
    • चौड़ी पत्ती के मिश्रित वन विकसित करने वाले पर्यावरण वीरों जैसे- जगत सिंह जंगली (रुद्रप्रयाग) श्री प्रताप पोखरियाल (उत्तरकाशी) आदि को विशेष सम्मान दिया जाए तथा उनका आर्थिक पोषण दिया जाये, अनुदान दिया जाये ताकि वे पर्यावरण संरक्षण के इन कार्यों को समुचित विस्तार दें जिससे भावी पीढ़ी इनसे प्रेरणा, प्रोत्साहन व प्रशिक्षण तथा यर्थात् का कौशल पाये।
राम महेश मिश्र, निदेशक, विश्व जागृति मिशन नई दिल्ली & महासचिव, गोमती एक्शन परिवार, लखनउ
  • पर्यावरण शिक्षा का पाठ्यक्रम बने, जिसे तैयार करने में इन पर्यावरणविदों की विशेष भूमिका हो, इनका तथा अनुभव भी इसमें शामिल हों।
  • इन पर्यावरणविदों के विशेष मार्गदर्शन में पूरे हिमालयी क्षेत्रों में स्थान-स्थान पर मिश्रित वनों का विकास किया जाये।
  • इन वनों को विकसित करने वाले स्थानीय लोगों को फल, औषधि, चारा, रेशा, जलावन की सूखी लकड़ी का उपयोग के अधिकार मिले।
  • ऊर्जा के लिए छोटी-छोटी पन बिजली योजनाओं जैसे घराट इत्यादि का विकास किया जाये, इस हेतु विशेष सरकारी अनुदान व प्रोत्साहन भी दिया जाये।
  • मोटर मार्ग नदियों के किनारों के बजाय किनारों से दूर बनें। ऐसा करने से सड़कें भूस्खलन से बचेंगी और गाड़ियां खाइयों में गिरने की दुर्घटनाएं कम कम हो जायेंगी। इससे नदियों के किनारे भी बचेंगे और सड़कें भी तथा उन पर चलने वाले लोग भी।

इन प्रयासों से हिमालय की जैव विविधता तो बचेगी ही साथ ही आर्थिक रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। खास बात यह है कि हिमालयी क्षेत्रों से बड़ी तेजी से हो रहा पलायन रुकेगा, जो हिमालयी राज्यों की, पर्वतों की बहुत बड़ी सेवा होगी।