विद्या-अभ्यास; गुरु-उपदेश अनुसरण हितकर है- आचार्य अवधेशानंद गिरी जी महाराज

श्रीजगन्नाथ धाम/ उड़ीसा। जूना पीठाधीश्वर आचार्य महा मंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी जी महाराज ने कहा कि क्षमाशीलता, विनय, परदोष-दर्शन का अभाव एवं सदगुण-संचय; और विद्या सदगुरू सन्निधि की फलश्रुति है। अतः विद्या-अभ्यास; गुरु-उपदेश अनुसरण हितकर है..! क्षमाशीलता इंसान की इंसानियत को गरिमा और ऊंचाई प्रदान करने का सशक्त माध्यम है। परिवार, संगठन, समुदाय या संस्थाओं के कामकाज में आम तौर पर जब कोई रुकावट आती है या कोई पारस्परिक गतिरोध पैदा होता है तो उसके दो प्रमुख कारण सामने आते हैं – पहला व्यक्तिगत अहंकार और दूसरा अंत:करण में क्षमाशीलता का अभाव। जिस व्यक्ति में अहंकार की मात्रा जितनी अधिक होती है, उसमें क्षमादान का सामर्थ्य उतना ही कम होता है। वास्तव में, क्षमाशीलता मनुष्य के आध्यात्मिक शुद्धिकरण की एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे उसके व्यक्तित्व का निखार होने के साथ-साथ उसकी आत्मा का भी उत्थान होता है। क्षमा, श्रेष्ठ व कुलीन आत्माओं का आभूषण है। जो व्यक्ति जीवन की प्रतिकूल पगडंडियों पर क्षमाशीलता को अपनाते हुए शांत चित्त होकर आगे बढ़ता है, वही अपने गंतव्य पर सफलतापूर्वक ध्वजारोहण करता है…।

आचार्यश्री” जी ने कहा कि क्षमावान को ही प्रभु की निकटता प्राप्त होती है। क्षमावान ईश्वर के बहुत निकट होता है। क्षमाशीलता साधना-सिद्धि का राजपथ है, क्षमा धर्म की उद्घोषणा है। जिसने क्षमादान का अभ्यास नहीं किया, उसके लिए धर्म का दरवाजा कभी नहीं खुलता। क्षमा व्यक्ति के व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण घटक है। क्षमा के अभाव में मनुष्य असुर बन जाता है। क्षमा सभी धर्मों का आधार है। परस्पर विभिन्नताओं के बावजूद सभी धर्मों और संप्रदायों ने क्षमादान को एक मत से स्वीकार किया है। सभी धर्मों में क्षमादान को सबसे बड़ा सदाचार कहा गया है। जैन धर्म में तो क्षमा को साहसी लोगों का आभूषण कहा गया है…!

आचार्यश्री जी ने कहा – आज सांसारिक परिवेश में जो हिंसा, अशांति, भय, शोक और असुरक्षा दिखाई देती है, उसके मूल में क्षमा का अभाव और पारस्परिक नफरत की भावना है। क्षमा नफरत की औषधि है। क्षमादान देना और क्षमा याचना करना, दोनों महानता की निशानी हैं। क्षमा देने वाले की भांति क्षमा मांगने वाला भी उतना ही श्रेष्ठ है। अपनी गलती पर क्षमा मांगने से उसके हृदय में विनयशीलता का जो भाव उपजता है, इससे उसका कद पहले की अपेक्षा और अधिक बढ़ जाता है। यही वह बिंदु है जहां व्यक्ति का अहंकार और क्रोध विसर्जित होने लगता है। यही वह अद्भुत स्थिति है जहां से पारस्परिक सौहार्द व सहिष्णुता का सृजन होता है। इसी के परिणामस्वरूप समाज में शांति व सद्‌भावना बढ़ने लगती है…।

आचार्यश्री” जी ने कहा – भगवान और गुरु पर पूर्ण विश्वास ही परम भक्ति है। जब हमारे पास श्रद्धा आती है तो वह हमें बाध्य करती है। गुरु के पास जो गुरुत्व है, साधु के पास जो साधुत्व है, संन्यासी के पास जो संन्यस्त है, गंगा के पास जो गंगत्व है, देवताओं के पास जो देवत्व है और भगवान के पास जो भगवत्ता है; उसके हम स्वाभाविक रूप से अधिकारी बन जाते हैं। प्रेम, नम्रता, समता और सद्भाव केवल शब्द मात्र नहीं हैं; बल्कि ये शब्द अपनी सुगंध से लोगों के जीवन में प्रकट होकर सम्पूर्ण परिवेश में फैल जाते हैं। लेकिन, ऐसा तभी संभव होगा, जब मनुष्य, मनुष्य से प्रेम करेगा और समर्पण को जीवन में धारण करेगा। पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा कि भक्ति का भाव विश्वास पर टिका रहता है। सच्ची श्रद्धा एवं अटूट विश्वास ही मनुष्य को परमात्मा तक ले जाने का कारण बनती है। भगवान और गुरु पर विश्वास रखें तो हर कार्य संभव है…।