गुजरात का ‘जनेऊ’ बनाम गोरखपुर का ‘जनेऊ’

नई दिल्ली। बात उन दिनों की है जब मैने गोरखपुर यूनिवर्सिटी में स्नातक प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया था। वो दौर था जब यूपी सरकार ने छात्रसंघ चुनावों पर उससे पहले तीन सालों से रोक लगा रखी थी। उस दौर में गोऱखपुर यूनिवर्सिटी के छात्रावास का माहौल लगभग कॉन्वेंट स्कूलों के किसी छात्रावास की तरह ही होता था। वार्डन से लेकर यूनिवर्सटी के चपरासी तक हड़का देते थे। फिर यूपी में सत्ता बदली। और छात्रसंघ चुनावों का शोर माहौल पर तारी होना शुरु हुआ। अचानक छात्रावास के परिसर में बड़ी बड़ी लग्जरी गाड़ियों की आवाजाही बढ़ने लगी। झक्क सफेद कमीज और पैंट पहने अंकल की उम्र की चेहरे टहलते घूमते दिखने लगे जिनके पीछे मिनी गन लिए हुए कुछ मुस्टंडे भी होते थे। गन और गाड़ी के कॉकटेल ने नए छात्रों को मगन कर दिया सब अपने अपने हिस्से के फलाने और चिलाने भइया से सटने लगे। उसमें भी क्वालिस वाले भइया आकर छात्रावास में किसी लड़के के कमरे में बैठ गए तो फिर भौकाल का तो पूछिए मत। अगल बगल वाले बेबसी वाली निगाहों से देखते कि काश हमें भी ये सौभाग्य मिल जाता। वक्त बीतता गया और धीरे धीरे ऐसे भइया लोगों की तादाद बढ़ने लगी। क्लास कम होने लगे, गेट पर भीड़ ज्यादा रहने लगी। इस बीच मजा तब और दोगुना हो जाता था जब ये फलाने भईया किसी प्रोफेसर को हड़का देते। अब भइया ने हड़काया तो पीछे वाले कलेजा फूल कर 56 इंच का हो गया। मने जो भइया जेतना हड़काएं ओतना बड़ नेता माने जाएं।

खैर छात्रसंघ चुनाव की घोषणा हुई। वो दौर था जब लिंगदोह चचा अभी अपनी रिपोर्ट बनवाकर प्रिंटिंग प्रेस में छपवाने के लिए बंडल बना रहे थे। ये भी संयोग ही था कि उस वक्त के तत्कालीन कुलपति महोदय संत प्रवृति के व्यक्ति थे जिन्हें कुछ असुरों ने इस कदर घेर रखा था कि गुरुदेव को पते नहीं चलता था कि वो कुलपतिगीरी करें कि भक्तों को आशीर्वाद दें। कुल मिलाकर पढ़ाई लिखाई के माहौल के अलावा सारा माहौल एकदम दिव्य था। ऐसे माहौल के बीच छात्रसंघ चुनाव के तारीखों की घोषणा हुई। जेतना बड़ा काफिला ओतना बड़ा नेता। बड़का नेता, छोटका नेता, मोटका नेता, बकलोल नेता, धरतीपकड़ नेता, वोटकटवा नेता जैसे तमाम प्रजाति के नेताओं की भीड़ बढ़ने लगी। जिनमें से सबका सहारा बना एक विभाग जिसे नेता विभाग ही कहा जाता था। मने कुल बुढ़वन का एडमिशन वहीं होता था। खैर चुनाव का रंग जब चढ़ना शुरु हुआ तो वेटरन छात्र नेताओं की आमदरफ्त भी तेज हुई। जिन्हें फलाने भईया लोग चरण छूकर आशीर्वाद लेते थे । अब भाई हम जैसे छोटकन को लगा कि भाई ये तो देवता लोग हैं, अरे जिन्हें फलाने भईया तक चरण छूते हैं वो कितनी बड़ी हस्ती होंगे? सो फलाने भईया उनका ठेहुना छूते थे, हम लोग अंगूठा छूने लगे। अरे भाई निहुरने में ही असली सम्मान प्रकट होता था। ये और बात ये कि जब चुनाव खत्म हुआ तो देखा कि दिनवा भर ई फलाने भईया के ठेमाके गुरुजी लोग एतना खलिहर थे कि इंदिरा बाल विहार पर बिल्कुल प्रतिबद्धतापूर्वक प्रवासी बने रहते थे।
बहरहाल वापस चुनाव पर आते हैं। छात्र संघ चुनाव के लिए पर्चादाखिला का दिन करीब था, सब नेता अपना अपना भीड़ बढ़ाने के लिए सम्पर्क में लगे थे। सबका निशाना यूनिवर्सिटी के चार छात्रावास थे जिनमें एकमुश्त संख्या की सबको उम्मीद थी। बाकी गांव घर के इलाके में भी बसें भेज दी गई थी ताकि कोई कसर ना रहे। अरे भई भीड़ तो भीड़ होती है कवन ससुरा भीड़ का आईकार्ड चेक करेगा कि फलाने छात्र यूनिवर्सिटी का छात्र है या फिर कौड़ीराम, हाटा, कसया में अंडा का ठेला लगाने वाला राजकुमरा। लेकिन जोर छात्रावास पर ज्यादा था। एक ही रूम में रहने वाले दो रूम पार्टनर के दो फलाने भईया थे। अब बाबू साहब के नेताजी आए तो पंडी जी को कन्वेंस किया और पंडी जी के नेताजी आए तो बाबू साहब को कन्वेंस किया। लेकिन इस बीच एक बात और भी होती थी। पंडी जी वाले नेता जब आते थे तो बाबू साहब को कन्वेंस करने के बाद पंडी जी से हॉस्टल घुमाने को जरूर बोलते थे। और घूमने के दौरान एक बार जनेऊ निकालकर जरूर दिखाते थे, इस स्लोगन के साथ कि बिरादर इज्जतिया राख लिहा। बस क्या था सुकुल, पांडे, तिवारी, मिसरा, दूबे, चौबे टाइप के फलाने भईया का इतना कहना था कि बंदा मिसाइल हो जाता था। अश्वमेध का घोड़ा है….फलाने ने छोड़ा है, टाइप के नारों से हॉस्टल के गलियारे गुंजायमान हो जाते थे। हां कहीं गलती से कोई पंडीजी कवनों बाबू साहब के साथ घूमते दिख गए तो फलाने भईया और उनके समर्थकों की नजर में उससे बड़ा धर्मद्रोही कोई नहीं होता था।


खैर जनेऊ की महिमा बड़ी अपरम्पार है। मैंने व्यक्तिगत रुप से देखा है कि बड़े बड़े फलाने भईया का जनेऊ चुनाव के वक्त झक्क पीला होता था, मने अबहिए निकाल के लाए हैं। लेकिन ये जनेऊ कम से कम छात्र राजनीति में ब्रह्मास्त्र का काम करता था। ब्राह्मण होने का चरित्र प्रमाण पत्र था उस दौर में जनेऊ। ये लम्बी कहानी है आगे और लिखूंगा। मगर जनेऊ से याद आया, अभी गुजरात में भी जनेऊ चर्चा में हैं। रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि राहुल गांधी ना केवल हिन्दू हैं बल्कि जनेऊधारी हिन्दू हैं। यूपी चुनाव के वक्त राहुल गांधी ने खुद को ब्राह्मण कहा था और गुजरात में ही कुछ दिन पहले शिवभक्त कहा था खुद को। ना जाने क्यों ये सब देखकर मुझे गोरखपुर यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनावों की याद अनायास आ गई। हालांकि यूनिवर्सिटी के चुनाव में ये परंपरा ना जाने कबसे चली आ रही थी ये मुझे याद नहीं। लेकिन ये जरूर याद है कि सत्तर और अस्सी के दशक में गोरखपुर में भौकाल की लड़ाई में इसने बड़ी भूमिका निभाई थी। अब गुजरात देखकर लगता है कि शायद पुराने फॉर्मूले कभी पुराने नहीं होते। बीजेपी राहुल गांधी का धर्म पूछ रही है तो बदले में कांग्रेस राहुल की पुरानी जनेऊ वाली तस्वीरें दिखा रही हैं। कौन किसे टारगेट कर रहा है पता नहीं? इस सबके बीच पाटीदार आरक्षण, नोटबंदी, जीएसटी जैसे तमाम मुद्दे थोड़े फीके जरूर पड़ गए हैं। और ऐसा ही चलता रहा तो मतदान की तारीख आते आते दो साल से चल रहा बवंडर कहां हवा हो जाएगा इसका भी अंदाजा किसी को नहीं होगा। बहरहाल हमें इससे क्या? मगर ये ध्यान रखना जरूरी है कि यूनिवर्सिटी के चुनाव में जनेऊ की महिमा चुनाव के नतीजे आते ही खत्म होती रही है। फलाने भईया चुनाव के बाद क्वालिस का शीशा बंद कर हॉस्टल के गेट के सामने से अक्सर फुर्र हो जाते थे। वो नजारा याद है। बाकी गुजरात में क्या होगा ये तो वक्त बताएगा मगर ध्यान रहे कि प्रतीकों के सहारे होने वाली सियासत में प्रतीक कभी किसी को याद नहीं रहते। ये बात बीजेपी और कांग्रेस दोनों को समझनी होगी।

लेखक अम्बुजेश शुक्ल, टीवी पत्रकार हैं।

साभार- batbebak.blogspot.in

https://batbebak.blogspot.in/2017/11/blog-post_29.html?m=1